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भारत को ‘हजार टुकड़ों में बाँटने’ की रणनीति से शहजाद भट्टी के डिजिटल आतंकवाद तक: पाकिस्तान के ‘स्लीपर सेल’ वाले Proxy War की कहानी

शहजाद भट्टी की कहानी इसी बदलते मॉडल की कहानी है। एक ऐसा मॉडल जिसमें अंडरवर्ल्ड की पुरानी लॉजिस्टिक्स, आतंकवाद की सीमा पार फंडिंग, ड्रग्स का पैसा और सोशल मीडिया की नई दुनिया एक-दूसरे से जुड़कर एक नया नेटवर्क तैयार कर रहे हैं।

12 अगस्त को देश के 14 राज्यों में पुलिस फोर्सेज एक साथ हरकत में आती हैं। अलग-अलग राज्यों में कार्रवाई होती है, 253 लोगों को हिरासत में लिया जाता है और 80 से ज्यादा FIR दर्ज होती हैं। इस पूरे ऑपरेशन की जानकारी 17 अगस्त को गृह मंत्री अमित शाह देते हैं और दावा करते हैं कि सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान समर्थित ‘शहजाद भट्टी नेटवर्क’ को ध्वस्त कर दिया है।

इस कार्रवाई को सिर्फ 12 अगस्त की एक बड़ी पुलिस कार्रवाई मानना इस पूरी कहानी को छोटा करके देखना होगा। इस ऑपरेशन की तैयारी करीब डेढ़ साल से चल रही थी। जिस नेटवर्क पर शिकंजा कसा गया, उसकी जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी कड़ियाँ कश्मीर की वादियों से लेकर मुंबई की उन गलियों तक जाती दिखाई देती हैं, जहाँ से कभी डी-कंपनी जैसी अंडरवर्ल्ड की ताकत का जन्म हुआ था। उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से लेकर आज सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स की दुनिया तक इस कहानी के अलग-अलग किरदार सामने आते हैं।

शहजाद भट्टी पर बात करने से पहले यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान के उस आतंक के मॉडल की शुरुआत कहाँ से हुई, जिसने भारत के खिलाफ सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध को अपना हथियार बनाया।

जब पाकिस्तान ने सीधी जंग के बजाय छद्म युद्ध का रास्ता चुना

1947, 1965, 1971 और कारगिल के युद्धों में भारत से मिली शिकस्त के बाद पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी ISI के सामने एक बात धीरे-धीरे साफ होती गई कि भारत को पारंपरिक युद्ध में हराना आसान नहीं है। इसके बाद भारत के खिलाफ छद्म युद्ध यानी Proxy War की रणनीति को आगे बढ़ाया गया।

पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान ने भारत के भीतर अस्थिरता पैदा करने के लिए आतंकवाद, अलगाववाद और स्थानीय नेटवर्क का इस्तेमाल करना शुरू किया। इसी मॉडल का एक अहम हिस्सा थे- स्लीपर सेल।

जनरल जिया-उल-हक के शासन के दौर में पाकिस्तान की रणनीति और आक्रामक हुई। ‘Bleed India by a thousand cuts’ की सोच के तहत भारत को भीतर से कमजोर करने का मॉडल विकसित किया गया। इसी संदर्भ में K2 रणनीति का भी जिक्र आता है, जिसमें एक K कश्मीर और दूसरा खालिस्तान को दर्शाता था। बाद में ‘ऑपरेशन टुपैक’ के जरिए भारत में असंतोष और उग्रवाद को बढ़ावा देने की रणनीति को जमीन पर उतारने की कोशिश की गई।

पाकिस्तान ने सिर्फ सीमा पार से आतंकवादियों को भारत भेजने पर भरोसा नहीं किया। इसके साथ-साथ भारत के भीतर मौजूद युवाओं को प्रभावित करने, उन्हें कट्टरपंथ की तरफ ले जाने और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपने नेटवर्क का हिस्सा बनाने की कोशिश भी की गई। यहीं से भारत में स्लीपर सेल के उस मॉडल को बढ़ावा मिला, जिसकी चुनौती आज भी सुरक्षा एजेंसियों के सामने बनी हुई है।

