Sunday, July 21, 2024
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केस ढोते-ढोते पिता भी चल बसे, माँ रहती हैं बीमार : दिल्ली दंगों में पहली सज़ा दिनेश यादव को, गरीब परिवार ने कहा – घूस न देने पर फँसाया

हरीश के पिता का नाम जगन्नाथ यादव था। हरीश ने बताया, "मेरे पिता को थाने में लगातार टॉर्चर किया जाता रहा। उन्हें घंटों थाने में बिठाया जाता रहा और पैसों की माँग की जाती रही। हफ्ते में 4-5 दिन उन्हें थाने बुलाया जाता रहा। हम गरीब लोग इतना पैसा नहीं जुटा पाए।"

फरवरी 2020 में हुए दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में 20 जनवरी, 2022 को पहली सज़ा सुनाई गई है। गोकुलपुरी थाना क्षेत्र के भागीरथी विहार में रहने वाले दिनेश यादव को कड़कड़डूमा कोर्ट ने दोषी पाया है। उन्हें 5 साल की सज़ा और 12,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। 6 दिसंबर 2021 को एडिशनल सेशन जज वीरेंद्र भट ने दिनेश यादव को दोषी करार दिया था। दिनेश यादव पर मुस्लिम समुदाय की 73 वर्षीया एक वृद्धा के मकान में आगज़नी करने और उनकी भैंस और उसका बच्चा भी खोल ले जाने का आरोप था।

ऑपइंडिया की टीम पहुँची दिनेश यादव के घर

ऑपइंडिया की टीम दिनेश यादव के घर पहुँची। घर गोकुलपुरी क्षेत्र के नाले से हो कर जाता है। संकरी गलियों से होते हुए हम दिनेश यादव के 22 नंबर मकान E ब्लॉक पहुँचे। घर का लैंडमार्क ध्रुव पब्लिक स्कूल है। कॉलोनी मध्यम निम्न वर्गीय लोगों की है। अधिकतर लोग यहाँ मजदूरी या छोटी मोटी नौकरी के माध्यम से जीवन यापन कर रहे हैं। दिनेश यादव के मकान में प्लास्टर नहीं हुआ है। घर के आगे नीले रंग का गेट लगा मिला।

दिनेश यादव का घर

घर के अंदर दीवालों पर छपे हैं देवताओं के चित्र

दिनेश यादव का मकान लगभग 35 फिट लंबा और 15 फिट चौड़ा है। इसमें कुल 3 छोटे – छोटे कमरे हैं। छत पर एक कमरा उनके बड़े भाई हरीश यादव का है। दिनेश यादव के घर के अंदर की दीवालों पर हनुमान, कृष्ण की पेंटिंग वाले चित्र हैं। घर वालों ने चित्रों को खुद दिनेश द्वारा बनाया गया बताया। दीवाल पर किया पेंट कई जगहों पर उधड़ता दिखाई दिया।

घर की दीवालों पर देवताओं के चित्र

नहाने आदि के लिए कोई अलग से बाथरूम आदि नहीं है। सीढ़ियों के नीचे कुछ प्लास्टिक की बाल्टियाँ रखी मिलीं जिसमें पीने और नहाने आदि का पानी भरा था।

दिनेश का घर

दिनेश की माँ ने बेटे को बताया बेगुनाह

ऑपइंडिया से बात करते हुए दिनेश की माँ ने कहा, “मेरा नाम बुधा है। मैं UP के आज़मगढ़ जिले की रहने वाली हूँ। मेरे 2 बेटे हैं। दोनों मजदूरी करते हैं। मेरे बेटों पर इस से पहले कोई केस नहीं था। मैं दिल्ली के इस घर पर में 33 साल से रह रही हूँ। मेरे बच्चे कहीं नहीं गए। उनका नाम लिखवाया गया। आरोप लगाने वाली एक विधवा महिला है जो मुस्लिम है। उसी से गवाही करवाई गई है। फिर पुलिस को बुला कर बच्चों को गिरफ्तार करवाया गया। बच्चों को मार-पीट कर के गाली देते हुए पुलिस वाले ले गए थे। हमारे घर पर कुर्की – नीलामी का पोस्टर छाप रहे थे।”

