Sunday, March 26, 2023
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30+ FIR, मुख़्तार अंसारी से गैंगवार, पलट जाते थे गवाह: कभी दाऊद का करीबी था MLC बृजेश सिंह, योगी राज में काट रहा जेल

पिता की हत्या का बदला लेने के लिए अपराध की दुनिया में पाँव जमाने वाला ‘बृजेश सिंह’ आज पू्र्वांचल के बाहुबली नेताओं की लिस्ट में शुमार एक बड़ा नाम है। यूपी में 3-4 दशक पहले का दौर यदि पढ़ने की कोशिश करें तो मालूम चलेगा कि कैसे एक कॉलेज में पढ़ने वाला लड़का एक ऐसा माफिया बनकर उभरा जिसने बाद में मुख्तार अंसारी जैसे खूँखार माफिया पर न केवल बंदूक तानी बल्कि उससे बदला लेने के लिए राजनीति में निर्दलीय एंट्री भी मार ली। इससे पहले उसका नाम ‘जेजे अस्पताल हत्याकांड’ से लेकर तमाम हत्याओं में शामिल था। कुछ बाहुबली नेताओं के पास उसने बतौर शूटर भी काम किया हुआ था। मगर, बाद में उसका दबदबा ऐसा बढ़ा कि वो खुद बाहुबली कहा जाने लगा। इस समय यही बृजेश विधान परिषद का सदस्य है और योगी सरकार में अन्य माफिया नेताओं की तरह जेल में बंद भी।

बृजेश सिंह के आपराधिक जीवन की बात करें तो कहा जाता है कि उस पर 30 से अधिक संगीन आपराधिक मामलों में टाडा, मकोका और गैंग्सटर एक्ट के तहत हत्या, अपहरण, हत्या का प्रयास, हत्या की साजिश, दंगा भड़काने , फर्जी दस्तावेज बनवाने, फर्जीवाड़ा करने के मामले दर्ज हैं। एक समय ऐसा था कि उसे पकड़ने के लिए यूपी पुलिस ने 5 लाख रुपए का ईनाम घोषित किया हुआ था। उसके खिलाफ कई मामले ऐसे थे जिनमें गवाह अपराध के समय कुछ और बयान देते थे लेकिन मामले की सुनवाई होते-होते वो अपने बयान से पलट जाते थे और बृजेश सिंह फिर बरी हो जाता था।

अपराध की दुनिया में वाराणसी के लड़के बृजेश सिंह की एंट्री

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1984 में बृजेश सिंह कॉलेज में था जब उसके पिता व धौरहरा गाँव निवासी रवींद्र नाथ सिंह को स्थानीय राजनीतिक रंजिश के चलते मौत के घाट उतारा गया। पिता की हत्या के बाद बृजेश के सिर पर ऐसा खून सवाल हुआ कि बीएससी करने वाले लड़के ने पढ़ाई छोड़ दी और निकल पड़ा अपने पिता के हत्यारे को मारने। घटना के एक साल के भीतर बृजेश ने अपने पिता के हत्यारे को मौत के घाट उतार दिया था और 1986 तक वो लोग भी बुरी तरह मारे जा चुके थे जिन्होंने उस हत्यारे का साथ देकर रवींद्र नाथ को मारा था।

इस घटना के बाद बृजेश पकड़ा गया और उसे जेल भेजा गया। पुलिस को लगा कि शायद इस गिरफ्तारी से हत्याओं का सिलसिला रुकेगा। लेकिन नहीं! जेल में तो उसकी मुलाकात हिस्ट्रीशीटर त्रिभुवन सिंह से हो गई। त्रिभुवन भी अपने पिता और भाइयों के कातिलों को मारने के लिए साजिश रच रहा था लेकिन कामयाब उसके हाथ नहीं लगी।

बृजेश की कहानी सुन उसे एहसास हुआ कि उसे मंजिल मिल सकती है। त्रिभुवन ने बृजेश को ऑफर दिया कि वो उसे संरक्षण दे सकता है मगर इसके बदले उसे उसके पिता और भाइयों के कातिलों साधु सिंह और मखनू सिंह को मारना होगा जो कि एक समय में मुख्तार अंसारी के आपराधिक गुरू थे।  

बस फिर क्या! साल 1988 का दौर आया। बृजेश भी पुलिस की हिरासत से फरार हो गया। उसने सबसे पहले साधु सिंह को मारने के लिए साजिश रची और पुलिस की हिरासत में अस्पताल लाए गए साधु सिंह को गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया। कहा जाता है कि इस काम के लिए उसने पुलिस का भेष धारण करके ही अस्पताल में एंट्री ली थी और इसी घटना ने उसे मुख्तार का दुश्मन बनाने में बिहार तक दहशत कायम करने में मदद की थी।

