Monday, November 30, 2020
Home बड़ी ख़बर CBI की गिरती साख: कब तक होती रहेगी केंद्रीय एजेंसियों की फ़ज़ीहत

CBI की गिरती साख: कब तक होती रहेगी केंद्रीय एजेंसियों की फ़ज़ीहत

2nd ARC की रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि सीबीआई को DSPE एक्ट से मुक्त कर एक पृथक सीबीआई एक्ट के अंतर्गत स्थापित किया जाना चाहिए लेकिन अभी तक इस पर अमल नहीं किया गया है।

कुछ दिन पहले पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पुलिस ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को बचाने के लिए सीबीआई अधिकारियों को बंधक बनाने की शर्मनाक हरकत की। इस घटना से न केवल केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो जैसी उच्च स्तरीय जाँच एजेंसी की छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया बल्कि राज्य और केंद्र के मध्य अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हुई। किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ऐसी परिस्थिति उसके संघीय ढाँचे के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकती है।

राजीव कुमार को कई बार समन भेजा जा चुका था जिसके बाद सीबीआई की टीम उनसे पूछताछ करने गई थी लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने सारी लोकतांत्रिक शुचिता को दरकिनार कर सीबीआई का मजाक बना कर रख दिया। ध्यातव्य है कि सीबीआई को तीन प्रकार से केस सुपुर्द किए जाते हैं।

एक तो तब जब राज्य सरकार की पुलिस किसी केस को सुलझाने में असफल होती है तब राज्य सरकार केंद्र से सीबीआई जाँच करवाने का आग्रह करती है। दूसरा तरीका है कि केंद्र सरकार स्वयं किसी महत्वपूर्ण केस की जाँच सीबीआई से करवाना चाहे तो करवा सकती है। इन दोनों परिस्थितियों के अतिरिक्त हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सीबीआई जाँच के आदेश दे सकते हैं।   

जब सीबीआई को राज्य से किसी केस की जाँच की अनुमति मिल जाती है तब उसे उस राज्य में पुलिस के अधिकार मिल जाते हैं। इसी अधिकार के चलते सीबीआई राजीव कुमार से पूछताछ करने गई थी। संविधान केंद्र सरकार को यह अधिकार भी देता है कि यदि किसी राज्य में संकट उत्पन्न हो तो केंद्र हस्तक्षेप कर सकता है।

कानून व्यवस्था मुख्य रूप से राज्य के जिम्मे है किंतु यदि राज्य की स्थिति बिगड़ जाए और कोर्ट सीबीआई जाँच का आदेश दे तो सीबीआई कोर्ट का आदेश मानने को बाध्य है। इस दृष्टि से हज़ारों करोड़ों रुपए के चिट फंड घोटाले (जिनसे लाखों लोग प्रभावित हुए) से संबंधित केस की छानबीन सीबीआई से करवाना केंद्र सरकार का दायित्व है। इस कार्य में बाधा उत्पन्न करना या तो भ्रष्टाचार को समर्थन देने जैसा है, या फिर राज्य का अपनी जनता की पीड़ा से मुँह मोड़ने जैसा।

हालाँकि, सीबीआई की छवि पहली बार धूमिल नहीं हुई है। कुछ महीने पहले सीबीआई के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच चली तनातनी का तमाशा देश ने देखा। एक दूसरे के ऊपर आरोप प्रत्यारोप करते हुए निदेशक आलोक वर्मा और सेकंड इन कमांड राकेश अस्थाना ने सीबीआई जैसे संस्थान की अच्छी खासी फ़ज़ीहत करवाई। सरकार ने दोनों को छुट्टी पर भेजा जिसके बाद मामला कोर्ट में गया। इन सबके बीच 25 अक्टूबर 2018 को एक विचित्र खबर आई कि इंटेलिजेंस ब्यूरो के 4 अधिकारी आलोक वर्मा के घर के बाहर ‘पकड़े’ गए।

अर्थात अभी तक तो एक ही एजेंसी ‘तोता’ उपनाम लेकर बदनाम थी लेकिन आईबी के अधिकारियों को जिस प्रकार सड़क पर घसीटा गया था उससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधीन काम करने वाली केंद्रीय एजेंसियों की वास्तव में क्या स्थिति है।

आंतरिक और बाह्य सुरक्षा

एजेंसियों का कार्यक्षेत्र समझने के लिए देश के सुरक्षा ढाँचे को समझना ज़रूरी है। सुरक्षा के मुख्यतः दो प्रकार हैं- आंतरिक और बाह्य। बाह्य सुरक्षा सशस्त्र सेनाओं के जिम्मे है जबकि आंतरिक सुरक्षा का दायित्व गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली एजेंसियाँ संभालती हैं जिनमें सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फ़ोर्स कहलाने वाले बल भी सम्मिलित हैं।  

