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कभी था भू-माफियाओं का कब्जा, अब हिंदू शरणार्थियों को जमीन का अधिकार: पढ़ें- डिजिटलीकरण से भ्रष्टाचार पर रोक तक, योगी सरकार ने कैसे बदली UP की भूमि व्यवस्था

हिंदुओं को जमीन देने और उनके लिए पुनर्वास की व्यवस्था करने का सिलसिला लगातार जारी है। बीते 2 जून 2026 को ही सीएम योगी ने पाकिस्तान से विस्थापित 1645 परिवारों और पूर्व सैनिकों और लीजधारकों को भूमिधरी अधिकार पत्र वितरित किए।

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश ने दशकों तक भूमि प्रशासन की भयावह विफलताएँ देखी हैं। एक ओर ध्वस्त और रिश्वतखोरी से भरी भूमि राजस्व प्रणाली थी, तो दूसरी ओर भूमि माफियाओं का वर्चस्व और दशकों से भूमि के अभाव में जीवन जी रहे हिंदू शरणार्थियों की पीड़ा।

2017 में जब सरकार बदली तो यह व्यवस्था भी बदलने लगी, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने सत्ता में आने के बाद इन तीनों मोर्चों पर एक साथ और निर्णायक रूप से काम किया है। इस रिपोर्ट में नीतियों और सुधारों को विस्तार से समझेंगे।

भूमि रिकॉर्ड और लेखपाल व्यवस्था की दुर्दशा

उत्तर प्रदेश की भूमि राजस्व व्यवस्था उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 पर आधारित है, जो पुराने UP Tenancy Act 1939 और UP Land Revenue Act 1901 और अन्य कानूनों की जगह बनाई गई है। इसमें नामांतरण (Property Mutation), विभाजन, सीमांकन (Demarcation) और राजस्व वसूली के प्रावधान हैं। लेकिन उस दौर में कानून की मंशा और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क था।

जमीन के सबसे बुनियादी दस्तावेज खसरा और खतौनी मैनुअल रजिस्टरों में लेखपाल के हाथ में थे, जिनकी कोई डिजिटल कॉपी तक उपलब्ध नहीं होती थी। हर काम के लिए तहसील कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते थे और हर चक्कर के साथ रिश्वत देना आम बात थी और आप लोगों में ये कइयों ने अनुभव भी किया होगा। फर्जी नामांतरण की भरमार थी और ‘बेनामी’ लेनदेन इतने सामान्य थे कि असली मालिक और कागजी मालिक अलग होना एक चलन बन चुका था।

भूमि माफिया और राजनीतिक संरक्षण

भूमि माफियाओं ने सरकारी जमीनों पर कब्जा कर रखा था और उन्हें खुले राजनीतिक संरक्षण का वरदान प्राप्त था। कोई कार्रवाई नहीं होती थी क्योंकि ऊपर से नीचे तक एक सुरक्षित तंत्र बना हुआ था। भूमि पंजीकरण में रिश्वत और स्टांप पेपर की कालाबाजारी आम बात थी। राजस्व न्यायालयों में लाखों मामले कई-कई वर्षों से लांबित थे क्योंकि सारी कार्रवाई मैनुअल रजिस्टरों पर निर्भर थी और वादियों को बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे।

हिंदू शरणार्थियों की दयनीय स्थिति

1947 के बँटवारे से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक और उसके बाद भी अलग-अलग समय में पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से धार्मिक उत्पीड़न, दंगों और अस्थिरता के कारण भागे हजारों हिंदू परिवार उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में बस गए थे।

पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में 1960 से 1975 के बीच बसे लगभग 10,000 परिवार दशकों से बिना किसी कानूनी भूमि-अधिकार के अस्थायी बस्तियों में रह रहे थे। मेरठ जिले में बंगाली हिंदू परिवार झील के लिए आरक्षित भूमि पर अस्थायी बस्ती में दशकों से रह रहे थे। इन परिवारों के पास न तो अपना घर बनाने का अधिकार था, न जमीन खरीदने की कानूनी स्थिति।

