Homeदेश-समाजक्या आंतरिक मतभेद को चुनावी हेरफेर का सबूत मानना सही है?

क्या आंतरिक मतभेद को चुनावी हेरफेर का सबूत मानना सही है?

दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं, लेकिन हर आपत्ति को संवैधानिक विफलता मानने से पहले अंतिम निर्णय और ठोस सबूत जरूरी हैं।

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन दो चुनाव आयुक्तों द्वारा किसी प्रस्ताव, प्रक्रिया या प्रशासनिक निर्णय पर आपत्ति दर्ज करना अपने आप में चुनावी प्रक्रिया के अवैध या संदिग्ध होने का प्रमाण नहीं हो सकता।

23 सितंबर 2026 को ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ ने चुनाव आयोग को लेकर एक प्रमुख खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसका शीर्षक है। ‘14 times in 10 months, two Election Commissioners objected on record to steps taken by Commission.‘

रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 अवसरों पर कुछ निर्णयों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्तियाँ दर्ज कीं।

इनका संबंध मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाताओं के नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6, चुनावी डेटा के डिजिटल प्रबंधन और पश्चिम बंगाल में अपीलों की प्रक्रिया से बताया गया है। निश्चित रूप से ये विषय गंभीर हैं।

निर्वाचन सूची में एक भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना चिंता का विषय होना चाहिए। चुनावी डेटा की सुरक्षा और अधिकारियों की वैधानिक शक्तियों की रक्षा भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन यहीं से एक दूसरी और उतनी ही महत्वपूर्ण बात शुरू होती है।

क्या किसी आंतरिक आपत्ति को सीधे ‘चुनाव आयोग की संवैधानिक विफलता’ या ‘चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर’ का प्रमाण मान लिया जाए? यहीं Indian Express की रिपोर्ट के तथ्य और उससे निकाला जा रहा व्यापक निष्कर्ष अलग-अलग दिखाई देते हैं।

पहला प्रश्न: आपत्ति और अंतिम निर्णय में अंतर क्यों नहीं किया जा रहा?

किसी भी संस्थागत व्यवस्था में नीति या प्रशासनिक निर्णय बनने से पहले अधिकारियों और सदस्यों द्वारा सवाल उठाना, सुझाव देना, कानूनी आपत्ति दर्ज करना और वैकल्पिक प्रक्रिया सुझाना सामान्य बात है। निर्वाचन आयोग स्वयं तीन-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत उसे चुनावों के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है।

2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act की धारा 18 में भी आयोग के कामकाज के लिए स्पष्ट व्यवस्था है। आयोग का काम जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना है और यदि सदस्यों में मतभेद हो तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ‘कितनी आपत्तियाँ दर्ज हुईं?’ बल्कि यह होना चाहिए ‘उन आपत्तियों के बाद अंतिम निर्णय क्या हुआ?’ क्या कोई निर्णय वास्तव में कानून के विरुद्ध पाया गया? क्या किसी सक्षम न्यायिक संस्था ने उसे अवैध घोषित किया? क्या किसी अंतिम आदेश को आयोग ने वापस लिया? क्या इन आपत्तियों के कारण किसी चुनाव का परिणाम प्रभावित हुआ? या फिर ये उन आंतरिक संवाद व विचार-विमर्श का हिस्सा थीं जिनके बाद अंतिम निर्णय विधिसम्मत तरीके से लिया गया? ये सभी प्रश्न अलग-अलग हैं।

14 का आंकड़ा प्रभावशाली है, लेकिन अपने आप में निर्णायक नहीं

’10 महीनों में 14 बार आपत्ति’, यह निश्चित रूप से एक ध्यान आकर्षित करने वाला आंकड़ा है। लेकिन केवल संख्या से किसी संस्था की वैधानिकता निर्धारित नहीं होती।

यदि किसी कैबिनेट में मंत्री किसी प्रस्ताव पर आपत्ति करता है, तो वह आपत्ति सरकार के भीतर विचार-विमर्श का हिस्सा होती है। यदि न्यायालय में किसी मामले पर न्यायाधीशों के बीच मतभेद होता है, तो अंतिम निर्णय बहुमत से होता है। इसी प्रकार बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में भी आंतरिक मतभेद का होना अपने आप में असंवैधानिकता का प्रमाण नहीं है।

इसका दूसरा पहलू भी है। यदि किसी सदस्य को लगता है कि कोई प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं है, तो उसका उस पर लिखित आपत्ति दर्ज करना संस्थागत नियंत्रण और संतुलन स्थापित करने की नीति का हिस्सा भी हो सकता है।

