Friday, January 22, 2021
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राहुल गाँधी: जो तेजस्वी और लालू के साथ बिहार को बदलना चाहता है!

जब रेल बजट में हर राज्य की राजधानी को पटना से डायरेक्ट ट्रेन से जोड़ दिया गया था? क्या उससे पटना में पर्यटन को बढ़ावा देना चाहता था लालू? या हर राज्य में ईंट ढोने से लेकर, रिक्शा खींचने, भट्टी में औज़ार बनाने, खेतों में फ़सल काटने और तमाम तरह के काम करने के लिए 'चीप' लेबर सप्लाय करने के रास्ते बना रहा था? याद आया कुछ?


शेक्सपीयर ने कहा था कि कुछ लोग जन्मजात महान होते है, कुछ लोग महान बनते हैं, और कुछ पर महानता थोप दी जाती है। इस लाइन का इस आर्टिकल से कोई लेना-देना नहीं है, ये बस यह बताने के लिए लिख दिया कि आपको लगे कि मैं कुछ गम्भीर बात करूँगा क्योंकि शेक्सपीयर से शुरू किया। जैसा कि राहुल गाँधी करते हैं, “मैं जब फ़्रान्स के राष्ट्रपति से मिला, तो उन्होंने कहा; मैं जब चीन के राजनयिकों से मिला तो उन्होंने कहा; मैं जब पर्रीकर जी से मिला तो उन्होंने कहा…”

आज नया कांड किया है बिहार में। पटना में एक रैली के दौरान, तेजस्वी और लालू को अपना साथी कहते हुए, राहुल ने बताया कि आप जाइए बिहार के किसी भी गाँव में, युवकों से पूछिए कि वो क्या करता है, तो बताएगा कि वो नौकरी ढूँढ रहा है। आगे गाँधी परिवार के फड़फड़ाते चिराग़ ने कहा कि बिहारी जहाँ जाता है, भगा दिया जाता है। 

पहली बात तो यह है कि किसी भी सेंसिबल व्यक्ति को लालू या लालूनंदन को साथी मानकर बिहार में उसकी बदहाली पर लेक्चर तो देना ही नहीं चाहिए, और दे भी रहे हैं तो ये तो मत ही कहिए कि लालू जी और तेजस्वी जी के साथ मिलकर आप बिहार की तस्वीर बदल देंगे। ऐसा कहना आपकी राजनैतिक डेस्पेरेशन से कहीं ज़्यादा आपकी मानसिक क्षमता पर सवाल उठाता है। 

ख़ैर, 2005 से पहले बिहार क्या था, और तब तक की सरकारों ने वहाँ लिक्विड गोल्ड की नदियाँ बहा दी थी, ये राहुल गाँधी को पता नहीं होगा क्योंकि तब तक वो विश्व के किसी कोने में चिलम, सॉरी, चिल कर रहे थे। उन्हें ये मालूम नहीं होगा कि जो हालत सुधरी है, जितनी ही सुधरी है, वो लालू और कॉन्ग्रेस के न होने से ही सुधरी है। उन्हें ये नहीं मालूम होगा कि वो नदियाँ लिक्विड गोल्ड की नहीं, पीत विष्ठा की थी जो कॉन्ग्रेस और लालू-राबड़ी काल की कुल कमाई है जिसको छाँटने कर साफ़ करने में बाद की सरकारों को बहुत समय लग चुका है।

किस गाँव में राहुल ने जाकर पूछ लिया? किस युवा से मिल लिए जाकर? कौन-सी रिसर्च एजेंसी ने यह डेटा दिया कि वो ‘किसी भी गाँव के युवा’ की बात कर पा रहे हैं? 2015-16 के डेटा के अनुसार भारत में प्रति 1000 लोगों में 50 लोग बेरोज़गार हैं, बिहार सारे राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को मिलाकर 60 के साथ, 15वें स्थान पर है।

