परमादरणीय रवीश कुमार! अपना ‘कारवाँ’ रोक दीजिए, आपको हिंदी पत्रकारिता का वास्ता

हालात ये हैं कि शायद दूसरों को टेलिविज़न कम देखने की सलाह देने वाले रविश कुमार खुद टेलिविज़न पर जासूसी और ‘साज़िशों’ से भरे धारावाहिक देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं।

पिछले साल ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह पर झूठे आरोप लगाने के बाद जय शाह द्वारा दायर मानहानि याचिका पर न्यायलय की फटकार खा चुके ‘द वायर’ और जस्टिस लोया की मौत को संदिग्ध मानने की आशंका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नकारने के बावज़ूद उसे ‘साज़िश’ ठहराने के अथक प्रयास करने वाली ‘कारवाँ’ मैगज़ीन का हवाला देकर सत्यान्वेषी पत्रकार, यानि रवीश कुमार आदतानुसार एक बार फिर जनता के सामने सनसनी बनकर आए हैं।

इस बार ‘The D-Companies’ शीर्षक के साथ ‘कारवाँ’ ने  NSA अजीत डोभाल के बेटे पर आरोप लगाते हुए लिखा है, “NSA अजीत डोभाल के बेटे विवेक पर बड़ा खुलासा, कालेधन का कारोबार करने वाले देश में बनाई कंपनी”।

रवीश कुमार ने इस पत्रिका का ज़िक्र देते हुए अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा है, “डी-कंपनी का अभी तक दाऊद का गैंग ही होता था। भारत में एक और डी कंपनी आ गई है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और उनके बेटे विवेक और शौर्य के कारनामों को उजागर करने वाली ‘कारवाँ’ पत्रिका की रिपोर्ट में यही शीर्षक दिया गया है। साल दो साल पहले हिन्दी के चैनल दाऊद को भारत लाने के कई प्रोपेगैंडा प्रोग्राम करते थे। उसमें डोभाल को नायक की तरह पेश किया जाता था। किसने सोचा होगा कि 2019 की जनवरी में जज लोया की मौत पर 27 रिपोर्ट छापने वाली कैरवां पत्रिका डोभाल को डी-कंपनी का तमगा दे देगी।”

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‘कारवाँ’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अजीत डोभाल के बेटे विवेक डोभाल की कंपनी में काम करने वाले कई अधिकारी शौर्य डोभाल की कंपनी में काम करते हैं। पत्रिका ने लिखा है कि इसका मतलब यह हुआ है कि कोई बहुत बड़ा फाइनेंशियल नेटवर्क चल रहा है और यह भी दावा किया गया है कि यह हेरफ़ेर नोटबंदी के बाद की गई है।

रवीश कुमार ने लिखा है, “कौशल श्रॉफ नाम के एक खोजी पत्रकार ने अमरीका, इंग्लैंड, सिंगापुर और केमैन आइलैंड से दस्तावेज़ जुटा कर डोभाल के बेटों की कंपनी का ख़ुलासा किया है। कारवाँ पत्रिका के अनुसार, “ये कंपनियाँ ‘हेज फंड’ और ‘ऑफशोर’ के दायरे में आती हैं। ‘टैक्स हेवन’ वाली जगहों में कंपनी खोलने का मतलब ही है कि संदिग्धता का प्रश्न आ जाता है और नैतिकता का भी।”

हालाँकि, इस बात की प्रामाणिकता पर अभी प्रश्न चिन्ह ही हैं। क्योंकि कारवाँ पत्रिका का सनसनीखेज ख़ुलासों का इतिहास अगर देखा जाए तो शायद ही उनका कोई दावा और आरोप कभी सच साबित हुआ हो। बताना चाहूँगा कि पिछली तमाम सनसनीखेज़ ख़बरों के अनुसार ही ‘कारवाँ’ पत्रिका का यह भी अभी तक एक नया सनसनी भरा शीर्षक मात्र ही है, लेकिन ख़ास बात यह है कि ‘द वायर‘ जैसे प्रोपैगेंडा-परस्त मीडिया गिरोहों और रवीश कुमार ने इसे हाथों-हाथ लेकर न्यायाधीश होने की अपनी ज़िम्मेदारी पूरी कर ली है।

