Tuesday, April 13, 2021
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18 अक्टूबर तक सुनवाई, 17 नवंबर से पहले फैसला: सब कुछ ठीक रहा तो राम जन्मभूमि पर यह है SC का विचार

"हमें उम्मीद है कि 18 अक्टूबर तक सुनवाई समाप्त हो जाएगी, इससे हमें निर्णय लिखने के लिए चार सप्ताह का समय मिलेगा।"

अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के स्वामित्व के लिए हिंदू और मुस्लिम पक्षों द्वारा 70 साल की मुक़दमेबाजी बुधवार (18 सितंबर) को अपने अंतिम पड़ाव के क़रीब पहुँच गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की पुष्टि की कि इस केस का फ़ैसला 17 नवंबर को या उससे पहले सुनाया जाएगा। दरअसल, चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई का कार्यकाल 17 नवंबर को समाप्त हो रहा है। यही कारण है कि वो इससे पहले मामले की सुनवाई और फैसला कर लेना चाहते हैं।

इस मामले में हिंदू और मुस्लिम पक्षों के सलाह-मशवरे के बाद, के परासरन, सीएस वैद्यनाथन और राजीव धवन ने दलीलें ख़त्म करने के लिए अनुमानित समय का ज़िक्र किया। पाँच जजों वाली संविधान पीठ जिसमें CJI गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नाज़ेर ने एक संक्षिप्त परामर्श दिया और कहा, “हमें उम्मीद है कि 18 अक्टूबर तक सुनवाई समाप्त हो जाएगी, इससे हमें निर्णय लिखने के लिए चार सप्ताह का समय मिलेगा।”

पीठ ने यह भी कहा कि अगर सुनवाई के लिए अतिरिक्त दिनों की आवश्यकता पड़ती है, तो शनिवार को कोर्ट के बैठने पर विचार किया जाएगा। इससे पक्षकारों को दलीलें पूरी करने के लिए 15 दिन और सुनवाई के मिल जाएँगे क्योंकि 2 अक्टूबर को गाँधी जयंती और दशहरे की छुट्टियों की वजह से अदालत 6 दिनों के लिए बंद रहेगी।

मुस्लिम पक्षकारों का कहना है कि वे 27 अक्टूबर तक बहस पूरी कर लेंगे, जबकि हिंदू पक्षकारों का कहना है कि उन्हें दो या तीन दिनों की आवश्यकता पड़ेगी, जिसमें मुस्लिम पक्ष एक या दो दिन अपने तर्क प्रस्तुत करेंगे।

पीठ ने पक्षकारों से यह सुझाव देने के लिए भी कहा कि वे इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फ़ैसले पर किस तरह की राहत की उम्मीद करते हैं, जिसने विवादित भूमि को देवता, सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के बीच समान रूप से विभाजित किया था। इस पर बहस की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर कैसे राहत दे सकता है।

ग़ौरतलब है कि यह मामला दोनों पक्षों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि सुनवाई बिना किसी ठोस तथ्यों के समाप्त हो रही है। यदि सुनवाई समाप्त नहीं हुई और न्यायाधीशों को निर्णय लेने से पहले अपनी राय लिखने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला और CJI गोगोई सेवानिवृत्त हो गए, तो नए सिरे से सुनवाई के लिए पीठ का पुनर्गठन करना होगा।

बता दें कि 1989 में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या मामले में फ़ैज़ाबाद ज़़िला अदालत के समक्ष लंबित मुक़दमे को वापस ले लिया था। पहला मुक़दमा 1950 में गोपाल सिंह विशारद द्वारा दायर किया गया था। जबकि दूसरा मुक़दमा एक अन्य हिंदू भक्त द्वारा दायर किया गया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया था। तीसरा मुक़दमा निर्मोही अखाड़े ने 1959 में दायर किया था, और चौथा, दो साल बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड द्वारा दायर किया गया था। अंतिम मुक़दमा 1989 में देवकी नंदन अग्रवाल के माध्यम से दायर किया गया था।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अपना फ़ैसला सुनाने से पहले लगभग 100 दिनों तक पक्षकारों से बहस सुनी और सबूतों की जाँच की थी।

तब इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस एस यू ख़ान, सुधीर अग्रवाल और डी वी शर्मा की तीन-न्यायाधीशों की बेंच ने 2-1 के बहुमत से विवादित भूमि को तीन समान भागों में विभाजित किया था। फैसले में राम लला विराजमान वाला हिस्सा हिंदू महासभा को दिया गया था, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया था। उसके बाद हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ तुरंत अपील दायर की थी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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