1993 मुंबई धमाके और डी-कंपनी का आतंकी नेटवर्क

भारत में स्लीपर सेल और स्थानीय आपराधिक नेटवर्क के आतंकवाद से जुड़ने का सबसे खौफनाक चेहरा 12 मार्च 1993 को सामने आया। मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को हिला दिया। इस हमले में 250 से ज्यादा लोगों की जान गई और सैकड़ों लोग घायल हुए।

इस पूरे मामले में पाकिस्तान की ISI और डी-कंपनी के बीच संबंधों की बात सामने आई। जाँच में यह आरोप सामने आया कि स्थानीय तस्करों और युवाओं को इस नेटवर्क में शामिल किया गया, कुछ लोगों को पाकिस्तान ले जाकर हथियार और विस्फोटकों की ट्रेनिंग दी गई और फिर उन्हें भारत में हमले के लिए तैयार किया गया।

इस घटना ने सुरक्षा एजेंसियों को एक बेहद अहम सबक दिया। खतरा हमेशा सीमा पार से आने वाले किसी आतंकवादी के रूप में दिखाई नहीं देगा। कई बार आतंकवाद के लिए जरूरी लोगों, संसाधनों, हथियारों और लॉजिस्टिक्स का नेटवर्क भारत के भीतर ही तैयार किया जा सकता है। यहीं से ‘स्लीपर सेल’ को समझना जरूरी हो जाता है।

आखिर स्लीपर सेल होता क्या है?

आसान भाषा में समझें तो स्लीपर सेल आतंकियों का ऐसा छिपा हुआ नेटवर्क है, जिसमें शामिल लोग हमेशा हथियार लेकर या किसी आतंकी संगठन के सदस्य के तौर पर सामने नहीं आते। वे आम लोगों की तरह सामान्य जीवन जीते रहते हैं और किसी खास समय या निर्देश का इंतजार करते हैं।

जरूरी नहीं कि स्लीपर सेल में शामिल व्यक्ति खुद किसी हमले को अंजाम दे। उसका काम किसी आतंकी संगठन के लिए ठिकाना उपलब्ध कराना, हथियार या पैसा पहुंचाना, किसी जगह की रेकी करना, नए लोगों को नेटवर्क से जोड़ना या हमलावरों तक जरूरी जानकारी पहुंचाना भी हो सकता है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि कई बार नेटवर्क में शामिल किसी व्यक्ति को पूरे नेटवर्क की जानकारी तक नहीं होती। उसे सिर्फ उतना ही काम बताया जाता है, जितना उसके लिए जरूरी है।

यही वजह है कि ऐसे नेटवर्क को पकड़ना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बेहद मुश्किल होता है। सीमा पार बैठा हैंडलर खुद भारत में मौजूद नहीं होता। वह भारत में मौजूद छोटे-छोटे स्थानीय संपर्कों के जरिए अपना काम करवाता है। एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से जुड़ता है, दूसरा तीसरे से और इस तरह एक ऐसा नेटवर्क तैयार होता है जिसकी पूरी तस्वीर जांच एजेंसियों को लंबे समय तक दिखाई नहीं देती।

आतंकवाद की जाँच का सवाल बदला

भारत में जब-जब बड़े आतंकी हमले हुए, जाँच एजेंसियों के सामने सिर्फ यह सवाल नहीं रहा कि आतंकवादी भारत में आया कहाँ से। सवाल धीरे-धीरे बदल गया।

वह भारत पहुँचने के बाद किससे मिला? किसने उसे रास्ता बताया? किसने उसे रहने की जगह दी? पैसा किसने पहुँचाया? हथियार किसने उपलब्ध कराए? किसने रेकी की? और अगर हमलावर वापस चला गया तो उसके पीछे भारत में कौन बचा रह गया? यही वह सोच थी जिसने स्लीपर सेल की जाँच को आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का अहम हिस्सा बना दिया।