यदि संपूर्ण सुरक्षा ढाँचे की कल्पना एक मनुष्य के रूप में की जाए तो हम देखेंगे की सशस्त्र सेनाएँ इस मनुष्य के पाँव हैं जो सीमाएँ लाँघने में सक्षम हैं, राज्य सरकारों की पुलिस और केंद्रीय पुलिस बल इस मनुष्य के हाथ हैं जो एक दायरे के अंदर ही काम कर सकते हैं लेकिन इंटेलिजेंस या गुप्तचर विभाग इस सुरक्षा रूपी मनुष्य का दिमाग है जो दूर तक सोच सकता है और भविष्य के खतरों को भाँप सकता है।

जहाँ जाँच एजेंसियाँ वारदात होने के बाद काम करती हैं वहीं इंटेलिजेंस एजेंसियाँ अपराध होने से पहले उसके घटित होने की संभावनाओं पर निगरानी रखती हैं। सीबीआई और आईबी के कार्यक्षेत्र में यह मूल अंतर है। आईबी को पब्लिक आर्डर और आंतरिक सुरक्षा संबंधी सूचनाएँ गुप्त रूप से इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी दी गई है जिसके अंतर्गत उसे संवेदनशील स्थानों पर निगरानी रखनी होती है। किंतु आलोक वर्मा प्रकरण में आईबी की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े किए गए।

सीबीआई और आईबी दोनों की फ़ज़ीहत होने का एक ही कारण है। वह यह कि दोनों एजेंसियों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं हैं और इन दोनों की वैधानिक स्थिति भी स्पष्ट नहीं है। जहाँ सीबीआई अपनी उत्पत्ति का स्रोत दिल्ली पुलिस स्पेशल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट (1946) बताती है वहीं आईबी किसी भी कानून द्वारा स्थापित एजेंसी नहीं है। नवंबर 2013 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने सीबीआई को ‘असंवैधानिक’ घोषित कर दिया था। इससे पहले 2012 में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आईबी के वैधानिक दर्ज़े पर सवाल खड़े किए थे।

हालाँकि द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि सीबीआई को DSPE एक्ट से मुक्त कर एक पृथक सीबीआई एक्ट के अंतर्गत स्थापित किया जाना चाहिए लेकिन अभी तक इस पर अमल नहीं किया गया है।

अमरीका और हमारे सुरक्षा प्रणाली में यही मौलिक भेद है। अमरीका ने 1947 में National Security Act पास कर एक्सटर्नल इंटेलिजेंस एजेंसी सीआईए बनाई और आंतरिक सुरक्षा के लिए एफबीआई को तमाम ऐसे वैधानिक अधिकार दिए जिससे वह कॉउंटर इंटेलीजेंस और आपराधिक जाँच दोनों कार्य करती है।

हमें भी स्वतंत्रता के बाद ऐसी ही स्वायत्तता प्राप्त आंतरिक सुरक्षा एजेंसी बनानी थी जो इंटेलिजेंस एकत्र करना और आपराधिक जाँच दोनों कर सके क्योंकि इंटेलिजेंस और ‘इन्वेस्टिगेशन’ एक दूसरे से गहराई तक जुड़े हुए पहलू हैं। भ्रष्टाचार और संगठित अपराध से लेकर आतंकवाद तक आज सभी प्रकार के अपराधों के तार आपस में जुड़े होते हैं। कई बार एजेंसियों में बेहतर तालमेल न होने के कारण जाँच प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होती है।

एक समय सीबीआई का निदेशक केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) नियुक्त करता था। भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच करने में आज भी CVC को सीबीआई से अधिक अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन CVC के पास फुल टाइम चीफ़ विजिलेंस अफसर नहीं हैं जो सीबीआई की तरह जाँच कर सकें। और सीबीआई को राज्य में पुलिस के अधिकार देने के बावजूद हथियार नहीं दिए जाते। इससे यह पता चलता है कि जिस एजेंसी के पास अधिकार हैं उसके पास दायित्व नहीं है और जिसके पास दायित्व है उसे अधिकार नहीं दिए गए।

देश की अन्य एजेंसियों की वैधानिकता की बात करें तो 2017 में एक मजेदार बात हुई थी। देश के किसी भी कानून में एक इंटेलिजेंस एजेंसी का कार्यक्षेत्र परिभाषित नहीं है फिर भी 2017 में नेशनल टेक्निकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन (NTRO) के कर्मचारियों को Intelligence Organisations (Restriction of Rights) Act, 1985 के अधीन लाकर यूनियन बनाने से रोक दिया गया था।