भूलेख पोर्टल और भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण

पहले जमीन से जुड़े कामों के लिए लोगों को लेखपाल पर काफी निर्भर रहना पड़ता था। पीढ़ियों तक लेखपाल ही जमीन के कागजात और रजिस्टरों का मुख्य जिम्मेदार माना जाता था। लेकिन 2025-26 आते-आते यह व्यवस्था डिजिटल हो गई। अब राज्य सरकार के आधिकारिक पोर्टल upbhulekh.gov.in पर कोई भी व्यक्ति घर बैठे अपनी जमीन का खसरा, खतौनी और भू-नक्शा आसानी से देख सकता है। इस बदलाव से करोड़ों किसानों और जमीन मालिकों को बार-बार लेखपाल के चक्कर लगाने और मनमानी का सामना करने से काफी राहत मिली है।

डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) के तहत 2024 तक देश के लगभग 98.5% ग्रामीण भूमि रिकॉर्ड डिजिटल किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश के भूलेख पोर्टल पर अब ग्रामीण जमीन पर लिए गए बैंक लोन की जानकारी भी उपलब्ध है।

इसके साथ ही दो बड़े बदलाव और किए गए हैं- जमीन के रिकॉर्ड को सहमति के आधार पर आधार नंबर से जोड़ना और राजस्व न्यायालयों को कम्प्यूटरीकृत करके उन्हें भूमि रिकॉर्ड सिस्टम से जोड़ना। इन कदमों से फर्जी नामांतरण और एक ही जमीन पर दोहरे मालिकाना हक जैसे विवादों की संभावना लगभग खत्म हो गई है।

PM SVAMITVA: UP में 1 करोड़+ ‘घरौनी’

PM SVAMITVA योजना को ग्रामीण भारत में जमीन और संपत्ति से जुड़े सबसे बड़े बदलावों में से एक माना जाता है। इस योजना के तहत ड्रोन तकनीक की मदद से गाँवों के आबादी क्षेत्र का सर्वे किया जाता है और हर घर के लिए संपत्ति का आधिकारिक रिकॉर्ड यानी प्रॉपर्टी कार्ड या ‘घरौनी’ बनाई जाती है।

देशभर में अब तक 3.27 लाख से ज्यादा गाँवों का ड्रोन सर्वे पूरा हो चुका है। साथ ही 1.82 लाख से अधिक गाँवों के लिए 2.17 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार किए जा चुके हैं।

उत्तर प्रदेश में इस योजना को ‘घरौनी’ के नाम से जाना जाता है। पूरे देश में बनी करीब 2.23 करोड़ घरौनियों में से 1 करोड़ से ज्यादा सिर्फ उत्तर प्रदेश में हैं। इनमें से 78 लाख से अधिक कार्ड 56 हजार गाँवों में लोगों को बाँटे जा चुके हैं। 18 जनवरी 2025 को एक ही दिन में उत्तर प्रदेश के 29 हजार से ज्यादा गाँवों में 45.35 लाख घरौनियाँ वितरित की गई थीं।

इस कार्ड के जरिए ग्रामीण लोग अब अपनी संपत्ति के आधार पर बैंक से ऋण ले सकते हैं, जमीन से जुड़े विवाद कम होते हैं और गाँवों में संपत्ति कर तय करने में भी आसानी होती है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जिन ग्रामीण परिवारों के पास पीढ़ियों से जमीन पर रहने के बावजूद कोई पक्का कागज नहीं था, उन्हें पहली बार कानूनी पहचान और संपत्ति का आधिकारिक अधिकार मिल रहा है।

भू-माफिया टास्क फोर्स का गठन- 65000 एकड़ भूमि मुक्त

2017 में सत्ता में आते ही योगी सरकार ने एंटी भू माफिया टास्क फोर्स का गठन किया। CM योगी आदित्यनाथ खुद यह कह चुके हैं कि जब उन्होंने 2017 में सत्ता संभाली तो उत्तर प्रदेश में कोई लैंड बैंक उपलब्ध नहीं था क्योंकि बड़े भूखंड माफियाओं द्वारा अतिक्रमित थे। टास्क फोर्स ने अवैध अतिक्रमणकारियों की पहचान की और सार्वजनिक भूमि वापस ली।

CM योगी ने कुछ दिनों पहले एक कार्यक्रम के दौरान बताया था कि एंटी-लैंड माफिया टास्क फोर्स ने राजस्व विभाग की करीब 65,000 एकड़ भूमि अब तक मुक्त कराई है। इस जमीन का इस्तेमाल गरीबों के लिए आवास, बुनियादी ढाँचे और उद्योग के लिए आवंटित किया जा रहा है। मुक्त कराई गई भूमि पर खेल मैदान, युवा कल्याण और MGNREGA कार्यों को प्राथमिकता दी गई।