स्वयं निर्वाचन आयोग ने 23 सितंबर को कहा कि लिखित टिप्पणियाँ, Observations, Technical Suggestions और Internal Checks and Balances उसकी नियमित कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि अंतिम आदेश और निर्णय वैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप तथा कानूनी अधिकार के साथ जारी किए गए हैं। इसलिए आपत्ति का अस्तित्व और अंतिम निर्णय की वैधता दो अलग प्रश्न हैं।

फॉर्म-6: गंभीर सवाल है, लेकिन निष्कर्ष के लिए और प्रमाण चाहिए

इंडियन एक्सप्रेस ने फार्म- 6 में किए गए बदलाव को विशेष महत्व दिया है। रिपोर्ट के अनुसार नए मतदाता के आवेदन में SIR से संबंधित एक प्रश्न जोड़ा गया और दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस पर आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस बदलाव को लेकर वैधानिक अधिकार और नियमों में संशोधन की आवश्यकता का प्रश्न उठाया गया था। यदि किसी वैधानिक फॉर्म में ऐसा परिवर्तन किया गया है जिसके लिए नियमों में संशोधन आवश्यक था, तो यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि वह परिवर्तन किस अधिकार के तहत किया गया और किसने उसे अनुमोदित किया।

लेकिन यहाँ भी दो अलग-अलग दावे हैं- पहला: फॉर्म-6 में एक प्रक्रियात्मक बदलाव हुआ। दूसरा: उस बदलाव के माध्यम से नागरिकों को जानबूझकर मताधिकार से वंचित किया गया। पहले दावे के लिए प्रशासनिक और कानूनी दस्तावेज चाहिए। दूसरे दावे के लिए उससे कहीं अधिक ठोस प्रमाण चाहिए। दोनों को एक ही मान लेना पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श दोनों के लिए उचित नहीं होगा।

मतदाता डेटा का केंद्रीकरण: चिंता जायज़ है, लेकिन ‘केंद्रीकरण का मतलब हेरफेर’ नहीं होता रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ECI.Net और चुनावी डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़ा है। दो चुनाव आयुक्तों ने कथित रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि मतदाता सूची के डिजिटल डेटा तक राज्य और स्थानीय स्तर के अधिकारियों की पहुँच प्रभावित हो रही है और डेटाबेस के केंद्रीकरण की दिशा में बदलाव हो रहा है।

यह विषय तकनीकी और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से गंभीर है। लेकिन डिजिटल केंद्रीकरण को सीधे चुनावी हेरफेर का पर्याय बना देना भी उचित नहीं है। आज दुनिया भर में प्रशासनिक प्रणालियों का डिजिटाइजेशन और सेंट्रलाइज्ड डाटाबेस मैनेजमेंट बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य कई बार डेटा की एकरूपता, सुरक्षा, ऑडिट ट्रायल और डुप्लीकेट रिकॉर्ड्स या आंकड़ों को नियंत्रित करना भी हो सकता है।

इसलिए वास्तविक जांच निम्नलिखित सवालों के आधार पर होनी चाहिए, किस अधिकारी के पास किस स्तर की पहुंच है? कौन डेटा में बदलाव कर सकता है? प्रत्येक बदलाव का ऑडिट ट्रायल क्या है? क्या राज्य के वैधानिक अधिकारियों की शक्तियाँ वास्तव में सीमित हुई हैं? क्या किसी अनधिकृत व्यक्ति ने डेटा में बदलाव किया? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम इसी कारण हटाया गया? और क्या उस हटाए जाने का कोई प्रमाणित चुनावी प्रभाव पड़ा? इन प्रश्नों के उत्तर तकनीकी ऑडिट से ही मिलेंगे, केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं।

गोवा के 97 मतदाता: हर वोट महत्वपूर्ण है, लेकिन आंकड़े का सही संदर्भ भी जरूरी है

रिपोर्ट में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया है, जिनके बारे में कहा गया कि वे संबंधित प्रक्रिया में पात्र पाए गए, लेकिन सॉफ्टवेयर व्यवस्था के कारण उनके नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो सके। यह मामला निश्चित रूप से प्रश्न उठाता है।

एक भी पात्र मतदाता का वोट तकनीकी या प्रशासनिक कारण से छूटना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि पूरे देश की मतदाता सूची में व्यापक स्तर पर जानबूझकर हेरफेर हो रही है। इस मामले की निष्पक्ष जांच का रास्ता स्पष्ट है

कितने मतदाता प्रभावित हुए? किस स्तर पर गलती हुई? क्या इसमें सॉफ्टवेयर की प्रतिबंधित सीमा तय कर दी गई थी? क्या अधिकारियों को वैकल्पिक प्रक्रिया उपलब्ध थी? क्या बाद में सुधार किया गया? क्या जिम्मेदारी निर्धारित हुई?

