Monday, November 29, 2021
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जानिए कुम्भ को: शंकराचार्य ने संगठित किया, सम्राट हर्षवर्धन ने प्रचारित

प्रसिद्व यात्री व्हेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में कुम्भ मेला की महानता का उल्लेख किया है। व्हेनसांग का उल्लेख राजा हर्षवर्धन की दानवीरता का सार संक्षेपण भी करती है।

हिन्दू तीर्थ परम्परा में कुम्भ एक सर्वाधिक पवित्र पर्व है। करोड़ों महिलाएँ, पुरूष, आध्यात्मिक साधकगण और पर्यटक आस्था एवं विश्वास की दृष्टि से शामिल होते हैं। यह विद्वानों के लिये शोध का विषय है कि कब कुम्भ के बारे में जनश्रुति आरम्भ हुई थी और कब इसने तीर्थयात्रियों को आकर्षित करना आरम्भ किया। किन्तु, यह एक स्थापित सत्य है कि प्रयाग कुम्भ सनातन परम्परा का केन्द्र बिन्दु रहा है और ऐसे विस्तृत पटल पर एक घटना एक दिन में घटित नहीं होती है बल्कि धीरे-धीरे एक लम्बी कालावधि में विकसित होती है।

भारत सदैव से सनातन परम्परा का वाहक रहा है। सनातन परम्परा ही है जिसने भारतीय मनीषियों को ही नहीं बल्कि जो भी यहाँ आया उसे उसके प्रश्नों का समुचित उत्तर मिला। ऐसा कोई इतिहास नहीं मिलता कि सनातन परम्परा में किसी को सवाल पूछने या प्रश्न खड़ा करने के लिए जान से मार दिया गया हो। सत्य की ख़ोज ही सनातन का मूल रहा है।

यहाँ ऋषि-मुनि, साधु-संत और गृहस्थ भी धर्मलाभ के लिए, आत्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए हज़ारों-लाखों की सँख्या में पवित्र तीर्थों में निष्पाप होने के लिए जाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में मुक्तिप्रद कुम्भयोग में अनगिनत लोगों का समावेश हो, तो ये भारतीयों के लिए कोई अकल्पनीय घटना नहीं है।

कुम्भ मेला कितना प्राचीन है, इस बारे में कोई निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता। कौन इसके प्रथम उद्घोषक थे कौन आयोजक? इसका पता लगाना भी कठिन है। अमृत कुम्भ के बारे में शास्त्रों में विस्तृत चर्चा है। संभवत:, सनातन धर्म जितना पुराना है, उतना ही प्राचीन कुम्भ मेला भी है।

फिर भी इतिहास के आईने में अगर देंखे तो कुम्भ मेला का मूल को 8वीं सदी के महान दार्शनिक शंकर से जुड़ती है। जिन्होंने वाद विवाद एवं विवेचना हेतु विद्वान सन्यासीगण की नियमित सभा परम्परा की शुरुआत की थी। आदिगुरु शंकर कुम्भ मेला के संगठक भी थे।

कहते हैं, बौद्ध धर्म के विस्तृत फैलाव के दौर में जब देश में अनाचार, व्यभिचार, कदाचार तेजी से फैलने लगा। जब वैदिक धर्म-परम्परा को नष्ट करने की पुरज़ोर कोशिश होने लगी तब वैदिक धर्म के मूर्त विग्रह महान प्रणेता श्रीमत शंकराचार्य ने अपनी अपूर्व प्रतिभा तथा आध्यात्मिक शक्ति के बल पर समस्त भारत में वेदांत की विजय पताका फहराई।