भूमि माफिया अभियान केवल राजस्व भूमि तक सीमित नहीं रहा। योगी सरकार के सत्ता में आते ही 2017-18 में ही 19 जिलों में 1,870.664 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण से मुक्त कराई गई, जिसका उपयोग वार्षिक वृक्षारोपण अभियान में किया गया। वन विभाग ने जिला स्तरीय भू-माफिया सेल के साथ समन्वय करते हुए यह कार्यवाही की।

संपत्ति पंजीकरण में सुधार: फर्जी रजिस्ट्री अब लगभग असंभव, लोगों को शुल्क में भी राहत

2026 तक उत्तर प्रदेश में संपत्ति रजिस्ट्री की व्यवस्था काफी डिजिटल और पारदर्शी हो गई है। अब IGRSUP पोर्टल पर स्टांप ड्यूटी भुगतान, संपत्ति खोज, रजिस्ट्री अपॉइंटमेंट और जरूरी दस्तावेज एक ही जगह मिल जाते हैं। 1 फरवरी 2026 से संपत्ति पंजीकरण में आधार आधारित पहचान और बायोमेट्रिक सत्यापन (फिंगरप्रिंट/आईरिस) अनिवार्य कर दिया गया है।

सरकार पंजीकरण में मदद के लिए ‘निबंधन मित्र’ नियुक्त करने और कई नए उप-पंजीयक कार्यालय खोलने की तैयारी कर रही है ताकि लोगों को आसानी हो। योगी सरकार ने रिश्तेदारों के बीच संपत्ति हस्तांतरण पर स्टांप ड्यूटी घटाकर सिर्फ ₹5,000 कर दी जिससे लाखों परिवारों को राहत मिली।

जुलाई 2025 में महिलाओं को 1 करोड़ रुपए तक की संपत्ति खरीदने पर 1% स्टांप ड्यूटी छूट देने का फैसला भी लिया गया। पहले यह छूट सिर्फ ₹10 लाख तक की संपत्ति पर (अधिकतम ₹10,000) थी। साथ ही सरकार ने बिना पंजीकृत संपत्तियों और बकाया स्टांप ड्यूटी की वसूली के लिए अभियान चलाया जिसमें करोड़ों रुपये की वसूली का लक्ष्य रखा गया।

1960 से 1975 के बीच पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में धार्मिक हिंसा और उत्पीड़न के कारण कई हिंदू परिवार अपना घर छोड़कर भारत आए और उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर जैसे जिलों में बस गए। इसके अलावा अलग-अलग समय पर पाकिस्तान से आए सिंधी और पंजाबी हिंदू, बांग्लादेश से आए हिंदू परिवार और हाल के वर्षों में तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान से आए हिंदू-सिख परिवार भी उत्तर प्रदेश में शरण लेकर बसे।

इनमें खासकर बंगाली हिंदू परिवार 1970 के आसपास पूर्वी पाकिस्तान से आए थे और मेरठ-हस्तिनापुर इलाके में वर्षों तक रह रहे थे लेकिन उनके पास स्थायी जमीन या कानूनी अधिकार नहीं थे।

साल 2021 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार ने इन बंगाली हिंदू परिवारों के पुनर्वास की दिशा में बड़ा फैसला लिया। 63 हिंदू बंगाली परिवारों के लिए कानपुर देहात के रसूलाबाद तहसील के ग्राम भँसाया में 121.41 हेक्टेयर जमीन पुनर्वास विभाग को दी गई ताकि इन परिवारों को बसाया जा सके। सरकार ने मुख्यमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत हर परिवार को मकान बनाने के लिए ₹1.20 लाख की मदद दी। साथ ही मनरेगा के तहत बस्ती के आसपास जमीन सुधार और सिंचाई जैसी सुविधाएँ देने की भी योजना बनाई गई।

इसके बाद जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने मेरठ जिले में दशकों से रह रहे 99 बंगाली हिंदू परिवारों के लिए एक और बड़ा पुनर्वास पैकेज मंजूर किया। ये परिवार मवाना तहसील के नंगला गुसाई गाँव में झील के लिए आरक्षित जमीन पर अस्थायी बस्ती बनाकर रह रहे थे। सरकार ने फैसला लिया कि इन्हें कानपुर देहात के रसूलाबाद क्षेत्र में स्थायी रूप से बसाया जाएगा ताकि उन्हें सुरक्षित और स्थायी जीवन मिल सके।