पति की मौत बेटे की गिरफ्तारी के बाद

दिनेश की माँ ने आगे बताया, “बेटे की गिरफ्तारी के बाद मेरे पति की कुछ दिन बाद मौत हो गई। उनके शरीर ने काम करना बंद कर दिया था। अब घर का खर्च भगवान भरोसे चल रहा है। कोर्ट-कचहरी का काम मेरा बड़ा बेटा देख रहा है। घर में कोई न होने के चलते मैंने अपनी विवाहिता बेटी को ससुराल से यहाँ बुला लिया है। हमें किसी का कोई सपोर्ट नहीं है। गिरफ्तारी से सज़ा तक कोई भी हमारे दरवाजे पर नहीं आया। मेरे बेटे के साथ 4 लोग फँसे हैं। बाकियों का क्या हुआ हमें नहीं पता। भैंस खोलने आदि के आरोप बस फँसाने के लिए लगाए गए हैं।”

आरोप लगाने वाली महिला का पहले ही अपने समुदाय के लोगों से झगड़ा

दिनेश की माँ ने कहा, “आरोप लगाने वाली मुस्लिम महिला का पहले से ही मुस्लिम लोगों से झगड़ा चल रहा था। भैंस पहले से ही वही लोग खोल कर ले गए थे। वो सभी खुद बचने के हिन्दुओं पर आरोप लगा दिए हैं। हमारे इलाके में खबर फैली कि इधर मुस्लिम लोग आ रहे हैं मार करने। तब इस कॉलोनी वाले सारे लोग जमा हो गए थे। सब लोग मार करने गए कि इधर मुस्लिम न आएँ। कोई आया भी नहीं। मेरा बेटा भी वही देखने गया था। मेरे बेटे से ‘समाज वाली बात’ कही गई। कॉलोनी वालों ने इसे ‘समाज की लड़ाई’ बताया था। कुछ वहाँ से भाग लिए और कुछ खड़े रहे। जो खड़े रहे उनके नाम लगा दिए गए। मेरी कॉलोनी से 22 लोगों के नाम आए थे।”

पुलिस वाले माँग रहे थे रिश्वत

बुधा देवी ने आगे बताया, “हमने किसी रिश्तेदार से मदद नहीं ली। ये लड़ाई समाज की थी। इस समाज के लोग नहीं उठ रहे हैं। अब कर ही क्या सकते हैं। पुलिस वालों का व्यवहार बहुत खराब था। उन्होंने दूसरों से घूस खा कर ये सब किया है। हमारे परिवार से 4-5 लाख रुपए माँगे जा रहे थे। हम गरीब लोग कहाँ से देते इतना पैसा। हम पैसा नहीं दे पाए।”

पति के न रहने से अब मुझे कुछ नहीं पता कि क्या करना है आगे

दिनेश की माँ के मुताबिक, “मेरे पति के न रहने से मुझे कुछ पता ही नहीं कि अब आगे करूँ क्या? वही हर चीज के मालिक थे। किस कोर्ट में कहाँ जाना है ये हमें नहीं पता। मेरे बच्चे किस समझदारी से चलेंगे पता नहीं। मेरे पास कोई कागज़ नहीं है। बाकी जानकारी मेरे बेटे को पता होगी।”

माँ को मत भेजना जेल में

दिनेश की माँ ने कहा, “जब से मेरा बेटा पकड़ा गया है तब से मैं उसे देख नहीं पाई हूँ। वो जेल में मिलने गए अपने भाई से कहता है कि माँ को यहाँ मत भेजना। उनकी तबीयत वैसे भी खराब रहती है। मृत्यु से पहले मेरे पति 2-4 साल से काम बंद कर के बेटों के भरोसे घर बैठ चुके थे। वो भी बेटे की तरह मजदूरी कर के परिवार पालते थे।”

दिनेश यादव की माँ से बात करते ऑपइंडिया रिपोर्टर राहुल पांडेय

दिनेश यादव की बहन उर्मिला ने की ऑपइंडिया से बात

दिनेश यादव के भाई उर्मिला ने हमें बताया, “ये समाज की लड़ाई थी। इसी लड़ाई में बच्चे सिर्फ देखने के लिए गए थे। अब हम घर में सिर्फ माँ, भाई और मैं बेटी बचे हैं। मेरा एक बच्चा भी है। दिनेश कक्षा 8 तक पढ़ाई किया था। वो मजदूरी का काम करता था।”