यही उपर्युक्त सवालों के आधार पर साबित किए गए तथ्य तय करेंगे कि यह प्रशासनिक चूक थी, तकनीकी समस्या थी या उससे अधिक गंभीर मामला।

पश्चिम बंगाल की अपीलों का मामला भी दस्तावेजों से तय होना चाहिए

रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में उन मतदाताओं से जुड़ी अपीलों का मुद्दा उठाया गया है जिन्हें SIR प्रक्रिया के दौरान हटाया गया या शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त संधू ने यह प्रश्न उठाया कि कुछ अपीलें किसके अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत दाखिल की गईं।

लेकिन यहाँ भी मूल प्रश्न होना चाहिए, किसने आदेश दिया? किस नियम के तहत दिया? किस अधिकारी ने अपील दायर की? किस रिकॉर्ड में उसका उल्लेख है? यदि दस्तावेज बताते हैं कि कोई अधिकारी अपनी वैधानिक शक्तियों के बाहर गया था, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन यदि दस्तावेज वैधानिक प्रक्रिया का पालन दिखाते हैं, तो केवल यह तथ्य कि किसी आयुक्त ने उस प्रक्रिया पर प्रश्न उठाया था, उसे स्वतः अवैध नहीं बना देता।

निर्वाचन आयोग का जवाब भी काफी महत्वपूर्ण है

इस पूरे विवाद में एक तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिसे किसी भी गंभीर विश्लेषण में शामिल किया जाना चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अलग-अलग टिप्पणियाँ, सुझाव और आपत्तियाँ बहु-सदस्यीय संस्था के सामान्य संवाद एवं विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

आयोग ने कहा कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए और उसके आदेश वैधानिक प्रक्रिया तथा कानून के अनुरूप जारी हुए। आयोग का यह जवाब हर आरोप का अंतिम न्यायिक निपटारा नहीं है।

लेकिन उसी तरह इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट भी प्रत्येक आरोप का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। दोनों को सार्वजनिक रिकॉर्ड पर रखकर तथ्यात्मक परीक्षण करना ही उचित लोकतांत्रिक तरीका है।

क्या संवैधानिक संस्थाओं के भीतर ‘आंतरिक मतभेद’ लोकतंत्र के लिए खतरा हैं?

यहाँ एक बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत समझना आवश्यक है। किसी संवैधानिक संस्था के भीतर मतभेद होना लोकतंत्र की विफलता का प्रमाण नहीं है। कई बार संस्थागत मतभेद ही बेहतर निर्णय की ओर ले जाते हैं।

खतरा तब पैदा होता है जब असहमति को दर्ज करने की अनुमति न हो, निर्णय लेने की प्रक्रिया कानून के बाहर चली जाए, वैधानिक अधिकारियों की शक्तियाँ मनमाने ढंग से छीनी जाएँ, डेटा में अनधिकृत परिवर्तन हो, या नागरिकों के वैधानिक अधिकार वास्तव में प्रभावित हों। इसलिए हमें ‘मतभेद हुआ’ और ‘संस्था ने कानून तोड़ा’ के बीच की रेखा स्पष्ट रखनी होगी।

पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है, फैसला सुनाना नहीं

इंडियन एक्सप्रेस ने दस्तावेजों और अंदरूनी संवाद के आधार पर कुछ प्रश्न उठाए हैं। उन प्रश्नों का उत्तर निर्वाचन आयोग को देना चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक विमर्श में एक और सिद्धांत उतना ही महत्वपूर्ण है।

खोजी पत्रकारिता का निष्कर्ष भी स्वतंत्र तथ्य जांच से परे नहीं होता। किसी रिपोर्ट में किसी अधिकारी द्वारा किसी कदम को गैर-कानूनी या अनधिकृत कहा जाना उस कदम को न्यायिक रूप से अवैध सिद्ध नहीं करता।

वह संबंधित अधिकारी की दर्ज की गई राय है। उसी प्रकार आयोग द्वारा ‘सब कुछ सर्वसम्मति से हुआ’ कहना भी उन विशिष्ट प्रक्रियात्मक सवालों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता समाप्त नहीं करता। इसलिए सही रास्ता है: कानून के आधार पर सबूत आधारित दस्तावेज सामने रखिए और फिर तथ्य के आधार पर निष्कर्ष निकालिए।