लेकिन डेटा और रिसर्च तो राहुल गाँधी के वश की बात है भी नहीं, इसलिए नब्बे के दशक में रोज़गार के क्या हाल थे, इस पर मैं नहीं जा रहा। वैसे, अपहरण, रंगदारी, ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम आदि को भी ‘रोज़गार’ में मिला लिया जाए, तो भी वो दौर भूलने लायक ही था। जो अस्सी और नब्बे में जन्मे हैं, उन्हें पता है कि किस ख़ौफ़ में हमने जीवन जिया है।

उस दौर का बच्चा जानता है कि उसे अपने माँ-बाप से दूर, किसी प्राइवेट स्कूल के हॉस्टल में रहना होता था ताकि उसे बेहतर शिक्षा मिले, उसका अपहरण न हो, या जबरन कोई पकड़ कर शादी न कर दे। चाणक्य, चंद्रगुप्त, बुद्ध और दिनकर की धरती पर लालू भी पैदा होगा, ये अगर इन्हें पता होता तो अपने नाम और काम के लिए, ये लोग भी कई लाख बिहारियों की तरह शर्म से कहते, “मैं तो दिल्ली का हूँ।” 

‘बिहारी’ होना शर्मिंदगी की निशानी थी, और आज भी करोड़ों बिहारियों के लिए है जो बाहर रह रहा है। बिहारियों की इतनी दुर्गति हुई कॉन्ग्रेस और लालू के काल में कि, वो और ख़राब स्थिति में जा ही नहीं सकता था। वहाँ से ऊपर आने की ही संभावना थी। ‘बिहारी बहुत मेहनती होते हैं, पढ़ने में बहुत आगे’, ये भी आपने बहुत सुना होगा। लेकिन इसके पीछे की कहानी आप समझ नहीं सकते अगर आप बिहारी नहीं हैं।

मेहनत और पढ़ाई ही वो चीज़ें थीं जो हमारे वश में थीं। मेहनत के लिए पैसा नहीं लगता, और किरासन तेल के डिबिया, या लालटेन की रोशनी में सेकेंड हैंड किताबें पढ़कर हम बेहतर स्कूलों में जाते रहे, और अपनी राह बनाते रहे। वो इसलिए क्योंकि पढ़ाई के सिवाय कोई चारा नहीं था। और, चारा तो वैसे भी लालू जी ही खा गए। 

आज राहुल गाँधी गाँवों के युवा से पूछने की बात कहते हैं! बिहार में एक तय तरीके से सारे कारख़ानों को किसने बंद होने दिया? किस केन्द्र और राज्य सरकार की नीतियों ने यहाँ के स्कूलों की दुर्गति की? किस सरकार की नीति ने अपराध को इतना बढ़ावा दिया कि लोग भारत ही नहीं, अफ़्रीका तक जाकर बसने लगे? क्या कारण थे कि बिहार में कभी भी तरह का निवेश करने से लोग कतराते थे, और आज भी कतराते हैं?

रोजग़ार लाने के लिए जो माहौल चाहिए था, वो तो बर्बाद कर दिया तुमने और तुम्हारे साथियों ने! बची हुई कसर, बिहार को लेकर जो मानसिकता बनी कि ‘ट्रेन से जाओगे तो घड़ी चुराने के लिए लोग हाथ काट लेते हैं’, इस डर ने पूरी कर दी। कमाल की बात नहीं है कि अंडरवर्ल्ड के ख़ौफ़ से दहले मुंबई के लोग, बलात्कारों की राजधानी दिल्ली के लोग, राजनैतिक हत्याओं और अपराधों वाले उत्तर प्रदेश के लोग भी बिहार का नाम सुनकर वहाँ जाने से मना कर देते हैं? जबकि अपराधों के नज़रिए से देखें तो कोई भी जगह बिहार से कम तो नहीं ही है। फिर ये माहौल बनाने में किसका हाथ था कि लोग वहाँ फ़ैक्टरी लगाने की नहीं सोचते?