मेरे पिता को किया टार्चर और माँगा गया घूस

दिनेश की बहन ने आगे बताया, “मेरा भाई 3 जून को पकड़ा गया। मेरे पिता की मृत्यु 28 जून को हो गई। मेरे पिता को 4-4 घंटे थाने में बिठाया गया। उन्हें टॉर्चर किया गया। उनसे पैसे माँगे जाते रहे। मेरे घर को नीलाम करने की धमकी दी जाती रही। हम लोगों से बदतमीजी नहीं हुई। मेरे बड़े भाई अपने काम धंधे में लगे रहे। उन्हें कुछ पता नहीं था। मेरे घर में घुस-घुस कर बच्चो को खोजा जाता रहा। छापेमारी के दौरान महिला पुलिस नहीं होती थी। दंगे होने के बाद मेरे भाई का नाम डलवाया गया। जब दंगे हुए तब मेरे भाई का नाम नहीं था। लड़ाई के तीसरे दिन वीडियो बनाई गई। वीडियो जोड़ कर बनाई गई है। मेरे घर की पुताई आदि दिनेश ही कर देता था। मेरी माँ को शुगर और ब्लड प्रेशर की बीमारी है।”

दिनेश यादव की बहन उर्मिला से ऑपइंडिया रिपोर्टर राहुल पांडेय की बातचीत

दिनेश यादव के भाई हरीश यादव ने ऑपइंडिया से बात की

हरीश यादव ने कहा, “दिनेश मेरा छोटा भाई है। मैं मजदूरी कर के घर चलाता हूँ। मुझे 12 हजार वेतन मिलता है। मैं शादीशुदा हूँ जबकि दिनेश की शादी अभी नहीं हुई थी। घर की स्थिति ठीक नहीं है। इसी के चलते मैं घर में प्लास्टर नहीं करवा पा रहा। 2 साल से भाई जेल में है।”

पिता की मौत में पुलिस का टॉर्चर जिम्मेदार

हरीश के पिता का नाम जगन्नाथ यादव था। हरीश ने बताया, “मेरे पिता को थाने में लगातार टॉर्चर किया जाता रहा। उन्हें घंटों थाने में बिठाया जाता रहा और पैसों की माँग की जाती रही। हफ्ते में 4-5 दिन उन्हें थाने बुलाया जाता रहा। हम गरीब लोग इतना पैसा नहीं जुटा पाए। हमारे भाई की चार्जशीट का बोझ 14 से 28 किलो का हो गया था। सरकारी कागज़ों का वजन इतना था कि उसको ढोते हुए मेरे कंधे दर्द करने लगे थे। जिस महिला के बयान पर मेरे भाई को दोषी बताया गया वो खुद ही मेरे भाई को दोषी नहीं मानती। यद्यपि इसको उन्होंने लिखित रूप से नहीं दिया। उनका कोई नुकसान नहीं हुआ था। नाले के पास 4-5 मुस्लिम परिवार हैं। उन्होंने ही ये सब बवाल मचाया था।”

सबसे ज्यादा दोषी तो ताहिर हुसैन पर उन्हें सज़ा नहीं

हरीश ने कहा, “मीडिया ही कहती थी कि ताहिर हुसैन के घर पर गुलेल बनी हुई थी। लेकिन वो पैसे वाले थे। उन्हें सज़ा नहीं हुई। मेरे भाई को निर्दोष फँसा दिया गया। जबकि मेरा भाई कहीं दंगे में नहीं। जब दंगा हो रहा था तब पुलिस वाले कहाँ थे? ये सब कुछ पुलिस वालों की मनगढ़ंत कहानियाँ हैं। 2 दिनों के अंदर क्या इन बच्चों ने इतनी वारदातें कर दी कि उन पर 20-25 मुकदमे लाद दिए गए। वो लड़के इस से पहले कभी थाने नहीं गए थे। पुलिस ने उन्हें इतना बड़ा क्रिमिनल बना दिया।”

मेरा भाई मंडावली जेल में, बोला मेरी चिंता के बदले घर संभालों

हरीश ने आगे कहा, “मेरा भाई मंडावली की 11 नंबर जेल में बंद है। उसके साथ आस पास के 4 लड़कों का गैंग बना दिया गया। सबके घर वालों के हालत ठीक नही हैं। वो सब भी हम लोगों की तरह मेहनत मजदूरी करने वाले परिवारों से हैं। पहले मैंने वकील किया था जब मेरे पिता नहीं रहे थे। उसी दौरान कोर्ट में मेरा भाई कहता था कि आप मेरी चिंता के बजाय घर संभालो। कोर्ट से मेरे भाई को सरकारी वकील मिला है। फिलहाल मेरा केस शिखा गर्ग संभाल रही हैं। वो मेरा केस फ्री में देख रहीं हैं।

हफ्ते भर पहले जज साहब ने कोर्ट में भाई को निर्दोष कहा था

हरीश ने कहा, “हफ्ते भर पहले इन्ही जज साहब ने ही कोर्ट में कहा था कि इन लड़कों को पुलिस के कहने पर सज़ा नहीं दी जा सकती। हफ्ते भर पहले मैंने न्यूज़ पेपर में पढ़ा था ये बच्चे निर्दोष हैं। हफ्ते भर में ही पता नहीं ऐसा क्या हो गया कि मेरे भाई को सज़ा दे दी गई। अब तो सब पुलिस वाले ही करने वाले ही हो गए हैं। हमारी कौन सुनने वाला है ?”