14 आपत्तियाँ कोई फैसला नहीं

इस पूरे विवाद में सबसे अधिक सावधानी जिस चीज की आवश्यकता है, वह है हेडलाइन और सबूत के बीच अंतर करना। ‘दो चुनाव आयुक्तों ने 14 बार आपत्ति की’ यह एक रिपोर्टेड तथ्य है।

लेकिन इससे स्वतः यह सिद्ध नहीं होता कि चुनाव आयोग ने चुनावों में हेरफेर किया। यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि- मतदाता सूची जानबूझकर बदली गई। और यह भी स्वतः सिद्ध नहीं होता कि भारत की चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता समाप्त हो गई है।

इनमें से प्रत्येक गंभीर आरोप के लिए अलग और ठोस प्रमाण चाहिए। और यही लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में बहस का सही मानदंड होना चाहिए। न चुनाव आयोग के प्रति अंधविश्वास, न उसके प्रति अंध-अविश्वास सिर्फ प्रमाण।

यदि आयोग के किसी निर्णय में कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसे सामने लाया जाना चाहिए और सुधार होना चाहिए। यदि किसी पात्र मतदाता के अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो उसे तत्काल ठीक किया जाना चाहिए। यदि डिजिटल प्रणाली में सुरक्षा की कमी है, तो स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए।

लेकिन यदि अंतिम निर्णय कानून के अनुरूप लिए गए, आंतरिक टिप्पणियाँ संवाद एवं विचार- विमर्श का हिस्सा थीं और कोई चुनावी हेरफेर प्रमाणित नहीं हुआ, तो केवल आंतरिक मतभेदों को लेकर पूरी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर अंतिम फैसला सुनाना भी उचित नहीं होगा। लोकतंत्र आरोपों से नहीं, प्रमाणों से मजबूत होता है।

और अंततः यही इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी होनी चाहिए, 14 आपत्तियाँ एक जांच का विषय हो सकती हैं; लेकिन वे अपने आप में “चुनाव आयोग दोषी है” का फैसला नहीं हैं। यही अंतर जवाबदेह पत्रकारिता और राजनीतिक जुमलेबाजी आधारित प्रोपेगेंडा के बीच भी है।

और अंत में यह भी सत्य है कि भारत में चुनावी राजनीति का संघर्ष इनदिनों केवल भाजपा या नरेंद्र मोदी के खिलाफ राजनीतिक मुकाबले तक सीमित दिखाई नहीं देता हैं। राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, तेजस्वी यादव, ममता बनर्जी, पप्पू यादव, संजय राउत सहित विपक्ष के कई नेता लगातार चुनाव आयोग और उसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।

चुनाव आयोग की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन किसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर लगातार ऐसे आरोप लगाना जिनके समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत न किए जाएँ, लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।

चुनाव आयोग की भूमिका किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने की है। जाहिर है राजनीति की हताशा में संवैधानिक संस्थाएं निशाने पर हैं।

SIR यानी Special Intensive Revision को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। मतदाता सूची में नाम, पता, मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरी प्रविष्टि अथवा पहचान से जुड़ी विसंगतियों की जाँच लोकतांत्रिक चुनाव की सामान्य आवश्यकता है।

यदि किसी मतदाता को नोटिस मिलता है, तो उसका उद्देश्य स्वतः उसका अधिकार समाप्त करना नहीं है; प्रक्रिया में जवाब देने और निर्धारित कानूनी उपायों का प्रावधान भी है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में की गई SIR को वैधानिक आधार वाला और चुनावी सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जुड़ा हुआ माना तथा प्रक्रिया में नोटिस, सुनवाई और अपील जैसे सुरक्षा उपायों को महत्वपूर्ण माना।

इसलिए वास्तविक बहस यह होनी चाहिए कि SIR पारदर्शी, निष्पक्ष और कानून के अनुरूप कैसे चले न कि हर सत्यापन को राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया जाए। विपक्ष को चुनाव आयोग के किसी निर्णय पर आपत्ति है तो वह तथ्य, दस्तावेज और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उसे चुनौती दे सकता है।

लेकिन चुनावी असहमति और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने के बीच एक स्पष्ट अंतर है। लोकतंत्र में सरकारें और राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, लेकिन चुनाव की निष्पक्षता व संस्थागत विश्वसनीयता पूरे देश की साझा पूँजी है।

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Nikhil Anand
Nikhil Anand
Dr. Nikhil Anand is currently associated with the BJP. Earlier he had worked as a television journalist for 17 years. He holds M.Phil and Ph.D degrees and has studied at JNU and IIMC, New Delhi.

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