ये सब याद है कि नहीं जब रेल बजट में हर राज्य की राजधानी को पटना से डायरेक्ट ट्रेन से जोड़ दिया गया था? क्या उससे पटना में पर्यटन को बढ़ावा देना चाहता था लालू? या हर राज्य में ईंट ढोने से लेकर, रिक्शा खींचने, भट्टी में औज़ार बनाने, खेतों में फ़सल काटने और तमाम तरह के काम करने के लिए ‘चीप’ लेबर सप्लाय करने के रास्ते बना रहा था? याद आया कुछ?

शर्म कर लो राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव! तुम्हारी शक्लें और तुम्हारे मुँह से बिहार की भलाई की बात सुनता हूँ तो नीतिश के साथ चुनकर आते ही पहले दो महीने में 578 हत्याएँ याद आ जाती हैं। और फिर याद आती है दिल्ली के दोस्तों की बात कि ‘बिहार ने लालू को दोबारा कैसे चुन लिया, तुम लोग *** हो, और रहोगे’। शायद वो सही था।

जेल में बंद एक अपराधी को अपना सहयोगी मानकर बिहार की स्थिति सुधारने की बात सुनना देह में सिहरन ला देता है। लेकिन क्यों न हो, पब्लिक के पैसे से परिवार को पालने में जैसे राहुल के घरवाले, वैसे ही तेजस्वी, ऑटोमेटिक ट्यूनिंग है। इनकी फ़्रीक्वेंसी मैच करती है, दोनों ही परिवारों ने देश और राज्य को लूटा और बर्बाद किया है। इसलिए एक दूसरे के नेचुरल अलाय (प्राकृतिक सहयोगी) तो बनेंगे ही।

राहुल गाँधी, बिहार में बेरोज़गारी है, लेकिन तेजस्वी के बापू और आपका ख़ानदान उसके लिए ज़िम्मेदार है। नीतिश भी ज़िम्मेदार है, लेकिन नब्बे प्रतिशत जवाबदेही आपकी है। चोरों को दोबारा सत्ता देकर एक बार बिहार ने देख लिया है, शायद अगली बार वो ऐसी गलती नहीं करेंगे। 

क़ायदे से आपको ‘ये जो कैलाश है, वो एक पर्वत है’ पर ही रह जाना चाहिए था। आपको डिटॉक्सिफ़िकेशन की ज़रूरत है क्योंकि जिस माहौल में आपकी परवरिश हुई है, उस माहौल में नैसर्गिक रूप से आपको चोरों की संगति पसंद आएगी। नाना के जीप से लेकर बाप के टैंक और माँ के पता नहीं किस-किस घोटाले तक, करप्शन तो डीएनए लेवल तक उतर चुका है। आपको पूरे परिवार, अपने घर और हो सके तो देश से दूर रहना चाहिए क्योंकि जब देश तबाह हो रहा था, तब आप बच्चे थे। लूट के दूसरे दौर में सत्ता आपके माताजी के पास थी। ये बात और है कि आप देश को लूटने पर अपना भी पारिवारिक हक़ जताना चाहते हों!

आप क्यूट आदमी हैं, आपको दोनों गालों में डिम्पल पड़ते हैं, आप कहाँ ये राजनीति और बिहार के बेरोज़गार युवाओं को राह दिखाने आ गए! पहले अपने लिए कोई ढंग का काम देख लीजिए। क्योंकि आपके भी घर में घुसकर अगर मैं पूछ लूँ कि ये चिरयुवा क्या करता है, तो आपकी माताजी ‘मेला छोना बाबू, अभी तो लैली में एछपीछ देता है’ से ज़्यादा नहीं कह पाएँगी। और हाँ, जैसे आपने कहा न कि मोदी के गुजरात में बिहारियों को भगा दिया जाता है, वैसे ही शायद आपकी माताजी ये न बोल दें, “मोदी ने भारत से मेरे युवा बेटे का रोज़गार छीन लिया है, और उसे भगाना चाहता है।”

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

 

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