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जाएँगे

हरीश ने कहा कि, “जहाँ तक साँस , वहाँ तक आस। हमारा भाई है वो। हम उसे नहीं छोड़ सकते। अभी हम हाईकोर्ट जाएँगे। वहाँ से जरूरी हुआ तो सुप्रीम कोर्ट भी जाएँगे। हमारे पिता ने मजदूरी कर के हमें संभाला है। उन्हें दंगों और पुलिस के कारनामों ने मार डाला। अब हम भी मजदूरी कर रहे थे। मेरे भाई को जीते जी मार डाला गया है। आज 2 सालों से मेरे घर में कोई भी नेता आदि मिलने नहीं आया।”

मुस्लिमों में एकता, पर हिन्दुओं में नहीं

हरीश ने आगे कहा, “मुस्लिमों में कोई बात हो जाती है तो उनकी तरफ से सब एकजुट हो जाते हैं। लेकिन हिन्दुओं में एकता नहीं है। तभी मुस्लिम हम पर हावी होते जा रहे हैं। इसी के चलते हमारा छोटा भाई आज बंद है। मैं अपने भाई को निर्दोष मानता ही नहीं बल्कि वो सच में निर्दोष है। मेरा भाई किसी भी दंगे में शामिल नहीं है। लॉक डाउन के दौरान पुलिस वाले हमारे घर पर आते रहे। हमारा भाई गली में खेल रहा था। उसे पकड़ कर ले गए। उन्हें न जाने क्या दिखा कर बता दिया गया कि ये तुम हो।”

आरोप लगाने वालों की स्थिति हमारे घर से कई गुना बेहतर

हरीश ने आगे कहा, “जिस महिला ने मेरे भाई पर आरोप लगाया है उसका नाम मनौरी है। उसके घर के हालात हमारे घर से कई गुना बेहतर हैं। भैंस चोरी आदि की बातें झूठी हैं। उसके बाद किसने क्या किया ये हमें नहीं पता। फरवरी के मामले में गिरफ्तारी जून में हुई। उसमें कई लोगों के नाम थे जिसमें कइयों के नाम निकल गए। इन बच्चों पर कई केस लाद दिए गए। मेरे भाई पर 22 केस दर्ज कर दिए गए। 23-24 साल के लड़के 2 दिन में 22 केस कर सकते हैं क्या ? उन्हें शिव विहार से ले कर मुस्तफाबाद तक के दंगों का दोषी बता दिया गया। पिता जी लॉक डाउन के बाद भाई की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले थे। तब पुलिस वालों ने 3 महीने चार्जशीट लगने का इंतज़ार करने को कहा था। मेरे पिता जी दिमागी तौर पर डिस्टर्ब हो चुके थे और 28 मार्च को उनका देहांत हो गया।”

दिनेश यादव के भाई हरीश यादव से बातचीत करते ऑपइंडिया रिपोर्टर राहुल पांडेय

पड़ोसियों ने कैमरे के आगे कुछ भी बोलने से इंकार किया

ऑपइंडिया ने इस पूरे मामले में पड़ोसियों से जानकारी जुटाने की कोशिश की। मोहल्ले में दिनेश को लोग माइकल के नाम से जानते हैं। मुख्य सड़क से दिनेश यादव के घर के बीच लगभग 250 मीटर की दूरी है। इस बीच कुछ दुकानदारों और अन्य निवासियों से इस मामले में जानकारी लेने की कोशिश की गई। उन सभी ने इस मामले में कैमरे के आगे कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।

दिनेश उर्फ़ माइकल के घर जाने का मार्ग (भागीरथी विहार) , नाला और घर के बगल स्थित स्कूल
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राहुल पाण्डेय
राहुल पाण्डेयhttp://www.opindia.com
धर्म और राष्ट्र की रक्षा को जीवन की प्राथमिकता मानते हुए पत्रकारिता के पथ पर अग्रसर एक प्रशिक्षु। सैनिक व किसान परिवार से संबंधित।

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