कार्यस्थल पर होने वाले मतभेद SC-ST एक्ट के तहत अपराध नहीं: कोलकाता HC ने किया साफ, संस्कृत कॉलेज की पूर्व HOD के खिलाफ लगे आरोपों को किया रद्द

SC-ST कानून के दुरुपयोग की बढ़ती खबरों के बीच कोलकाता हाई कोर्ट का एक अहम फैसला आया है। कोर्ट ने कहा है कि कार्यस्थल पर होने वाले पेशेवर मतभेद, प्रशासनिक विवाद या कथित अपमान की हर घटना को स्वतः एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध नहीं मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत मामला तभी बनता है जब स्पष्ट रूप से जाति के आधार पर सार्वजनिक रूप से अपमान या गाली-गलौज की गई हो।

यह आदेश जस्टिस चैतली चटर्जी ने अमहर्स्ट स्ट्रीट थाने के केस नंबर 10/21 की सुनवाई के दौरान दिया। कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द कर दिया।

जानकारी के मुताबिक, पूरा मामला संस्कृत कॉलेज एंड यूनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर से जुड़ा है, जो संस्कृत विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष (HOD) रह चुकी हैं। उनके खिलाफ उसी विश्वविद्यालय के एक सहायक प्रोफेसर, जो अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से हैं, ने शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि विभागाध्यक्ष ने उन्हें विभागीय निर्णयों से बाहर रखा, उनकी कक्षाएँ रोक दीं, विभागीय कामकाज में बाधा डाली और एक ऑनलाइन बैठक के दौरान अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह व्यवहार उनकी जाति के कारण किया गया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि शिकायत में लगाए गए आरोप मुख्य रूप से पेशेवर और प्रशासनिक विवाद से संबंधित हैं। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आरोप नहीं है जिससे यह साबित हो कि कथित अपमान जाति के आधार पर और सार्वजनिक रूप से किया गया।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों- गोरिगे पेंटैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2008), हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020) और सवर्ण सिंह बनाम राज्य (2008)– का हवाला देते हुए कहा कि धारा 3(1)(r) के तहत अपराध साबित करने के लिए जानबूझकर जाति के आधार पर, सार्वजनिक रूप से अपमान करना आवश्यक है। मात्र कार्यस्थल विवाद या पीड़ित की जाति की जानकारी होना इस कानून को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।