समय के साथ सुरक्षा एजेंसियों को यह भी समझ आने लगा कि आतंकवाद और स्थानीय अपराध की दुनिया हमेशा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। जहाँ अपराधियों के पास पैसा, हथियार, स्थानीय संपर्क और लॉजिस्टिक्स होते हैं, वहीं आतंकवादी नेटवर्क को भी इन्हीं चीजों की जरूरत होती है। इसी बिंदु पर आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ने लगते हैं।

अतीक अहमद तक पहुँची स्लीपर सेल की कहानी

स्लीपर सेल की इस लंबी कहानी की एक कड़ी उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद से भी जुड़ती है। अतीक अहमद पर 100 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे। 2005 में बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के मामले में उसे बाद में उम्रकैद की सजा भी सुनाई गई। फरवरी 2023 में गवाह उमेश पाल और दो पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद उसका नाम एक बार फिर देशभर में चर्चा में आया।

उमेश पाल हत्याकांड के बाद हुई पूछताछ और सामने आए दस्तावेजों में अतीक अहमद के पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क के दावे सामने आए। उसके रिमांड दस्तावेज में हथियारों की उस सप्लाई चेन का भी जिक्र था, जिसमें पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए पंजाब में हथियार गिराए जाने की बात कही गई थी।

इन हथियारों को स्थानीय नेटवर्क के जरिए इकट्ठा किया जाता और फिर अलग-अलग आपराधिक तथा आतंकी नेटवर्क तक पहुंचाया जाता था। आरोपों के मुताबिक कुछ हथियार पैसे के बदले अतीक के नेटवर्क तक भी पहुंचे।

अतीक अहमद की मौत के साथ उसका अध्याय जरूर बंद हो गया, लेकिन जिस गठजोड़ की तस्वीर उसकी पूछताछ और जांच में सामने आई थी, वह खत्म नहीं हुआ। अगले कुछ वर्षों में यही गठजोड़ एक नए और ज्यादा डिजिटल रूप में दिखाई देने लगा। और इस नई कड़ी के केंद्र में एक नाम बार-बार सामने आया- शहजाद भट्टी।

कौन है शहजाद भट्टी और कैसे तैयार हुआ उसका नेटवर्क?

शहजाद भट्टी पाकिस्तान का सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और गैंगस्टर बताया जाता है। आरोप है कि उसने इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल युवाओं तक पहुंच बनाने, उन्हें प्रभावित करने और सीमा पार से आपराधिक तथा आतंकी गतिविधियों के लिए नेटवर्क तैयार करने में किया।

यानी जिस आतंक का पुराना मॉडल हथियारों, तस्करी और आमने-सामने के संपर्क पर टिका था, उसमें अब सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की एक नई परत जुड़ गई थी।

भट्टी पर आरोप है कि उसने भारत में दहशत फैलाने के लिए TTH नाम का एक नया मुखौटा संगठन खड़ा किया। इसका इस्तेमाल कथित तौर पर नार्को-टेररिज्म और हिंसक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। उसका तरीका भी इसी नए मॉडल को दिखाता है।

शुरुआत में युवाओं को छोटे-छोटे काम दिए जाते। कुछ मामलों में 5,000 से 10,000 रुपये तक देकर सार्वजनिक जगहों की रेकी कराने या पोस्टर लगाने जैसे काम करवाए जाते। धीरे-धीरे यही संपर्क बड़े कामों में बदले जाते और आरोप है कि बाद में कुछ युवाओं को हथियार उपलब्ध कराकर टारगेट किलिंग और ग्रेनेड हमलों जैसी गतिविधियों में धकेला गया।

यानी पहले भरोसा और पैसा, फिर छोटा अपराध और उसके बाद धीरे-धीरे आतंक की दुनिया में प्रवेश।

