Wednesday, November 25, 2020
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सत्ता पाकर शिक्षा को कैसे बर्बाद किया जाता है यह कॉन्ग्रेस से सीखना चाहिए

वैचारिक प्रतिबद्धता के नाम पर योग्यता का पैमाना तय करना गलत है। अगर राहुल गाँधी वाकई चाहते हैं कि शिक्षा का स्तर सुधरे तो उन्हें सबसे पहले अपने मुख्यमंत्रियों और नेताओं को निर्देश देने चाहिए कि वह ऐसे बदलाव न करें जो उनके अध्यक्ष को ही थूक कर चाटने पर मजबूर कर दे।

देश के मुख्य विपक्षी दल कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी बीते दिनों राष्ट्रीय राजधानी स्थित एक स्टेडियम में शिक्षा के मुद्दे पर छात्रों से बात कर रहे थे। उन्होंने तमाम तरह की बातें कीं। उनकी पीआर टीम ने युवा छात्र छात्राओं की बाइट लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। लगा कि वाह! कोई एक ऐसा दल भी है जो शिक्षा के बारे में सोचता है। राहुल जी का मानना है कि बिना शिक्षा की रीढ़ मजबूत किए देश का विकास नहीं हो सकता। यह सच भी है, हम इससे इनकार नहीं कर सकते।

लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में आए दिन विश्वविद्यालयों में हो रहे ‘गैर कानूनी’ बदलाव पर उनकी चुप्पी साल जाती है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार आते ही एक साक्षात्कार में खुद तमाम शैक्षणिक संस्थाओं के अप्रत्यक्ष मालिक मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा था कि माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का ‘अड्डा’ बन चुका है। उन्होंने कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो हम संस्थाओं में बदलाव करने से पीछे नहीं हटेंगे।

बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है बशर्ते कि वह प्रतिशोध की अग्नि से भरा न हो। कमलनाथ ने माखन लाल में जो किया वह बदलाव नहीं बल्कि प्रतिशोध नजर आया। सिर्फ इसलिए किसी विश्वविद्यालय के वीसी जगदीश उपासने को पद से हटने के लिए मजबूर कर देना कि वह संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी एक पत्रिका के संपादक थे, कतई समझ के परे है।

कुछ ऐसा ही हाल छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किया गया। छत्तीसगढ़ में वर्षों से सत्ता की लालसा में भूखी कॉन्ग्रेस ने सत्ता की चाभी पाते ही वहाँ के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में ‘मनमाना’ बदलाव शुरू कर दिया। राजस्थान में तो मानो अशोक गहलोत की सरकार को ओम थानवी से बेहतर कोई मिला ही नहीं। पत्रकारिता के किसी विश्वविद्यालय को ऐसा वीसी मिलना जो ऐसे दल विशेष के प्रति निष्ठा रखता हो जिसकी पार्टी ने चीन के युद्ध के समय देश का साथ नहीं दिया! इतना ही नहीं यह शख्स दिल्ली में सत्ताधारी दल आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र समूह का मेंबर रह चुका है। यह समझ के परे है कि खुद को बुद्धिजीवियों का खजाना बताने वाली कॉन्ग्रेस को भी एक वीसी पद के लिए उस शख्स का सहारा लेना पड़ा जिसने उसी दल के लिए काम किया जिससे कांग्रेस दिल्ली में गठबंधन तक नहीं करना चाहती।

देश के किसी भी विश्वविद्यालय में किसी भी आमूल चूल बदलाव को फासीवाद का नाम देने वाले कांग्रेस और वामदलों ने एफटीआईआई के पूर्व चेयरमैन गजेंद्र सिंह चौहान का विरोध इतने निचले स्तर पर आकर किया था कि आखिरकार उन्हें इस्तीफा देना पड़ गया। लाल सलाम और अभिव्यक्ति की आजादी के नारों से गुंजायमान रहने वाले जेएनयू कैंपस के एक हिस्से में जब भारतीय जनसंचार संस्थान के निदेशक पद पर केजी सुरेश को नियुक्त किया गया तो उनका विरोध इस बात पर किया जाने लगा कि उन्हें पत्रकारिता ही नहीं आती। विरोध का स्वर छात्रों में ठूंस दिया गया और जब सुरेश ने संस्थान की साख को दांव पर लगने से रोकने के लिए कुछ कड़े फैसले लिए तो उनकी तस्वीरों को फोटोशॉप कर उन्हें ‘हिटलर’ तक की संज्ञा दी जाने लगी।

यह हास्यास्पद है कि जो कांग्रेस और वामदल अक्टूबर 2017 में ‘पत्रकार’ विनोद वर्मा की गिरफ्तारी पर आँसू बहा रहे थे वही अब छत्तीसगढ़ सरकार में मुख्यमंत्री के ‘राजनीतिक सलाहकार’ बन जाने पर चुप्पी साध बैठे हैं। आए दिनों कांग्रेस और वामदल का नेक्सस कहता रहता है कि संघ के पास कोई बुद्धिजीवी नहीं है। क्या बुद्धिजीवी होने का ठेका सिर्फ इसी नेक्सस ने ले रखा है? एक पत्रकार जो आए दिन लोगों से कहते रहते हैं कि पत्रकारिता बदनाम हो गई है उन्होंने कांग्रेस शासित राज्यों में हुए ‘बदलाव’ पर मुँह खोलना तक उचित नहीं समझा। छात्रों के हित में शिक्षा पर सीरीज कर देने वाले पत्रकार महोदय अपने ही पेशे के छात्रों का भविष्य बर्बाद होते हुए चुपचाप देख रहे हैं। हो सकता है कि अपने गैंग के लोगों को ‘सेट’ होता देख उन्होंने यह चुप्पी साध ली हो।

बातें करना बहुत आसान है, ठीक है वैसे ही जैसे कभी इंदिरा गांधी गरीबी हटाने की बात करती थीं, आज उनका पोता पत्रकारिता की आजादी पर लेक्चर दे रहा है। अपने ही अखबार के उद्घाटन समारोह में राहुल गाँधी ने कहा था कि वह नेशनल हेराल्ड से निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद करते हैं। उनकी इस बात को कैसे सच मान लिया जाए जब उनके मुख्यमंत्रियों को कथित तौर पर दूसरी विचारधाराओं के प्राध्यापक और वीसी ही बुरे लग रहे हैं?

यह बहुत अच्छा होगा कि कांग्रेस शासित राज्य अपने ही अध्यक्ष की बात मान लें तो उन्हें इतनी फजीहत न झेलनी पड़े। जो कॉन्ग्रेस खुद को बुद्धजीवियों की खदान बताती है उससे यह उम्मीद तो नहीं ही है कि वह ओम थानवी सरीखे को किसी पत्रकारिता विश्वविद्यालय का वीसी सिर्फ इसलिए बना देगी कि वह भाजपा विरोधी हैं।

वैचारिक प्रतिबद्धता से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन इसके नाम पर योग्यता का पैमाना तय करना गलत है। अगर राहुल गाँधी वाकई चाहते हैं कि शिक्षा का स्तर सुधरे, पत्रकारिता आजाद हो उन्हें सबसे पहले अपने मुख्यमंत्रियों और नेताओं को निर्देश देना होगा कि वह ऐसे बदलाव न करें जो उनके अध्यक्ष को ही थूक कर चाटने पर मजबूर कर दे।

सौरव शेखर

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