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SC/ST का केस दर्ज करने में सतर्कता बरतें, झूठे मामले रद्द करने में संकोच ना करें: केरल हाई कोर्ट का निर्देश, जानिए क्यों कहा ‘दबाव’ बनाने को गढ़े जाते हैं मामले

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति में उचित जाँच के बिना फाइनल रिपोर्ट पेश की गई है। इसमें कोई नया गवाह और सबूत भी पेश नहीं किया गया है। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता और महिला के खिलाफ दायर केस पूरी तरह झूठ पर आधारित है। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता पर इसलिए SC/ST एक्ट का मुकदमा दर्ज कराया, क्योंकि वह याचिकर्ता को दिए गए 6 लाख रुपए को वापस पाने में नाकाम थी।

केरल हाई कोर्ट ने SC/ST एक्ट को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस में की गई शिकायतों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते या जब पक्षकारों के बीच मुकदमे असफल हो जाते हैं या मुकदमे लंबित होते हैं तो एससी/एसटी अधिनियम के तहत आरोप लगाना इस बात का मजबूत संकेत देता है कि ऐसे आरोप झूठे हो सकते हैं। ऐसे मामलों को बिना हिचकिचाहट के रद्द कर देना चाहिए।

मामले की सुनवाई करते हुए केरल हाई कोर्ट के न्यायाधीश ए. बदरुद्दीन ने आगाह किया कि एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए झूठे आरोपों की जाँच में एजेंसियों और अदालतों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अधिनियम को लागू करने के पीछे SC/ST को शोषण से बचाना है और वास्तविक मामलों में आरोपित के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि SC/ST एक्ट में अपराध दर्ज करते समय जाँच अधिकारियों को गंभीर अपराधों में निर्दोष पीड़ितों को झूठा फँसाने से बचने के लिए अपना दिमाग लगाना चाहिए, ताकि निर्दोष व्यक्ति को झूठे मामले में फँसाने से बचाया जा सके। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामले में सारी प्रोसीडिंग को रद्द कर दिया।

दरअसल, गैर-SC/ST समुदाय से ताल्लुक रखने वाले याचिकाकर्ता पर आरोप है कि उसने अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले शिकायतकर्ता को सार्वजनिक रूप से उसकी जाति का नाम लेकर अपमानित किया और धमकाया। याचिकाकर्ता के साथ आई एक अन्य महिला को भी दूसरे आरोपित के रूप में शामिल किया गया है। इस मामले में दोनों के खिलाफ सा 2015 में SC/ST एक्ट में मुकदमा दर्ज हो गया।

मामले की जाँच के बाद पुलिस ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में कहा कि आरोप झूठे हैं। इसलिए मामले को बंद किया जाए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने डीजीपी को शिकायत दी और आगे जाँच का आदेश दिया गया। आगे की जाँच के बाद याचिकाकर्ता को एकमात्र आरोपित बनाते हुए अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई। इससे दुखी होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति में उचित जाँच के बिना फाइनल रिपोर्ट पेश की गई है। इसमें कोई नया गवाह और सबूत भी पेश नहीं किया गया है। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता और महिला के खिलाफ दायर केस पूरी तरह झूठ पर आधारित है। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता पर इसलिए SC/ST एक्ट का मुकदमा दर्ज कराया, क्योंकि वह याचिकर्ता को दिए गए 6 लाख रुपए को वापस पाने में नाकाम थी।

कोर्ट ने कहा, “इस समय एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग वादियों द्वारा बुरे या दुष्ट विचार रखने या द्वेषपूर्ण होने के कारण हो रहा है। एससी/एसटी अधिनियम में गरीब व्यक्ति को झूठे तरीके से फँसाना, उन्हें गिरफ़्तार कराने, हिरासत में लेने और कड़ी सज़ा देने की धमकी देकर दबाव डालना या शिकायतकर्ता की अवैध और अतार्किक माँगों पर ध्यान देने के लिए मजबूर करना दुखद है।”

इस प्रकार कोर्ट ने चेतावनी दी कि एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों के दुरुपयोग पर ध्यान दिया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि जाँच अधिकारियों को एससी/एसटी अधिनियम के तहत मामले दर्ज करने से पहले अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए, ताकि निर्दोष व्यक्तियों को झूठे मामलों में फँसाने से बचाया जा सके। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामले एवं कार्रवाई को रद्द कर दिया।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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