आदि शंकराचार्य
आदि शंकराचार्य

उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम, भारत के चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित कर उन्होंने संन्यासी-संघ का उद्घाटन किया। जो आज शंकराचार्य पीठ के नाम से प्रसिद्द है। शंकराचार्य ने ही सनातन धर्म के महात्म्य की पुनर्स्थापना के लिए लोगों को उपस्थित हो शास्त्र चर्चा का आदेश दिया। उसी समय से ही वर्तमान कुम्भ मेला की प्रतिष्ठा मानी जाती है। आगे चलकर धीरे-धीरे सभी संप्रदायों का समागम होकर यह महोत्सव महिमान्वित होकर वर्तमान समय में विराट रूप धारण कर चुका है।

कहा गया है, साधु-महापुरूषों के पदार्पण से ही तीर्थ पवित्रता तथा अपने नाम की योग्यता को प्राप्त करता है। लाखों-करोड़ों की संख्या में साधु-संन्यासी जहाँ उपस्थित होते हैं। वहाँ आकाश-पाताल, जल-वायु, धूलकण से लेकर सभी पञ्च महाभूत तक मुक्तिप्रद और धर्म भाववर्धक बन जाते हैं।

साधु-सम्मेलन ही कुम्भ मेला की जीवनी-शक्ति हैं। यहाँ नर-नारियों का जो विशाल समूह आता है, वह सिर्फ़ तीर्थस्‍थान के निमित्त नहीं आते जितना कि पुन्यात्मा साधु-महात्माओं के दर्शन की लालसा लेकर आते हैं। उनका चरण स्पर्श और आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं।

ये जो करोड़ों की संख्या में सर्वत्यागी, तपस्वी साधु-महात्मा, जो लोग मृत्यु पर जय प्राप्त करने के उपरान्त अमृतत्व की तलाश के व्रती हैं। उनका विराट समावेश जहाँ भी है। वहीं तो अमृत है। कुम्भ स्वयं अमृतवर्षी है। पौराणिक कहानी का रहस्यमय रूपक आज इसी प्रकार वास्तविकता ग्रहण कर चुका है।

कलशस्य मुखे विष्णु कण्ठे रुद्र समाश्रित:।
मूलेतत्रस्‍थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्थिता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्‍धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण।।
अंगैश्च सहिता: सर्वे कुम्भं तु समाश्रिता:।

सम्राट हर्षवर्धन
सम्राट हर्षवर्धन

ऐतिहासिक साक्ष्य कालनिर्धारण के रूप में इस बात के प्रमाण हैं कि राजा हर्षवर्धन का शासन काल (664 ईसा पूर्व) में कुम्भ मेला को विभिन्न भौगोलिक स्थितियों के मध्य व्यापक मान्यता एवं प्रसिद्धि प्राप्त हो गयी थी। प्रसिद्व यात्री व्हेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में कुम्भ मेला की महानता का उल्लेख किया है। व्हेनसांग का उल्लेख राजा हर्षवर्धन की दानवीरता का सार संक्षेपण भी करती है।

राजा हर्ष प्रयाग की रेत पर एक महान पंचवर्षीय सम्मेलन का आयोजन करते थे, जहाँ पवित्र नदियों का संगम होता है और अपनी धन-सम्पत्ति को सभी वर्गों के गरीब एवं धार्मिक लोगों में बाँट देते थे।

प्रयागराज में कुम्भ मेला को ज्ञान एवं प्रकाश के श्रोत के रूप में सभी कुम्भ पर्वों में व्यापक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। सूर्य जो ज्ञान का प्रतीक है, इस पर्व में उनकी अपार महिमा है।

कुम्भ का तात्विक अर्थ

कुम्भ सृष्टि में सभी संस्कृतियों का संगम है। कुम्भ आध्यत्मिक चेतना मानवता, नदियों, वनों एवं ऋषि संस्कृति का प्रवाह है। कुम्भ जीवन की गतिशीलता एवं मानव जीवन का संयोजन है। कुम्भ ऊर्जा का श्रोत एवं आत्मप्रकाश का मार्ग है।

जानिए क्यों प्रयाग को कहा जाता है तीर्थों का राजा

 

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

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