गुजरात पुलिस के साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CCOE) और CID क्राइम की टीमों ने मिलकर 226 करोड़ रुपए के एक बड़े अंतरराष्ट्रीय क्रिप्टोकरेंसी और आतंकी फंडिंग रैकेट का खुलासा किया है।
जाँच में सामने आया कि यह गिरोह सिर्फ वित्तीय अपराध ही नहीं बल्कि ड्रग्स सप्लाई, मानव तस्करी, सोने की तस्करी और दुनिया भर के आतंकी संगठनों तक पैसा पहुँचाने का काम भी कर रहा था।
इस बड़े काले कारोबार का खुलासा डार्क वेब की निगरानी के दौरान हुआ। साइबर सेंटर की तकनीकी टीम लगातार डार्क वेब पर नजर रख रही थी। ब्लॉकचेन जाँच के दौरान एक भारतीय IP एड्रेस सामने आया, जो artemislabs.cc नाम की वेबसाइट से सीधे डिजिटल पैसे ले रहा था। यह वेबसाइट डार्क वेब की बड़ी अवैध ड्रग्स मार्केट मानी जाती है।
डिजिटल ट्रांजैक्शन और खातों की जाँच करते हुए पुलिस अहमदाबाद के दानिलिम्दा इलाके तक पहुँची। जाँच में पता चला कि यह संदिग्ध क्रिप्टो वॉलेट अहमदाबाद निवासी मोहसिन सादिक मुलानी का था। उसके डिजिटल रिकॉर्ड और लेनदेन की गहराई से जाँच की गई तो देश के अलग-अलग हिस्सों से जुड़े 9 और संदिग्ध वॉलेट सामने आए।
DGP डॉ के लक्ष्मी नारायण राव और DIG बिपिन अहीर के मार्गदर्शन में यह बड़ा ऑपरेशन चलाया गया। इसके बाद साइबर सेंटर के SP डॉ राजदीपसिंह झाला, संजय केशवाला और विवेक भेड़ा की अगुवाई में 10 फील्ड टीमें और 3 तकनीकी खुफिया यूनिट्स बनाई गईं। करीब साढ़े चार महीने तक चले अभियान के बाद पुलिस ने पूरे गिरोह को पकड़ लिया।
जाँच से हमास से संबंध का खुलासा हुआ
इस मामले में सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब जब्त किए गए क्रिप्टो अकाउंट्स का संबंध गाजा के आतंकी संगठन हमास के अल-काहिरा नेटवर्क से जुड़ा मिला। साल 2025 में इजरायल सरकार ने अदालत के आदेश पर उन क्रिप्टो खातों को ब्लैकलिस्ट किया था, जिनसे तुर्की के रास्ते हमास को पैसा भेजा जा रहा था।
जाँच में पता चला कि वही प्रतिबंधित खाते इस मामले के मुख्य आरोपित मोहम्मद जुबैर पोपटिया तक पैसा पहुँचा रहे थे। जाँच आगे बढ़ने पर जुबैर पोपटिया के वॉलेट से अमेरिकी न्याय विभाग और OFAC द्वारा प्रतिबंधित आतंकी नेटवर्कों के साथ सीधे लेनदेन मिलने लगे।
इस नेटवर्क का संबंध यमन के हाउथी आतंकियों, ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC-QF) और रूस के प्रतिबंधित क्रिप्टो एक्सचेंज गारेंटेक्स से भी मिला। जुबैर इन आतंकी फंड्स को भारतीय वॉलेट्स में ट्रांसफर करता था, फिर कई हिस्सों में बाँटकर हवाला नेटवर्क के जरिए नकदी में बदल देता था।
जाँच एजेंसियों से बचने के लिए गिरोह ने सामान्य क्रिप्टोकरेंसी की जगह मोनरो जैसी बेहद गुप्त डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किया। मोनरो में भेजने वाले, पैसा लेने वाले और रकम की जानकारी छिपी रहती है। पुलिस ने ऐसे दो खास मोनरो वॉलेट जब्त किए हैं, जिनमें 193 करोड़ रुपए से ज्यादा के संदिग्ध लेनदेन मिले हैं।
कुल रकम का 40 प्रतिशत हिस्सा अवैध क्रिप्टो से आया
वरिष्ठ साइबर अधिकारियों के मुताबिक 226 करोड़ रुपए के इस पूरे नेटवर्क में करीब 30 से 40 प्रतिशत पैसा ड्रग्स, तस्करी और आतंकी गतिविधियों से आया था। बाकी रकम पीयर-टू-पीयर ट्रेडिंग, फ्यूचर्स ट्रेडिंग और हवाला नेटवर्क के जरिए सिस्टम में घुमाई गई थी।
यह गिरोह ऑनलाइन और डिजिटल फ्रॉड के जरिए आम लोगों से भी पैसे ठगता था। जिन बैंक खातों का इस्तेमाल क्रिप्टो को नकदी में बदलने के लिए किया गया, वे राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCCRP) में दर्ज 935 साइबर फ्रॉड FIR से जुड़े मिले। यानी भारतीयों से ठगा गया पैसा भी इस नेटवर्क के जरिए ड्रग्स और आतंकवाद तक पहुँचाया गया।
यह पूरा नेटवर्क कब शुरू हुआ?