जालंधर से सिरसा और अंबाला तक धमाकों की कड़ियाँ

शहजाद भट्टी नेटवर्क पर आरोपों की गंभीरता का अंदाजा उन मामलों से लगाया जा सकता है, जिनमें उसका नाम जाँच के दौरान सामने आया। मार्च 2025 में पंजाब के जालंधर में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रोजर संधू के घर पर ग्रेनेड हमला हुआ। अप्रैल 2026 में एनआईए ने इस मामले में शहजाद भट्टी को फरार आरोपित के रूप में चार्जशीट किया।

इसके बाद हरियाणा के सिरसा महिला पुलिस थाने में नवंबर 2025 में हुए विस्फोट और अंबाला के बलदेव नगर पुलिस स्टेशन में जनवरी 2026 में हुए धमाके की साजिश में भी भट्टी का नाम सामने आया।

सिरसा मामले में मई 2026 में एनआईए ने शहजाद भट्टी समेत 9 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। इसमें पाकिस्तान स्थित हैंडलर सोहेल अहमद उर्फ सोहेल बलोच का नाम भी शामिल था। आरोप सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहे। हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ में बब्बर खालसा से जुड़े लोगों के साथ मिलकर ग्रेनेड हमले की साजिश रचने के आरोप भी भट्टी नेटवर्क से जुड़े।

इन घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है। एक ऐसा नेटवर्क सामने आता है जिसमें पाकिस्तान में बैठे हैंडलर, सोशल मीडिया संपर्क, स्थानीय अपराधी, छोटे स्तर पर काम करने वाले युवा और हथियारों की सप्लाई सब एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

12 अगस्त की कार्रवाई ने खोली नेटवर्क की परतें

ऐसे नेटवर्क पर शिकंजा कसने की तैयारी लंबे समय से चल रही थी और स्वतंत्रता दिवस से ठीक पहले 12 अगस्त को सुरक्षा एजेंसियों ने एक साथ बड़ी कार्रवाई की।

उत्तर प्रदेश में 62, हरियाणा में 52, दिल्ली में 51, पंजाब में 44 और राजस्थान में 15 संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। कुल मिलाकर 14 राज्यों में 253 लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई। कार्रवाई सिर्फ गिरफ्तारी या हिरासत तक सीमित नहीं थी। जाँच के दौरान जो सामान बरामद हुआ, उसने सुरक्षा एजेंसियों के सामने मौजूद खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट किया।

पुलिस और जाँच एजेंसियों को पाकिस्तानी हथियार फैक्ट्री की मुहर वाले ग्रेनेड, IED यानी इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस, पिस्तौल और बड़ी संख्या में जिंदा कारतूस बरामद होने की जानकारी दी गई। इसके अलावा ऐसे हाई-टेक CCTV कैमरे भी बरामद किए गए, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठानों पर नजर रखने के लिए किया जा रहा था।

यानी नेटवर्क की तैयारी सिर्फ हमला करने तक सीमित नहीं थी। निगरानी, रेकी, हथियार, विस्फोटक और स्थानीय संपर्क हर स्तर पर एक व्यवस्था तैयार किए जाने के संकेत मिले। इस कार्रवाई के बाद UAPA, आर्म्स एक्ट और NDPS एक्ट के तहत 80 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की गईं। लेकिन सवाल अब भी बाकी है।

शहजाद भट्टी नेटवर्क खत्म भी तो स्लीपर सेल का क्या?

किसी एक नेटवर्क पर कार्रवाई हो जाना और उस मॉडल का पूरी तरह खत्म हो जाना दो अलग-अलग बातें हैं। जाँच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ऐसे नेटवर्क में एक व्यक्ति के पकड़े जाने के बाद दूसरा व्यक्ति उसकी जगह ले सकता है। सोशल मीडिया पर एक अकाउंट बंद होने के बाद दूसरा अकाउंट बनाया जा सकता है। एक स्थानीय संपर्क के पकड़े जाने के बाद दूसरा संपर्क तैयार किया जा सकता है।