जुलाई 2025 में मुख्यमंत्री योगी ने एक उच्च स्तरीय बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिया कि हिंदू शरणार्थियों को जमीन का मालिकाना हक दिया जाए। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ पुनर्वास नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, मानवता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का मामला है। इसके तहत पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बिजनौर और रामपुर में 1960-1975 के बीच बसे करीब 10 हजार परिवारों के जमीन संबंधी मामलों की जाँच के निर्देश दिए गए।

जिन परिवारों को पहले खेती या रहने की जमीन मिली थी, उनके अधिकारों को कानूनी रूप से मजबूत करने और जहाँ जमीन उपलब्ध नहीं है वहाँ दूसरी जमीन देने की बात कही गई। इस अभियान में 2,500 से ज्यादा बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी परिवारों को कानूनी भूमि स्वामित्व देने की प्रक्रिया शामिल है।

अप्रैल 2026 में सीएम योगी ने पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से विस्थापित कुल 331 हिंदू परिवारों को लखीमपुर खीरी जिले में पुनर्वासित किया था। इन 331 परिवारों का बँटवारा करने के लिए तहसील धौरहरा के गाँव सुतकुईया में 97 परिवार बसाए गए। तहसील गोला के ग्राम संख्या-3 में 37 परिवारों को जगह मिली। इसके अलावा तहसील मोहम्मदी के गाँव मोहनगंज (कॉलोनी) में 41 परिवारों की बसाहट की गई।

पीलीभीत जिले में लगभग 2,196 परिवार पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के रूप में दर्ज हैं, जो 25 गाँवों में बसे हुए हैं। इन्हें 1960 के दशक में आवास और खेती के लिए जमीन दी गई थी, पर कानूनी मालिकाना हक नहीं मिला। रिकॉर्ड में कहीं जमीन वन विभाग के अधीन दर्ज हो गई, कहीं म्यूटेशन (नामांतरण) नहीं हुआ।

पीलीभीत के जिलाधिकारी ने बताया कि 2,196 में से 1,466 परिवारों की सत्यापन रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जा चुकी है और अंतिम दिशानिर्देश मिलते ही उन्हें कागज देने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। यह प्रक्रिया केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के उन सभी जिलों में लागू की जा रही है, जहाँ ऐसे शरणार्थी बसाए गए थे।

हिंदुओं को जमीन देने और उनके लिए पुनर्वास की व्यवस्था करने का सिलसिला लगातार जारी है। बीते 2 जून 2026 को ही सीएम योगी ने पाकिस्तान से विस्थापित 1645 परिवारों और पूर्व सैनिकों और लीजधारकों को भूमिधरी अधिकार पत्र वितरित किए।

चुनौतियाँ और भविष्य की राह

हालाँकि, इन सुधारों के बीच कुछ चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या डिजिटल व्यवस्था को लेकर है। ग्रामीण इलाकों के बुजुर्गों और कम पढ़े-लिखे या निरक्षर भूमि-मालिकों के लिए ऑनलाइन प्रणाली का इस्तेमाल करना आसान नहीं है। सरकार की ‘निबंधन मित्र’ योजना इसी परेशानी को कम करने के लिए लाई जा रही है, जिसमें प्रशिक्षित लोग दस्तावेज और पंजीकरण प्रक्रिया में मदद करेंगे लेकिन यह व्यवस्था अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है।

इसी तरह जमीन से जुड़े मामलों में डिजिटल पोर्टल आने के बावजूद लेखपाल की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई जगहों पर लोगों को अब भी जमीन से जुड़े कामों के लिए लेखपाल पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे भ्रष्टाचार और मनमानी की शिकायतों की संभावना बनी रहती है।

दूसरी ओर, शरणार्थियों के पुनर्वास को लेकर भी कुछ परिवारों ने अपनी चिंता जताई। उनका कहना था कि उन्हें मेरठ जिले के भीतर ही बसाया जाए क्योंकि कानपुर देहात जैसे दूसरे जिलों में जाने से रोजगार, पुराने सामाजिक संबंध और रोजमर्रा के जीवन पर असर पड़ सकता है। इस दिशा में भी सरकार काम कर रही है।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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