बृजेश सिंह के अपराध और मुख्तार अंसारी के साथ हुई भिड़ंत

साल 1992 में बृजेश का नाम फिर एक घटना मे उछला। ये घटना थी- जेजे अस्पताल हत्याकांड। सितंबर 1992 की एक रात 20 से अधिक लोगों ने जेजे अस्पताल के वार्ड नंबर 18 में घुसकर शैलेश हलदरकर को मौत के घाट उतारा। शैलेश बंबई के अरुण गवली गैंग का हिस्सा था जिसकी हत्या का मकसद दाऊद इब्राहिम के रिश्तेदार इस्माइल पारकर की हत्या का बदला लेने के लिए की गई थी।

पूरी घटना में दो हवलदार भी मारे गए थे। ये वो घटना थी जिसमें पहली दफा एके-47 इस्तेमाल हुई और एक ही रात में 500 से ज्यादा गोलियाँ चलीं। इस घटना ने बृजेश को दाऊद के जितना करीब लाया था उतना ही मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद दोनों अलग हो गए। मतभेद इतने बढ़े कि दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन गए।

बीच में बृजेश सिंह ने धनबाद के झरिया में बाहुबली विधायक सूर्यदेव सिंह के कारोबार को संभाला और शूटर के तौर पर काम करते हुए 6 हत्या के मामलों में नामजद हुआ। बाद में यही बृजेश, सूर्यदेव के बेटे राजीव रंजन के अपहरण और हत्याकांड का मास्टरमाइंड मालूम चला। इसके बाद बृजेश दोबारा पूर्वांचल की ओर चला और यहाँ से शुरू हुआ मुख्तार अंसारी से भिड़ने का सिलसिला। साल 2002 में चट्टी कांड हुआ जब बृजेश सिंह और मुख्तार की सीधी गैंगवार हुई।

दरअसल, उस समय मुख्तार की गाड़ी को रेलवे फाटक के बीच रोककर ट्रक से कुछ लोग निकले और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी इस दौरान मुख्तार भी अपने वाहन से उतरा और राइफल लेकर मोर्चा संभाला। हमलावरों ने मुख्तार के एक गनर को मारा जबकि गोलीबारी में मुख़्तार ने भी एक हमलावर की हत्या कर दी और साथ ही बृजेश के विरुद्ध मामला भी दर्ज कराया। बाद में बृजेश अंडरग्राउंड हो गया। कई बार उसकी मौत की अफवाह उड़ी। हालाँकि 2008 में बृजेश सिंह का नाम उसकी गिरफ्तारी के साथ फिर उछला और सब हिल गए।

साल 2016 में बृजेश सिंह की राजनीति में हुई एंट्री

साल 2013 को वो समय भी आया जिसने बृजेश का राजनीति की ओर रुख कराया। उस समय पहले मई में बृजेश के सबसे खास शूटर अजय खलनायक पर जानलेवा हमला किया गया और दर्जनों गोलिया दागरकर उसे मौत के घाट उतार दिया गया। फर 3 जुलाई 2013 को उसके चचेरे भाई सतीश सिंह की वाराणसी में गोली मारकर हत्या कर दी गई। जब वह अपने भाई की 13वीं में पहुँचा तो उसका हाल देकर हिल गया और उसने फैसला किया कि मुख्तार से यदि बदला लेना है तो राजनीति में घुसना होगा। इस फैसले के बाद बृजेश सिंह ने MLC का पर्चा भरा और मुख्तार के ख़िलाफ़ अपनी जंग को कोल्ड वार में बदल दिया।

सेंट्रल जेल में बंद है यूपी का बाहुबली नेता बृजेश सिंह

मालूम हो कि इस समय योगी सरकार में अन्य माफिया नेताओं की भाँति बृजेश सिंह भी जेल की सलाखों के पीछे बंद हैं। वह गाजीपुर जिले के हत्या और जानलेवा केस के एक मुकदमे में वाराणसी के सेंट्रल जेल में सदा काट रहा है। पिछले माह उसने विधान परिषद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने के लिए प्रयागराज की एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट में अनुमति माँगी थी। हालाँकि कोर्ट ने इस प्रार्थना पत्र को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने भी कहा कि विधान परिषद का कोई भी सदस्य यदि किसी आपराधिक मामले में जेल में बंद है तो उसे सदन की कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार नहीं है।

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