आतंकवाद से लड़ने के लिए हड़बड़ी में कानून लाकर बनाई गई जाँच एजेंसी एनआईए का दायरा भी सीमित ही है। आज आवश्यकता है एक ऐसी एजेंसी की जो आंतरिक सुरक्षा, भ्रष्टाचार की जाँच, इंटेलिजेंस एकत्र करना और आतंकवाद इन सभी ज़िम्मेदारियों को पूर्ण स्वायत्ता के साथ संभाल सके।   

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

किसान कहीं भी डायरेक्ट बेचे Vs किसान खेत के बाहर कैसे बेचेगा: 6 साल में वीडियो से समझें राहुल गाँधी की हालत

अप्रैल 2014 में राहुल गाँधी ने 'नेटवर्क 18' के अशीत कुणाल के साथ इंटरव्यू में कृषि और किसान पर बात की थी। आज वो कृषि कानून के विरोध में हैं।

गोलियों से भूना, मन नहीं भरा तो बम विस्फोट किया: 32 परिवारों के खून से अबोहर में खालिस्तानियों ने खेली थी होली

पूरी घटना में 22 लोग मौके पर खत्म हो गए, 10 ने अस्पताल में दम तोड़ा, कइयों ने पसलियाँ गँवा दीं, कुछ की अंतड़ियाँ बाहर आ गईं, किसी के पाँव...

केरल का सिंह, जिससे काँपते थे टीपू और ब्रिटिश: अंग्रेजों ने बताया स्वाभाविक सरदार, इतिहासकारों ने नेपोलियन से की तुलना

केरल में उन्हें सिंह कहा जाता है। इतिहासकार उनकी तुलना नेपोलियन से करते हैं। दुश्मन अंग्रेजों ने उन्हें 'स्वाभाविक नेता' बताया। मैसूर की इस्लामी सत्ता उनसे काँपती थी।

जिस गर्भवती महिला के पेट में लात मारी थी वामपंथी नेता ने, अब वो BJP के टिकट पर लड़ रहीं चुनाव

ज्योत्स्ना जोस ने बीच-बचाव करना चाहा तो उनके हाथ बाँध दिए गए और मारने को कहा गया। उनके पेट पर हमला करने वालों में एक CPIM नेता...

जो बायडेन की टीम में एक और भारतीय: नीरा टंडन को बजट प्रबंधन की जिम्मेदारी मिलनी तय, बनेंगी OMB की निदेशक

प्रशासन के बजट का पूरा प्रबंधन OMB ही देखता है। 50 वर्षीय नीरा टंडन इस पद को संभालने वाली पहली महिला होंगी। जो बायडेन जल्द करेंगे घोषणा।

बेटी हुई तो भी छोड़ा, बेटा के बाद भी छोड़ा… फिर तलाक भी फाइल किया: वाजिद खान की पारसी बीवी का दर्द

वाजिद की माँ के दबाव का असर उनके रिश्ते पर ऐसा पड़ा कि आर्शी (उनकी बेटी) जब ढाई तीन साल की थी, तब वाजिद घर छोड़ गए और...

प्रचलित ख़बरें

दिवंगत वाजिद खान की पत्नी ने अंतर-धार्मिक विवाह की अपनी पीड़ा पर लिखा पोस्ट, कहा- धर्मांतरण विरोधी कानून का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए

कमलरुख ने खुलासा किया कि कैसे इस्लाम में परिवर्तित होने के उनके प्रतिरोध ने उनके और उनके दिवंगत पति के बीच की खाई को बढ़ा दिया।

‘बीवी सेक्स से मना नहीं कर सकती’: इस्लाम में वैवाहिक रेप और यौन गुलामी जायज, मौलवी शब्बीर का Video वायरल

सोशल मीडिया में कनाडा के इमाम शब्बीर अली का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें इस्लाम का हवाला देते हुए वह वैवाहिक रेप को सही ठहराते हुए देखा जा सकता है।

‘जय हिन्द नहीं… भारत माता भी नहीं, इंदिरा जैसा सबक मोदी को भी सिखाएँगे’ – अमानतुल्लाह के साथ प्रदर्शनकारियों की धमकी

जब 'किसान आंदोलन' के नाम पर प्रदर्शनकारी द्वारा बयान दिए जा रहे थे, तब आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान वहीं पर मौजूद थे।

मंदिर में जबरन घुस गया मंजूर अली, देवी-देवताओं और पुजारियों को गाली देते हुए किया Facebook Live

मंदिर के पुजारियों और वहाँ मौजूद लोगों ने मंजूर अली को रोकने का प्रयास किया, तब उसने उन लोगों से भी गाली गलौच शुरू कर दिया और...