इस आपराधिक नेटवर्क की शुरुआत कोविड-19 के बाद हुई थी। भारत में साथ रहने के दौरान मोहम्मद जुबैर पोपटिया, सलमान अंसारी और मोहसिन मुलानी ने मिलकर ब्रिटेन के ड्रग मार्केट में क्रिप्टोकरेंसी और USDT स्टेबलकॉइन के जरिए बड़ा अवैध कारोबार शुरू करने की योजना बनाई।
धीरे-धीरे इस गिरोह ने अहमदाबाद, मुंबई, दुबई और लंदन तक अपना नेटवर्क फैला लिया। गिरोह का काम करने का तरीका बेहद प्रोफेशनल था। अहमदाबाद में बैठा मोहसिन मुलानी एन्क्रिप्टेड टेलीग्राम चैनलों और डार्क वेब फोरम के जरिए ब्रिटिश ग्राहकों से ड्रग्स के ऑर्डर लेता था।
इसके बाद जानकारी दुबई में बैठे सरगना जुबैर पोपटिया और ब्रिटेन में लॉजिस्टिक्स संभाल रहे सलमान अंसारी को भेजी जाती थी। फिर ड्रग्स को ब्रिटेन के कूरियर नेटवर्क और रॉयल पार्सल सर्विसेज के जरिए ग्राहकों तक पहुँचाया जाता था और भुगतान क्रिप्टो वॉलेट में लिया जाता था।
सलमान अंसारी को ब्रिटिश अदालत ने सजा सुनाई थी
जाँच में यह भी सामने आया कि अक्टूबर 2024 में ब्रिटेन की अदालत ने सलमान अंसारी को ड्रग्स तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 6 साल की सजा सुनाई थी। लेकिन खुफिया रिपोर्ट और डिजिटल सबूत बताते हैं कि सलमान मार्च 2026 तक ब्रिटेन की हाई सिक्योरिटी जेल के अंदर से ही टेलीग्राम और दूसरे डिजिटल माध्यमों से पूरे नेटवर्क को चला रहा था।
ब्रिटेन के ड्रग कारोबार से कमाया गया पैसा अंतरराष्ट्रीय हवाला और गुजरात के अंगड़िया नेटवर्क के जरिए अहमदाबाद भेजा जाता था। मोहसिन मुलानी यह रकम लेकर सलमान के जेल में बंद पिता गुलाम सादिक अंसारी तक पहुँचाता था। गुलाम सादिक इस सिंडिकेट का कैश एंकर था और वह इस पैसे को प्रॉपर्टी और दूसरे वैध कारोबारों में लगाता था।
साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की जाँच में यह भी पता चला कि डिजिटल युग और क्रिप्टोकरेंसी आने से पहले यानी 2016 से 2021 के बीच आरोपित वेस्टर्न यूनियन जैसी मनी ट्रांसफर सर्विस (MTSS) के जरिए विदेशों से पैसा मँगाते थे। इस दौरान करीब 9 देशों से 80 लाख रुपए से ज्यादा के लेनदेन की जाँच भी पुलिस कर रही है।
अब तक कुल 9 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया
गुजरात पुलिस ने इस ऑपरेशन में अब तक 9 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार लोगों में अहमदाबाद के मोहम्मद सादिक मुलानी, ऐजाज असलम खान पठान, मोहम्मद जैद सिद्दीकी, नावेद अयूब खान पठान, फैज अहमद चिश्ती, सलमान हबीब खान पठान और गुलाम सादिक अंसारी शामिल हैं।
इसके अलावा मुंबई के जीशान सिराज मोतीवाला और हरियाणा के करनाल निवासी लवप्रीत सिंह को भी पकड़ा गया है। सभी आरोपितों पर IPC की धारा 111, 153 और 61 के साथ IT Act 2008 की गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है।
इन पर देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालने और आतंकी साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं। मामले का मुख्य आरोपित मोहम्मद जुबैर पोपटिया फिलहाल दुबई में बताया जा रहा है और उसे भारत लाने के लिए प्रत्यर्पण प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
पुलिस और केंद्रीय एजेंसियाँ इस नेटवर्क से जुड़ी करोड़ों रुपए की बेनामी संपत्तियों और बैंक खातों को जब्त करने की कार्रवाई कर रही हैं। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियाँ होने की संभावना है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


