Sunday, July 25, 2021
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भारत विरोधी नहीं हो सकता हिंदू, देशभक्ति उसका मूल चरित्र: गाँधी पर किताब का विमोचन कर बोले RSS प्रमुख मोहन भागवत

"अगर कोई हिन्दू है तो वह अवश्य ही देशभक्त होगा। यह उसके स्वभाव और चरित्र का हिस्सा होगा। ऐसा हो सकता है कि उसकी राष्ट्रभक्ति को जागृत करने की आवश्यकता पड़े, लेकिन वह राष्ट्र विरोधी नहीं हो सकता है।"

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने शुक्रवार (1 जनवरी 2021) को महात्मा गाँधी पर लिखी गई एक पुस्तक का विमोचन किया। इस मौके पर उन्होंने देशभक्ति पर महात्मा गाँधी के विचारों का ज़िक्र करते हुए कहा कि देशभक्ति धर्म से पनपती है। अगर कोई हिन्दू है तो वह देशभक्त होगा ही। यह उसका मूलभूत स्वभाव और चरित्र होगा। भागवत ने यह भी कहा कि गाँधी जी मानते थे कि जो स्वधर्म को नहीं समझता है, वह स्वराज को भी नहीं समझ सकता है। 

जेके बजाज और एमडी श्रीनिवास द्वारा लिखी गई किताब ‘मेकिंग ऑफ़ हिन्दू पेट्रियट: बैकग्राउंड ऑफ़ गाँधी हिन्द स्वराज’ के विमोचन पर संघ प्रमुख ने और भी कई बातें कहीं। उनके मुताबिक़, “इस तरह के कयासों का कोई मतलब नहीं है कि संघ महात्मा गाँधी को साधने का प्रयास कर रहा है। गाँधी जी जैसे महान व्यक्तियों को कोई नहीं साध सकता है। अगर कोई हिन्दू है तो वह अवश्य ही देशभक्त होगा। यह उसके स्वभाव और चरित्र का हिस्सा होगा। ऐसा हो सकता है कि उसकी राष्ट्रभक्ति को जागृत करने की आवश्यकता पड़े, लेकिन वह राष्ट्र विरोधी नहीं हो सकता है। देशभक्ति का मतलब सिर्फ ज़मीन से प्रेम नहीं। इसका मतलब लोगों, नदियों, संस्कृतियों, परम्पराओं इन सभी से प्रेम है।” 

किताब में किए गए शोध का हवाला देते हुए मोहन भागवत ने कहा, “धर्म और देशभक्ति अलग नहीं है, क्योंकि अपनी मातृभूमि के लिए प्रेम आध्यात्म से ही पनपता है। गाँधी जी खुद कहते थे कि धर्म राष्ट्रभक्ति का केंद्र है। गाँधी जी का कहना था कि हमारा धर्म सब धर्मों का धर्म है। भारत के सभी पंथों और सम्प्रदायों में एक ही सत्य छुपा है ‘एकता की विविधता’। गाँधी जी को इसका आभास था और वह इस पर चिंतित रहते थे कि अंग्रेज़ हिन्दू और मुसलमानों को कभी संगठित नहीं होने देंगे। इसलिए उन्होंने ऐसा कदम उठाया जिससे हिन्दू और मुसलमानों की मौजूदगी के बावजूद भारत एक राष्ट्र बना रहेगा।”  

संघ प्रमुख ने कहा, “महात्मा गाँधी यह समझते थे कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल राज्य में बैठे लोगों के लिए नहीं है। हम जैसे भारत का निर्माण करना चाहते हैं, वैसे जीवन जीने वाले लोग होने चाहिए। पाश्चात्य सभ्यता हमें दबा कर हमारा जीवन नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। गाँधी जी ने अहिंसा की बात ऐसे दौर में सोची जो आज भी अनुकरणीय है। हिन्दू धर्म में ऐसे हज़ारों उदाहरण हैं जब लोगों ने अपना बलिदान किया, लेकिन धर्म पर आँच नहीं आने दी। गाँधी जी ने कहा था कि वह अपने धर्म में बचे अंतिम व्यक्ति भी होंगे तब भी वह अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे।” 

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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