दिल्ली दंगों के दौरान मुस्लिमों को भड़काने वाला संगठन ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों को पहुँचा रहा भोजन: 25 मस्जिद काम में लगे

UAH के मुखिया नदीम खान ने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे लोगों को मदद पहुँचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है।

साग खोंट रही दलित ‘प्रीति साहनी’ को अपने पास बुलाया, फिर गला रेत मार डाला: सैयद को UP पुलिस ने किया अरेस्ट

उत्तर प्रदेश के बलिया में अपने ननिहाल गई दलित समुदाय की एक युवती की मुस्लिम समुदाय के एक युवक सैयद ने हत्या कर दी। आरोपित हुआ गिरफ्तार।

हैदराबाद चुनावों से पहले ओवैसी ने खुद को बताया ‘लैला’, बिहार चुनावों के बाद कहा था- फँस गई रजिया गुंडो में

हैदराबाद निकाय चुनावों से पहले असदुद्दीन ओवैसी ने अजीबोगरीब बयान देते हुए खुद को कई मजनू से घिरी लैला बताया है।

AAP की कैंडिडेट या पानी की बोतल: हैदराबाद निकाय चुनावों में आसरा फातिमा की बुर्के वाली पोस्टर वायरल

हैदराबाद निकाय चुनाव में AAP की उम्मीदवार आसरा फातिमा का एक पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें वह पहचान में ही नहीं आ रहीं।

गाने पर मेरे समुदाय के लोग मुझे दुत्कारते थे: सितारा परवीन ने इंडियन आइडल में बताया, खानदान के लोगों ने भी नहीं दिया साथ

बिहार के एक छोटे से गाँव से आई इंडियन आइडल की सितारा परवीन ने अपने संघर्षों पर बात करते हुए बताया है कि कैसे उन्हें समुदाय का विरोध झेलना पड़ा।

किसान कहीं भी डायरेक्ट बेचे Vs किसान खेत के बाहर कैसे बेचेगा: 6 साल में वीडियो से समझें राहुल गाँधी की हालत

अप्रैल 2014 में राहुल गाँधी ने 'नेटवर्क 18' के अशीत कुणाल के साथ इंटरव्यू में कृषि और किसान पर बात की थी। आज वो कृषि कानून के विरोध में हैं।

13 साल की बच्ची, 65 साल का इमाम: मस्जिद में मजहबी शिक्षा की क्लास, किताब के बहाने टॉयलेट में रेप

13 साल की बच्ची मजहबी क्लास में हिस्सा लेने मस्जिद गई थी, जब इमाम ने उसके साथ टॉयलेट में रेप किया।

गोलियों से भूना, मन नहीं भरा तो बम विस्फोट किया: 32 परिवारों के खून से अबोहर में खालिस्तानियों ने खेली थी होली

पूरी घटना में 22 लोग मौके पर खत्म हो गए, 10 ने अस्पताल में दम तोड़ा, कइयों ने पसलियाँ गँवा दीं, कुछ की अंतड़ियाँ बाहर आ गईं, किसी के पाँव...

‘हिंदू लड़की को गर्भवती करने से 10 बार मदीना जाने का सवाब मिलता है’: कुणाल बन ताहिर ने की शादी, फिर लात मार गर्भ...

“मुझे तुमसे शादी नहीं करनी थी। मेरा मजहब लव जिहाद में विश्वास रखता है, शादी में नहीं। एक हिंदू को गर्भवती करने से हमें दस बार मदीना शरीफ जाने का सवाब मिलता है।”

जब कंगना ने खोज निकाला ‘रनौत’ की कुलदेवी का 1200 वर्ष प्राचीन मंदिर, पैतृक गाँव में की स्थापना

कंगना रनौत ने बताया कि जब वे फिल्मों में आईं और देश-विदेश में यात्राएँ करने लगीं, तो उनकी माँ ने उनसे कहा कुलदेवी की तलाश करने को कहा।

केरल का सिंह, जिससे काँपते थे टीपू और ब्रिटिश: अंग्रेजों ने बताया स्वाभाविक सरदार, इतिहासकारों ने नेपोलियन से की तुलना

केरल में उन्हें सिंह कहा जाता है। इतिहासकार उनकी तुलना नेपोलियन से करते हैं। दुश्मन अंग्रेजों ने उन्हें 'स्वाभाविक नेता' बताया। मैसूर की इस्लामी सत्ता उनसे काँपती थी।

जिस गर्भवती महिला के पेट में लात मारी थी वामपंथी नेता ने, अब वो BJP के टिकट पर लड़ रहीं चुनाव

ज्योत्स्ना जोस ने बीच-बचाव करना चाहा तो उनके हाथ बाँध दिए गए और मारने को कहा गया। उनके पेट पर हमला करने वालों में एक CPIM नेता...

हमसे जुड़ें

272,571FansLike
80,493FollowersFollow
358,000SubscribersSubscribe