Tuesday, April 13, 2021
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विश्वभारती की जमीन पर कब्जा करने वालों में अमर्त्य सेन भी, कइयों ने लीज की जमीन बाहरियों को बेची

विश्वविद्यालय ने आरोप लगाया है कि सरकार के राइट-टू-रिकॉर्ड के तहत जिनके नाम पर संपत्ति गलत तरीके से दर्ज की गई है, विश्वविद्यालय की ज़मीन उनके नाम कर दी गई है और उन्होंने उस पर रेस्टोरेंट, स्कूल और अन्य व्यवसाय स्थापित कर लिए हैं।

नोबल पुरस्कार विजेता और वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ अमर्त्य सेन का नाम ऐसे लोगों की सूची में है, जिन्होंने पश्चिम बंगाल स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय की ज़मीन पर ग़ैरक़ानूनी कब्जा जमा रखा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकार को लिखा है कि उनकी कई संपत्ति ऐसी हैं, जिन्हें गलत तरीके से निजी पार्टियों के नाम पर दर्ज किया गया है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई ग़ैरक़ानूनी तरीके से कब्ज़ा ज़माने वालों की सूची में अमर्त्य सेन का नाम भी शामिल है। 

जिन सम्पत्तियों पर ग़ैरक़ानूनी कब्ज़ा है, उनमें गर्ल्स हॉस्टल, अकादमिक विभाग, कार्यालय और कुलपति का बंगला शामिल है। विश्वविद्यालय ने आरोप लगाया है कि सरकार के राइट-टू-रिकॉर्ड (right to record) के तहत जिनके नाम पर संपत्ति गलत तरीके से दर्ज की गई है, विश्वविद्यालय की ज़मीन उनके नाम कर दी गई है और उन्होंने उस पर रेस्टोरेंट, स्कूल और अन्य व्यवसाय स्थापित कर लिए हैं। 

बंगाल पर बढ़ रहा है केंद्र सरकार का नियंत्रण: अमर्त्य सेन     

सेन ने अवैध तरीके से 13 डेसीमल (decimals) ज़मीन पर कब्ज़ा किया है, जबकि उनके पास 125 डेसीमल ज़मीन पहले से ही मौजूद है जो कि उनके दिवंगत पिता को क़ानूनी रूप से पट्टे (लीज़) पर दी गई थी। 

इन आरोपों का जवाब देते हुए अमर्त्य सेन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा, “विश्वविद्यालय की जिस ज़मीन पर मेरा घर बना हुआ है, वह काफी लम्बे समय तक के लिए लीज़ पर है। मैंने देखा कि विश्वभारती के कुलपति बिद्युत चक्रवर्ती ने उन लोगों की सूची में मेरा नाम भी दे रखा है जिनका विश्वविद्यालय की ज़मीन पर ग़ैरक़ानूनी कब्ज़ा है। विश्वभारती की जिस ज़मीन पर मेरा घर है वह काफी समय के लिए लीज़ पर है। कुलपति इस बारे में सिर्फ सपना देख सकते हैं कि वह किसी का अधिकार ख़त्म कर सकते हैं।”

‘प्रख्यात अर्थशास्त्री’ ने केंद्र सरकार को निशाना बनाते हुए आरोप लगाया कि प्रदेश में केंद्र सरकार का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा है। इसके बाद उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कुलपति को उन पर कार्रवाई करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से निर्देश मिला है। उन्होंने कहा, “शांति निकेतन में पले-बढ़े होने के नाते मैं शांति निकेतन और संस्कृति के बीच बढ़ते दायरे और केंद्र सरकार समर्थित कुलपति पर टिप्पणी कर सकता हूँ। आखिर प्रदेश में केंद्र सरकार का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है।” 

बाहरियों को जमीन बेची

विश्वविद्यालय एस्टेट कार्यालय के मुताबिक़ 1980 से 1990 के बीच अनियमित दस्तावेज़ तैयार किए गए थे। ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा विश्वविद्यालय के लिए खरीदा गया था। वह शांतिनिकेतन के पूर्वपल्ली क्षेत्र में स्थित है जो कि आश्रम और विश्व भारती से जुड़े मशहूर लोगों और परिवारों का आवासीय क्षेत्र है। विश्वविद्यालय के पास मौजूद दस्तावेज़ों से स्पष्ट होता है कि 1990 के दौरान वहाँ की ज़मीन पर किस हद तक अतिक्रमण किया गया था। यह दस्तावेज़ शिक्षा मंत्रालय और कैग (Comptroller and Auditor General of India) को भी भेजे गए हैं। 

साल 2006 में सेन ने तत्कालीन कुलपति से निवेदन किया था कि 99 साल पुरानी लीज़ की ज़मीन उनके नाम कर दी जाए। जिसे एग्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा स्वीकृति दे दी गई थी और अतिरिक्त ज़मीन विश्वविद्यालय को कभी वापस नहीं लौटाई गई। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ विश्वविद्यालय के एस्टेट कार्यालय द्वारा जुलाई 2020 में कई विभागों को एक रिपोर्ट भेजी गई थी, जिसके अंतर्गत कुल 77 प्लॉट के आधिपत्य का निस्तारण होना था। 

उस रिपोर्ट के मुताबिक़ हाई प्रोफाइल लोगों ने पूर्वपल्ली, दक्षिणपल्ली और श्रीपल्ली क्षेत्र की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था। एक एस्टेट अधिकारी का यहाँ तक कहना था कि अमर्त्य सेन को इस बात की पूरी जानकारी थी और उनके परिवार को परिसर के नज़दीक स्थित ज़मीन बेचे जाने की वजह से फ़ायदा हुआ था। दिसंबर 2016 में एक अस्थायी सूची जारी की गई थी जिनका ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा था जिसमें कहा गया था कि लोगों ने अपनी लीज़ वाली ज़मीन बाहरियों को बेच दी है।    

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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