सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 अप्रैल 2026) को कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा मिली ‘ट्रांजिट एंटीसिपेटरी बेल’ (अग्रिम जमानत) पर लगी रोक को हटाने की माँग की गई थी।
इसके साथ ही कोर्ट ने उनकी जमानत की अवधि को अगले मंगलवार (21 अप्रैल 2026) तक बढ़ाने की गुहार भी नहीं मानी। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चांदुरकर की बेंच ने स्पष्ट किया कि पवन खेड़ा को अब असम की संबंधित अदालत में ही अपनी अर्जी लगानी होगी।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी, रिनिकी भुइयां शर्मा द्वारा दर्ज कराई गई एक FIR से जुड़ा है। पवन खेड़ा पर आरोप है कि उन्होंने दावा किया था कि रिनिकी शर्मा के पास अलग-अलग देशों के कई पासपोर्ट हैं।
इस मामले में असम पुलिस ने उनके खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश जैसी गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया है। इसी गिरफ्तारी से बचने के लिए खेड़ा ने तेलंगाना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
दस्तावेजों में गड़बड़ी पर तल्ख हुई अदालत
सुनवाई के दौरान एक बड़ा खुलासा हुआ। सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को बताया कि पवन खेड़ा ने तेलंगाना में अपना निवास दिखाने के लिए हाई कोर्ट में संदिग्ध दस्तावेज पेश किए थे। आरोप है कि उन्होंने अपने आधार कार्ड के अगले हिस्से और अपनी पत्नी के आधार कार्ड के पिछले हिस्से को मिलाकर एक ‘नया दस्तावेज’ तैयार किया ताकि क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) साबित किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई और इसी आधार पर हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।
वकील की दलील: ‘यह सिर्फ एक छोटी सी गलती थी’
पवन खेड़ा की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि दस्तावेजों का यह मिलान जल्दबाजी में हुई एक ‘छोटी सी गलती’ थी, जिसे बाद में सुधार लिया गया था। उन्होंने कहा कि पवन खेड़ा की पत्नी तेलंगाना से ही हैं और वहाँ चुनाव भी लड़ चुकी हैं।
वरिष्ठ वकील सिंघवी ने कोर्ट से मंगलवार (21 अप्रैल 2026) तक का समय माँगा ताकि पवन खेड़ा असम की अदालत जा सकें, लेकिन बेंच ने कहा कि अगर वहाँ की अदालत बंद भी है, तो विशेष आग्रह कर मामले की सुनवाई कराई जा सकती है।
असम पुलिस की सक्रियता और आगे की राह
असम पुलिस पवन खेड़ा की तलाश में दिल्ली और हैदराबाद में छापेमारी कर चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद खेड़ा के पास असम की स्थानीय अदालत में आत्मसमर्पण करने या अग्रिम जमानत माँगने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि उनकी टिप्पणियों का असर असम की अदालत के फैसले पर नहीं पड़ना चाहिए और वहाँ की कोर्ट मेरिट के आधार पर स्वतंत्र रूप से फैसला ले सकती है।