कारवाँ पत्रिका के इस आरोप का ख़ुलासा होना अभी बाकी है। इस पत्रिका और इसके अन्य गिरोह का पिछला रिकॉर्ड देखकर ही इनकी विश्वसनीयता का मूल्यांकन किया जा सकता है और उनकी विश्वसनीयता के चलते यह अभी ख़बरों के बाज़ार में एक अफ़वाह से ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन बावज़ूद इसके, हिंदी पत्रकारिता के एक बड़े स्तम्भ (खोखले ही सही) माने जाने वाले रवीश कुमार की दिलचस्पी इस ख़बर में देखी गई है और उन्होंने इसे बहुत तत्परता से लिया भी है और अब इसके प्रचार में भी लगे हैं।

अपने पिछले तमाम एजेंडों में मोदी सरकार और उससे सम्बंधित पदाधिकारियों को नीचा दिखाने और अपमानित करने के तमाम नाकाम प्रयासों के बाद रवीश कुमार एक बार फिर से एक काल्पनिक वाकया लेकर जनता के सामने आए हैं। हर बार की तरह ही इस बार भी NDTV उनके लगाए गए आरोपों को उनके व्यक्तिगत मत होने का एक ‘डिस्क्लैमर’ अंत में लगा देता है। जिसका सीधा सा मतलब है कि यह एक और ‘ट्रायल बेस्ड’ एजेंडा है जिसका उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ ऐसी अल्पकालीन क्षति पहुंचाना है जिसके दूरगामी नतीज़े निकल सकें। यानि, साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।

रवीश के लेख के साथ NDTV वेबसाईट द्वारा दी गई सूचना

गौर करने की बात है कि अगर महाशय के पिछले 4 साल के रिकॉर्ड में देखें, तो रवीश कुमार ने ‘द वायर’, ‘स्क्रॉल’, ‘ऑल्ट’ और ‘कारवाँ’ जैसे तमाम फ़र्ज़ी ख़बरों द्वारा अपना नेटवर्क बनाने वाले मीडिया गिरोहों के कंधे पर बन्दूक रखकर सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा चलाने की भरपूर कोशिश में लगे हुए हैं, फिर चाहे उनके बाग़ों में बहार का प्रश्न हो या फिर हिंदी पत्रकारिता को ज़लील करने के उद्देश्य से लिखे गए उनके कुंठा से भरे हुए कटाक्ष।

एक ओर जहाँ रवीश कुमार ने ही पत्रकारिता में ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘गोदी मीडिया’ जैसे नामकरण कर लोगों को TV कम देखने और ज्यादा पढ़ने के लिए प्रेरित किया, वहीं दूसरी ओर सच्चाई यह रही है कि उनके पिछले तमाम लम्बे-लम्बे लेख और ब्लॉग, जो कि राजनीतिक विरोधाभासों के कारण पढ़ने और सुनने में अच्छे (सत्संगी प्रवृत्ति के) भी महसूस होते हैं, लिखे और प्रशंसकों ने उन्हें हाथों-हाथ खूब ‘व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी’ से लेकर सोशल मीडिया पर प्रचारित भी किया, एक तरफ से झूठे और प्रोपैगेंडा मात्र साबित होते आए हैं।

रवीश कुमार द्वारा चलाए गए पिछले कुछ किस्सों में जस्टिस लोया मर्डर केस ने लोगों का सबसे अधिक ध्यान बटोरा, जिस पर कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही फ़ैसला भी सुना चुका था। लेकिन अपनी ‘खोजी’ और सत्यान्वेषी प्रवृति से मजबूर रवीश कुमार ने उसमें भी नए मोड़ खोजने के भरसक प्रयास किए।

जय शाह मामला:

