Monday, May 25, 2020
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सद्गुरु के ईशा फाउंडेशन ने प्रोपेगेंडा वेबसाइट के फर्जी आरोपों का दिया करारा जवाब

ईशा फाउंडेशन ने सद्गुरु के कथन "Ecology और economics को साथ लेकर चलना होगा, एक-दूसरे की कीमत पर नहीं" को दोहराते हुए इस बात पर बल दिया कि Cauvery Calling आर्थिक प्रोजेक्ट है, जो पर्यावरणीय परिणाम को ध्यान में रखकर चलाया जा रहा है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

सद्गुरु जग्गी वासुदेव और उनकी आध्यात्मिक-सामाजिक संस्था ईशा फाउंडेशन ने Coalition for Environmental Justice in India के आरोपों पर करारा जवाब दिया है। Environment Support Group नामक वेबसाइट पर प्रकाशित एक खुले पत्र में ‘populism’ से लेकर ‘हाथियों की जमीन चुराई, आदिवासियों की ज़मीन चुराई’ जैसे वाहियात, पुराने, घिसे-पिटे आरोपों को ही दोहराया गया, जिनके जवाब सद्गुरु और ईशा फाउंडेशन से लेकर तमिलनाडु सरकार तक कई बार, कई मौकों और मंचों पर दे चुके हैं। The Wire की एक हिट जॉब रिपोर्ट भी इस ‘खुले पत्र’ में चस्पा थी। यह पत्र सद्गुरु के ‘Cauvery Calling’ (‘कावेरी की पुकार’) अभियान से जुड़े हॉलीवुड अभिनेता लियोनार्डो डि कैप्रियो को लिखा गया था, जिसमें उनसे इस अभियान से अलग हो जाने की अपील की गई थी। ईशा फाउंडेशन ने उन्हीं आरोपों पर अपना जवाब अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया है।

क्यों पुकार रही है कावेरी?

उत्तर भारत में जैसे गंगा-यमुना बदहाल हैं, वैसा ही हाल दक्षिण भारत में कावेरी का है। कभी कर्नाटक-तमिलनाडु दोनों प्रदेशों के बड़े हिस्से को आवश्यकता से अधिक जल देने वाली यह नदी आज जनसंख्या दबाव और बेतहाशा दोहन से लगभग 40% पानी खो चुकी है और यह दोनों राज्य पानी की कमी से जूझ रहे हैं। चेन्नै और बंगलुरु में हाल में दिखे जल-संकट महज़ बानगी भर हैं पूरी समस्या की गंभीरता के। सद्गुरु इसी नदी में पानी वापिस लाने के लिए ‘कावेरी की पुकार’ (Cauvery Calling) अभियान चला रहे हैं, जिसके अंतर्गत कावेरी के आस-पास की कृषि-भूमि पर अनाज और नकदी फसलों के अलावा पेड़-पौधे भी लगाने पर ज़ोर दिया जा रहा है, बाकायदा कृषि के एक प्रकार, वन्य-कृषि (Agroforestry), के रूप में।

इसके लिए न केवल किसानों के बीच जागरुकता का अभियान चलाया जा रहा है, बल्कि उन्हें ईशा फाउंडेशन अन्न- और फसल-कृषि से वन्य-कृषि पर जाने के लिए एक सहायता का ढाँचा खड़ा कर रहा है, जिसमें 242 करोड़ पेड़ निजी कृषि भूमि पर लगाने के लिए देना शामिल है। इसी अभियान के लिए 62-वर्षीय सद्गुरु ने 2-3 सितंबर से शुरू कर 17 सितंबर तक 3,500 किलोमीटर की सड़क यात्रा भी की थी, जिसके एक बड़े हिस्से में उन्होंने खुद बाइक रैली की थी।

सरकारी भूमि की बात कहाँ से आई?

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अपने ‘खुले पत्र’ में Coalition for Environmental Justice in India ने सबसे पहले सरकारी भूमि के इस्तेमाल का आरोप लगाया है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने पूछा है कि सरकारी भूमि के इस्तेमाल की बात कहाँ से आ गई? यह अभियान तो, ईशा के मुताबिक, निजी किसानों को अपनी कृषि भूमि पर पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित करने का है। फाउंडेशन का कहना है कि उनकी वेबसाइट, उनके कार्यक्रमों, सरकार को दिए गए दस्तावेज़ों (अभियान का एक हिस्सा अपनी भूमि पर पेड़ लगाने वाले किसानों को अपनी ज़रूरत के मुताबिक लालफ़ीताशाही के हस्तक्षेप के बिना पेड़ काट सकने की इजाज़त दिलाने का भी है, जिसके लिए जरूरी क़ानूनी बदलाव के लिए फाउंडेशन प्रयासरत है) आदि में कहीं भी सरकारी भूमि का तो नाम भी नहीं है।

