NOTA दबाने में बिहारी मतदाता सबसे आगे, गोपालगंज रहा टॉप पर

देश में सबसे ज्यादा बिहार के मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाकर अपने उम्मीदवारों को नकार दिया। ऐसा लगता है कि इन मतदाताओं को न भाजपा या जदयू पसंद है और न ही कॉन्ग्रेस, राजद या फिर कोई अन्य पार्टियाँ।

इस बार के लोकसभा चुनाव में नोटा (NOTA) दबाने के मामले में बिहार सबसे आगे रहा। बिहार के 40 संसदीय क्षेत्रों में से 13 सीटों पर जनता ने नोटा को तीसरे विकल्प के रुप में चुना। यानी देश में सबसे ज्यादा बिहार के मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाकर अपने उम्मीदवारों को नकार दिया। ऐसा लगता है कि इन मतदाताओं को न भाजपा या जदयू पसंद है और न ही कॉन्ग्रेस, राजद या फिर कोई अन्य पार्टियाँ। तभी तो यहाँ के 8.17 लाख मतदाताओं ने नोटा का प्रयोग किया।

पूरे बिहार की बात करें, तो नोटा का बटन सर्वाधिक गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र में 51,660 मतदाताओं ने दबाया, जो देश में सबसे ज्यादा है। इस सीट पर जदयू के आलोक कुमार सुमन को जीत मिली, जिन्होंने राजद उम्मीदवार सुरेंद्र राम को 2.86 लाख वोटों से शिकस्त दी। इसके अलावा बिहार के अररिया में 20,618 मतदाताओं ने तो वहीं, कटिहार में 20,584 मतदाताओं ने नोटा बटन दबाकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

दूसरे नंबर पर पश्चिम चंपारण के मतदाताओं ने नोटा के बटन का इस्तेमाल किया। यहाँ के तकरीबन 45,669 मतदाताओं ने नोटा दबाया। भाजपा सांसद संजय जायसवाल ने रालोसपा के ब्रजेश कुशवाहा को 2.93 लाख वोटों से हराकर इस जीत पर अपनी जीत बरकरार रखी।

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इसके बाद तीसरे नंबर पर आता है समस्तीपुर। यहाँ के 35,417 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए नोटा के विकल्प को चुना। लोजपा के रामचंद्र पासवान ने कॉन्ग्रेस के अशोक कुमार को 1.52 लाख मतों से मात देकर ये सीट अपने नाम कर ली। वहीं, सारण में 28267, पूर्वी चंपारण में 22706, जमुई में 39496, दरभंगा में 20468, भागलपुर में 31528, आरा में 21825, गया में 30030, नवादा में 35147 मतदाताओं ने किसी पार्टी को वोट देने की बजाय नोटा बटन दबाना पसंद किया।

हालाँकि, इस बार के चुनाव परिणाम को देखें तो ऐसा लगता है कि इस बार बिहार के लोगों ने जात-पात से ऊपर उठकर वोट किया है मगर इसके साथ ही नोटा का प्रयोग करने में भी प्रथम स्थान पर रहा। खैर, ये तो लोगों की अपनी-अपनी पसंद होती है। यही तो लोकसंत्र की खूबसूरती है। लेकिन मतदाताओं को ये समझना चाहिए कि नोटा दबाने से किसी समस्या का हल नहीं निकलने वाला है। इससे सिर्फ वोट ही बर्बाद होता है और कुछ नहीं।  

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