मिशनरी स्कूल का काला सच: बल्ले से पीट-पीट कर मासूम की हत्या, स्कूल ने दफ़ना दिया शव

स्कूल प्रशासन ने मामले को छिपाने की हर संभव कोशिश की। विद्यालय प्रबंधन ने बिना पोस्टमॉर्टम कराए छात्र के शव को कैंपस में ही दफ़ना दिया। छात्र के परिजनों को भी इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि उनके बच्चे की मौत हो चुकी है।

देहरादून से एक स्कूल द्वारा घिनौने कृत्य का मामला प्रकाश में आया है। मिशनरी स्कूल चिल्ड्रेन्स होम एकेडमी में सीनियर्स द्वारा 12 वर्षीय एक बच्चे की पीट-पीट कर बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई। आरोप है कि 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले सीनियर्स ने उक्त बच्चे को बिस्किट का पैकेट चोरी करने का दोषी ठहराया और फिर बल्ले व स्टंप्स से पीट-पीट कर उसकी जान ले ली। सीनियर्स ने बच्चे को पहले तो ख़ूब पीटा और फिर उसे वहीं क्लास रूम में ही छोड़कर निकल गए। घायल छात्र को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई। लेकिन, इस घटना के बाद स्कूल प्रशासन ने जिस प्रकार का ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैया अपनाया, उसकी चारो तरफ थू-थू हो रही है।

अमर उजाला के स्थानीय संस्करण में छपी ख़बर

बिस्किट के पैकेट को लेकर शुरू हुआ विवाद इतना हिंसक रूप ले लेगा, किसी ने सोचा भी नहीं था। यह मामला ऋषिकेश तहसील के रानीपोखरी स्थित होम अकादमी नामक स्कूल का है। मृत छात्र का नाम वासु यादव था। स्कूल प्रशासन और जौलीग्रांट के डॉक्टर्स तक ने इसे फ़ूड पॉइज़निंग का मामला बताया, लेकिन पुलिस को इस पर यकीन नहीं हो रहा था। रानीपोखरी थाना ने भी इसे पहले फ़ूड पॉइज़निंग का ही मामला माना था। मृत छात्र पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित हापुड़ का रहने वाला था। उसके पिता कुष्ठ रोगी हैं। पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट आने के बाद पुलिस ने एकेडमी में पढ़ने वाले दो छात्रों और एकेडमी के वॉर्डन, पीटी टीचर और एक अन्य व्यक्ति को इस हत्या का दोषी पाते हुए गिरफ़्तार किया है।

मिशनरी स्कूल की वेबसाइट और इसका नैतिक मूल्य

ज़ी न्यूज़ की मानें तो अकादमी संचालक स्टीफेन सरकार पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं होना पुलिस की भूमिका को भी संदिग्ध बनाता है। समाचार एजेंसी ने मामले को रफ़ा-दफ़ा करने में पुलिस का सहयोग होने की भी बात कही है। 10 मार्च को मृतक सहित सभी बच्चे चर्च गए हुए थे। उसी दौरान यह घटना हुई। सीनियर छात्रों ने मृतक बच्चे को ठन्डे पानी से नहलाया और गन्दा पानी ज़बरन पिलाया।

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पुलिस और स्कूल प्रशासन पर उठते सवाल के अलावा मीडिया पर भी सवाल उठना लाजिमी है, जिसने इस ख़बर को एक मामूली क्राइम की ख़बर तक ही समझा। अखबारों के स्थानीय संस्करणों को छोड़ दें तो किसी भी राष्ट्रीय स्तर की मीडिया ने इस खबर को तवज्जो नहीं दिया। जबकि गूगल पर 2 मिनट के सर्च से यह पता चल जाता कि स्कूल का नाम क्या है, वह किस संस्था से जुड़ा है। लेकिन यह बताने की जरूरत नहीं समझी गई। यह जानकारी जरूरी है ताकि स्कूल के नाम पर गोरखधंधा कर रहे ऐसे मिशनरी स्कूलों में अभिभावक अपने बच्चों का ऐडमिशन आँख मूँद कर कराने से पहले जाँच-पड़ताल कर लें।

दरअसल, नियमानुसार मृत बच्चे का पोस्टमॉर्टेम करवाया जाना चाहिए था लेकिन पुलिस की कार्रवाई के डर से स्कूल ने उनके शव को जल्दबाज़ी में दफ़ना दिया। पुलिस ने मामले में दोनों आरोपित छात्रों के ख़िलाफ़ दफ़ा 302 के तहत मामला दर्ज किया है। वहीं दूसरी तरफ स्कूल प्रशासन के तीन कर्मचारियों हॉस्टल मैनेजर वॉर्डन और स्पोर्ट्स टीचर पर अपराध के सबूत मिटाने के जुर्म में सेक्शन 201 तहत केस दर्ज किया है। पुलिस ने भी कहा कि मृतक की विकेट और बैट से पिटाई की गई है, जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गई। जब तक हॉस्टल वॉर्डन नज़र नहीं पड़ी, तब तक उसका शव वहीं पड़ा हुआ था।

उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग की चेयरपर्सन उषा नेगी के हस्तक्षेप के बाद स्थानीय प्रशासन ने मामले में सख़्ती दिखाई और आगे की कार्रवाई को अंजाम दिया। देहरादून की एसएसपी निवेदिता कुकरेती ने कहा कि बच्चे को अस्पताल पहुँचाने में काफ़ी देर की गई। उन्होंने कहा कि स्कूल प्रशासन ने इस मामले में कई चूक की हैं। स्कूल के कर्मचारियों ने मामले को छिपाने की हर संभव कोशिश की। पुलिस को सूचना दिए बिना ही बच्चे को दफ़ना दिया गया। इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए उषा नेगी ने कहा,

“स्कूल प्रशासन ने मामले को छिपाने की हर संभव कोशिश की। घटना 10 मार्च को हुई और 11 मार्च को हमें इसका पता चला। फिर भी, जब हमें पता चला और हम स्कूल पहुँचे तब पता चला कि विद्यालय प्रबंधन ने बिना पोस्टमॉर्टम कराए छात्र के शव को कैंपस में ही दफ़ना दिया है। छात्र के परिजनों को भी इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि उनके बच्चे की मौत हो चुकी है।”

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