इसे निजी भूमि पर कराने के पीछे फाउंडेशन का तर्क है कि इस अभियान को अंततः जिन किसानों को सफ़ल बनाना है, निजी भूमि पर होने वाली पैदावार का आर्थिक लाभ उन्हें प्रोत्साहित और प्रेरित करेगा। इसके अलावा आरोप का एक हिस्सा एक ही तरह के पेड़ों को लगाकर एकल कृषि के प्रोत्साहन का है। इसे भी काटते हुए ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि इसमें पहली बात तो केवल वृक्षारोपण ही नहीं, झाड़ियाँ, पौधे और हरियाली के अन्य प्रकार शामिल हैं, और पेड़ों का चयन भी स्थानीय पर्यावरण और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और वन्य विभाग से सलाह लेने के पश्चात् ही किया गया है।

दर्जन-भर सरकारी-गैर सरकारी संस्थाएँ शामिल, सभी अनभिज्ञ हैं?

अगला आरोप लगाया गया है कि ईशा फाउंडेशन को नदी और उसके आसपास की भूमि, जलवायु आदि का कोई ज्ञान ही नहीं है; और वे वृक्षारोपण के अति-सरलीकृत (over-simplified) समाधान को थोपना चाहते हैं। इसके जवाब में ईशा ने पीएमओ, कर्नाटक-तमिलनाडु राज्य सरकारों, जल शक्ति मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु-परिवर्तन मंत्रालय, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अरिजित पसायत, बायोकॉन की किरण मजूमदार शॉ, उद्योग चैंबर Confederation of Indian Industries (CII) के महानिदेशक चन्द्रजित बनर्जी, इसरो के पूर्व प्रमुख डॉ. एएस किरण कुमार आदि का नाम गिनाते हुए पूछा कि क्या यह सभी ऐसे लोग और संस्थान हैं जो बिना जाने-समझे किसी भी मसले पर किसी व्यक्ति या मुद्दे के पीछे खड़े हो जाएँगे?

ईशा फाउंडेशन ने यह भी बताया कि सद्गुरु को United Nations Convention to Combat Desertification (UNCCD) के COP14 शिखर सम्मेलन में Cauvery Calling अभियान के बारे में बोलने के लिए निमंत्रित किया गया था। वे भारत में इस अभियान की सफलता से प्रभावित हो इसे दुनिया-भर में करने के बारे में जानना चाहते थे।

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इसके अलावा ईशा फाउंडेशन और Cauvery Calling अभियान लगातार देश के चोटी के आर्थिक थिंक टैंक नीति आयोग से भी लगातार सलाह ले रहा है।

नौसिखिये नहीं हैं हम, 18 साल का अनुभव है वन्य-कृषि का

अगला आरोप था कि ईशा फाउंडेशन अंधाधुंध, बिना सोचे-समझे पेड़ लगाना चाहता है- उसे न तो इसके पर्यावरणीय असर के बारे में समझ है, न ही इसके सामाजिक पहलुओं के बारे में पता है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि उनकी वेबसाइट पर कावेरी के आस-पास की भूमि को उचित खंडों (सेग्मेंट्स) में बाँटते हुए उस खंड में लगने लायक पेड़ों की सूची अपनी वेबसाइट पर डाली है। यह सूची कर्नाटक वन विभाग, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय समेत आधा दर्जन संस्थाओं और दशकों तक वन्य-कृषि और पेड़ों के साथ काम कर चुके विशेषज्ञों के साथ सलाह-मशविरे के बाद तैयार की गई है।

यही नहीं, ईशा फाउंडेशन ने यह भी दावा किया है कि उनके प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स को 18 वर्ष वन्य-कृषि के क्षेत्र में तमिलनाडु में काम करने का अनुभव है। गौरतलब है कि प्रोजेक्ट ग्रीनहैंड्स देश के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार ‘इंदिरा गाँधी पर्यावरण पुरस्कार’ से सम्मानित हो चुका है। इसके अलावा ईशा ने दावा किया है कि तमिलनाडु में कई जिलों में, जिनमें कावेरी के आसपास के जिले भी शामिल हैं, वन्य-कृषि को सफलतापूर्वक आज़माया जा चुका है।

इसके सामाजिक पहलू को लेकर भी ईशा फाउंडेशन ने लिखा है कि ‘कावेरी की पुकार’ अभियान में यह भी अछूता नहीं है। अभियान के लिए ईशा फाउंडेशन के स्वयंसेवक 7,000 से अधिक गाँवों में जाकर करीब 2,70,000 लोगों से अभियान की आधिकारिक शुरूआत के पहले ही मिले थे। लाखों किसानों के जल-संकट से जूझ रहे होने के चलते पंचायतों के नेतृत्व ने इसमें बेहद रुचि दिखाई है।

