मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पति पर बेटी के बलात्कार का झूठा आरोप लगाने वाली माँ पर चलेगा मुकदमा

इस मामले को देखने के पहले अदालत यह मानने को तैयार नहीं थी कि ऐसा भी हो सकता है कि कोई माँ अपनी बेटी के बलात्कार का झूठा आरोप बच्ची के पिता पर ही लगा दे, और यह मुकदमा अदालत की आँखें खोल देने वाला है। इससे अदालत को यह समझ में आया कि पॉक्सो एक्ट का किस तरह दुरुपयोग हो सकता है।

मद्रास हाई कोर्ट में मंगलवार (21 अगस्त) को एक कस्टडी की लड़ाई और बच्ची पर पिता द्वारा यौन शोषण के मुकदमे ने ऐसा मोड़ लिया कि अदालत के जज को कहना पड़ गया, “इस मुकदमे ने अदालत के ज़मीर को हिला कर रख दिया है…” पता चला कि बलात्कार का आरोपित पिता न केवल निर्दोष है, बल्कि उस पर उसकी पत्नी, उसकी बेटी की माँ ने इसलिए ऐसा घिनौना इलज़ाम लगाया क्योंकि दम्पत्ति की दो बेटियों में से कोई भी मॉं के साथ नहीं रहना चाहती थी। अदालत ने माँ के खिलाफ पुलिस को तुरंत पॉक्सो एक्ट के तहत झूठी शिकायत करने पर होने वाली कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया है। जस्टिस आनंद वेंकटेश ने उम्मीद भी जताई कि यह निर्णय पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग करने की कोशिश करने वालों के लिए के नज़ीर होगा।

11 साल की बच्ची को बलात्कार से प्रेग्ननेंट करने का आरोप

2018 में पत्नी ने पति पर आरोप लगाया कि पति ने 2003 में विवाहित हुए दम्पत्ति की 11 साल की बेटी के साथ बलात्कार किया और उसे गर्भवती कर दिया। आगे पत्नी ने दावा यह भी किया कि उसने (पत्नी ने) वह गर्भ किसी ‘नेटिव मेडिसिन’ (देसी इलाज) से गिरा दिया। उसकी शिकायत के आधार पर पति के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

लेकिन उच्च न्यायालय द्वारा ‘पीड़िता’ बच्ची से पूछताछ के बाद आरोपित पिता को अग्रिम जमानत मिल गई। बच्ची ने पिता के द्वारा किसी भी प्रकार के अश्लील या यौन संबंध से इंकार किया। इसके बाद पिता ने अपने खिलाफ मुकदमे को पत्नी द्वारा निजी दुश्मनी से प्रेरित बताते हुए अदालत से मुकदमे को निरस्त करने की अपील की। मामले की और अधिक जाँच के पश्चात न्यायालय ने पिता की अपील स्वीकार कर ली।

‘दोनों बच्चियाँ पिता के साथ ही रहना चाहतीं हैं’

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अपने आदेश में अदालत ने लिखा कि उसके (अदालत के) और 11-वर्षीया बच्ची के बीच हुई बात के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि यह झूठा मुकदमा माँ ने उस बच्ची और उसकी डेढ़-वर्षीया बहन की कस्टडी के लिए दायर किया है। बच्ची ने अदालत के सामने किसी भी प्रकार के ‘देसी इलाज’ या किसी अस्पताल में ले जाकर गर्भपात किए जाने से भी इंकार किया है। और-तो-और, बच्ची ने जज को बताया कि वह और उसकी बहन, दोनों ही अपने पिता के साथ जाना चाहतीं हैं।

‘और भी हैं झूठे मुकदमे’

इसके आगे जस्टिस वेंकटेश ने जो कहा, वह इस केस विशेष से भी महत्वपूर्ण, इस पूरे प्रकरण का सबसे ज़्यादा गौर करने और याद रखने लायक वाक्य है। “कई बार ऐसा हुआ है कि अदालत का ध्यान इससे मिलते-जुलते मामलों की तरफ आकर्षित किया गया है, कि अकसर झूठा मुकदमा किया जाता है मानों पति ने पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध किया हो; और इस अदालत को यह सूचित किया गया है कि ऐसी सस्ती चालें फैमिली कोर्ट के मुकदमों में अपनाई जातीं हैं, ताकि पतियों को दबाव डाल कर लाइन पर लाया जा सके। (इस मामले को देखने के) पहले अदालत यह मानने को तैयार नहीं थी कि ऐसा भी हो सकता है (कि कोई माँ अपनी बेटी के बलात्कार का झूठा आरोप बच्ची के पिता पर ही लगा दे), और यह मुकदमा अदालत की आँखें खोल देने वाला है। इससे अदालत को यह समझ में आया कि पॉक्सो एक्ट का किस तरह दुरुपयोग हो सकता है।

द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के अनुसार अंत में जज ने घोषित किया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ मुकदमा एक मिनट और भी जारी नहीं रह सकता, और पुलिस को FIR तत्काल निरस्त करने का आदेश दिया। साथ ही जोड़ा कि झूठी शिकायत करने वाली महिला भी बचनी नहीं चाहिए। अदालत ने हिदायत दी कि उसे पति के खिलाफ झूठी शिकायत, वह भी बेटी के नाम पर, करने का परिणाम भुगतवाया ही जाना चाहिए।

“पुलिस को आदेश दिया जाता है कि द्वितीय प्रतिवादी (महिला) के खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 22 के तहत तुरंत मुकदमा झूठी शिकायत करने का दर्ज किया जाए, और उसके खिलाफ कानून के हिसाब से कार्रवाई की जाए। यह मुकदमा अपने निहित स्वार्थों के लिए इस कानून के प्रावधानों का दुरुपयोग करने वालों के लिए नज़ीर होना चाहिए।”

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