यही कारण है कि स्लीपर सेल के खिलाफ लड़ाई सिर्फ किसी एक संगठन या व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में जाँच एजेंसियों को आतंकवाद और गैंगस्टर नेटवर्क के बीच बढ़ते गठजोड़ के संकेत भी मिले हैं। 2024 में एनआईए ने अर्श डल्ला और दूसरे आरोपितों से जुड़े टेरर-गैंगस्टर नेक्सस मामले में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 30 ठिकानों पर छापेमारी की थी।

इसका मतलब साफ है कि आतंकी नेटवर्क के लिए अपराध की दुनिया अब हमेशा अलग दुनिया नहीं रह गई है। कई मामलों में दोनों के रास्ते एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं।

गैंगस्टर नेटवर्क स्थानीय संपर्क और पैसा दे सकता है। आतंकी नेटवर्क हथियार और सीमा पार से हैंडलिंग उपलब्ध करा सकता है। सोशल मीडिया नए लोगों तक पहुंच बनाने का रास्ता दे सकता है और ड्रग्स का नेटवर्क पैसे का इंतजाम कर सकता है। यानी आतंक का मॉडल अब सिर्फ बंदूक और बम तक सीमित नहीं रह गया है।

अब आतंक की भर्ती मोबाइल स्क्रीन से भी हो सकती है

इस बदलते मॉडल का एक और उदाहरण दिल्ली से जुड़े आतंकी मामले में सामने आया, जहाँ उमर नाम के आरोपित पर सोशल मीडिया के जरिए लोगों से संपर्क बनाने और उन्हें जैश-ए-मोहम्मद की विचारधारा से प्रभावित करने का आरोप लगा। जांच में उसके जरिए एक बड़े स्लीपर सेल नेटवर्क को तैयार करने की कोशिश की बात सामने आई।

यही बदलाव सबसे ज्यादा चिंता पैदा करता है। एक समय था जब आतंकवादी नेटवर्क में शामिल होने के लिए किसी व्यक्ति को सीमा पार जाना पड़ता था, किसी संपर्क के जरिए किसी संगठन तक पहुंचना पड़ता था या किसी स्थानीय मॉड्यूल से मिलना पड़ता था। अब मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड ऐप्स उस दूरी को कम कर सकते हैं।

यानी जो खतरा कभी सरहद के उस पार दिखाई देता था, वह अब आपके शहर, आपकी गली और यहां तक कि आपके मोबाइल की स्क्रीन तक पहुँच सकता है। शहजाद भट्टी की कहानी को सिर्फ एक पाकिस्तानी गैंगस्टर की कहानी समझना भी सही नहीं होगा। यह उस बदलते आतंकी मॉडल की कहानी है, जिसमें कई अलग-अलग दुनिया एक-दूसरे से जुड़ रही हैं।

आतंकवाद, हथियार, ड्रग्स, गैंगस्टर नेटवर्क, पैसा, सोशल मीडिया और सीमा पार बैठे हैंडलर जब ये सभी एक ही सिस्टम का हिस्सा बनने लगते हैं तो खतरा सिर्फ किसी एक आतंकी हमले का नहीं रह जाता। यह खतरा देश की सामान्य कानून-व्यवस्था तक पहुँच जाता है।

यही वजह है कि स्लीपर सेल को पकड़ना अब सिर्फ आतंकवाद रोकने की लड़ाई नहीं है। यह उस पूरे नेटवर्क को तोड़ने की लड़ाई है जो अपराध और आतंक के बीच की दूरी को लगातार कम कर रहा है।

शहजाद भट्टी की कहानी इसी बदलते मॉडल की कहानी है। एक ऐसा मॉडल जिसमें अंडरवर्ल्ड की पुरानी लॉजिस्टिक्स, आतंकवाद की सीमा पार फंडिंग, ड्रग्स का पैसा और सोशल मीडिया की नई दुनिया एक-दूसरे से जुड़कर एक नया नेटवर्क तैयार कर रहे हैं। और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि आतंक हमेशा बम या ग्रेनेड लेकर नहीं आता। कभी-कभी वह पहले सिर्फ एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजता है।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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