पंचायत स्तर पर होगा काम

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इस मुद्दे पर आगे ईशा फाउंडेशन ने अपने उत्तर में लिखा है कि इस अभियान का क्रियान्वन ग्राम पंचायतों के स्तर पर पर ही होना है। जहाँ जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ (Biodiversity Management Committees) पहले से सक्रिय हैं, वहाँ फाउंडेशन उनकी सहायता बेशक लेगा क्योंकि वन्य-कृषि से जैवविविधता में वृद्धि होती है।

पर्यावरण और विकास/अर्थव्यवस्था को दुश्मन बनाने से काम नहीं चलेगा

ईशा फाउंडेशन ने सद्गुरु के कथन “Ecology और economics को साथ लेकर चलना होगा, एक-दूसरे की कीमत पर नहीं” को दोहराते हुए इस बात पर बल दिया कि Cauvery Calling आर्थिक प्रोजेक्ट है, जो पर्यावरणीय परिणाम को ध्यान में रखकर चलाया जा रहा है। संस्था ने दावा किया है कि यह वन्य-कृषि मॉडल तमिलनाडु के 69,760 किसानों के साथ आज़माया गया है। इसे अपनाने वालों की आय में 300%-800% बढ़ोतरी देखी गई है।

इसके अलावा फाउंडेशन का कहना है कि उसने यह कभी दावा नहीं किया कि पेड़ लगाना ही नदी-संकट के निदान का इकलौता उपाय है। उसने वृक्षारोपण इसलिए चुना क्योंकि वृक्ष नदियों की समस्या के सबसे सस्ता और प्रकृति पर आधारित समाधान हैं।

‘हाथियों की ज़मीन’, ‘आदिवासियों की ज़मीन’ का प्रोपेगंडा

अगला आरोप ईशा फाउंडेशन पर वही घिस-घिस कर बदरंग हो चुका “हाथियों की जमीन चुराई”, “आदिवासियों की ज़मीन चुराई” का प्रोपेगंडा है। इसके जवाब में ईशा फाउंडेशन ने एक बार फिर दोहराया कि पर्यावरण मंत्रालय और तमिलनाडु के राज्य वन विभाग ने यह बहुत पहले साफ़ कर दिया है कि ईशा फाउंडेशन का आश्रम जिस ज़मीन पर है, उस पर हाथियों का कोई कॉरिडोर कभी नहीं रहा। इसके अलावा ईशा फाउंडेशन ने फिर दोहराया कि उस पर आदिवासियों को आवंटित की गई जो 44 एकड़ ज़मीन हथियाने का आरोप है, उस ज़मीन से ईशा फाउंडेशन का कभी कोई नाता नहीं रहा

सरल भाषा में समझना ‘पॉपुलिस्ट’ होना होता है तो हो

‘Populism’ के आरोप के जवाब में ईशा फाउंडेशन ने लिखा कि इसके पहले ऐसे जटिल विषय को जनता की समझ में आने लायक सरल भाषा में समझाने वाला जनांदोलन कभी नहीं हुआ है। अगर ऐसा करना ‘पॉपुलिस्ट’ होना होता है तो हो। पूरे देश के नदियों के विषय पर उठ खड़े होने का तो स्वागत किया जाना चाहिए।

PIL अगंभीर, सद्गुरु को पैसा कमाने के लिए ऐसे तरीकों की ज़रूरत नहीं

‘कावेरी की पुकार’ आंदोलन के लिए पैसे जुटाने के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय में दायर जनहित याचिका को ईशा फाउंडेशन ने अगंभीर करार देते हुए इस बात का खंडन किया कि यह पैसा कर्नाटक की राज्य सरकार से विमर्श किए बगैर इकट्ठा किया जा रहा है। ‘जलपुरुष’ माने जाने वाले राजेंद्र सिंह के “पैसे और शोहरत के लिए” काम करने के आरोप पर ईशा फाउंडेशन ने कहा कि यह उनकी अपनी राय है, लेकिन साथ में जोड़ा कि पद्मविभूषण से सम्मानित जग्गी वासुदेव को पैसा कमाने के लिए ऐसे हथकण्डे अख्तियार करने पड़ें, ऐसा आरोप हास्यास्पद है।

अपने बयान के अंत में ईशा फाउंडेशन ने सभी विरोधियों को एक निष्पक्ष वार्तालाप के लिए निमंत्रित किया, ताकि फाउंडेशन को ‘Cauvery Calling’ के असली स्वरूप को प्रस्तुत करने का अवसर मिले।

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