इसके बाद रवीश कुमार भाजपा पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह को लेकर न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’  के माध्यम से आरोप लगाते हैं कि उन्होंने ज़रूरत से ज्यादा धन कमाया है। जय अमित शाह ने संपत्ति की स्टोरी करने वाली ‘द वायर’ वेबसाइट के संपादक समेत 7 लोगों के खिलाफ अहमदाबाद कोर्ट में आपराधिक मानहानि का केस दायर कर दिया था।

जय शाह ने बयान देते हुए कहा था, “लोगों के मन में ऐसी छवि बनाने की कोशिश की गई कि मेरे व्यवसाय में सफलता मेरे पिता अमित शाह की राजनीतिक हैसियत की वजह से है। मेरा व्यवसाय पूरी तरह से कानून का पालन करता है, जो कि मेरे टैक्स रिकॉर्ड और बैंक ट्रांजेक्शन से पता चलता है।”

उस वक़्त सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ की 3 सदस्यीय खंडपीठ ने इस याचिका पर टिप्पणी की थी कि मीडिया को और अधिक जिम्मेदार होना चाहिए और वह किसी भी व्यक्ति के बारे में जो मन में आए नहीं लिख सकता है। प्रधान न्यायाधीश ने बार-बार यह दोहराया कि वह पेश मामले के संदर्भ में टिप्पणियाँ नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई बार तो पत्रकार इस तरह से लिखते हैं, जो न्यायालय की अवमानना होता है।

तत्कालीन CJI दीपक मिश्रा ने कहा था, “मैंने कई बार बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में कहा है। हम मीडिया पर अंकुश लगाने नहीं जा रहे। मीडिया पर अंकुश लगाने का सवाल ही नहीं उठता, परन्तु प्रेस को और अधिक ज़िम्मेदार होना चाहिए।”

मानहानि मामले में न्यायलय ने न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’ की मानहानि के ख़िलाफ़ याचिका इस आधार पर निरस्त कर दी थी कि ‘गोल्डन टच ऑफ़ जय अमित शाह‘ शीर्षक से प्रकाशित लेख वास्तव में ‘मानहानिकारक’ है और निचली अदालत को इस मामले में आगे कार्यवाही करनी चाहिए।

जस्टिस लोया प्रकरण:

CBI के स्पेशल जज बीएच लोया की मौत की जाँच कराने की माँग करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि इस मामले में कोई जाँच नहीं होगी, केस में कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि इस मामले के ज़रिए न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। साथ ही, जस्टिस लोया के बेटे अनुज ने मीडिया के सामने आकर स्पष्ट कहा था कि पिता की मौत को लेकर उन्हें किसी तरह का संदेह नहीं है और उनके परिवार का किसी पर आरोप भी नहीं है। अनुज ने ये भी कहा था कि वो इसे लेकर आगे किसी तरह की जाँच नहीं चाहते हैं।

फिर भी, सत्यान्वेषी पत्रकार को इसमें अपना व्यक्तिगत दृष्टिकोण डालने में कोई समस्या नहीं हुई। रवीश कुमार ने जज लोया के केस में हिंदी पत्रकारिता पर अपनी कुंठा निकालते हुए कहा कि हिंदी के अख़बार लोगों को कूड़ा परोस रहे हैं और उन्हें जस्टिस लोया की मौत पर ‘कारवाँ’ की रिपोर्ट पढ़नी चाहिए। रवीश कुमार ने कहा था, “कारवाँ के सच्चे और निडर पत्रकार कैसे जान पर खेल कर सच निकालते हैं, जज लोया की मौत की कहानी सुनकर आपका दिल दहल जाएगा।”

अब, जबकि जस्टिस लोया की मौत में किसी भी साज़िश को न्यायालय नकार चुका है, तो क्या आप स्पष्टीकरण देते हुए स्वीकार करेंगे कि हिंदी पत्रकारिता में अगर कोई कूड़ा परोस रहा है, तो वो कोई और नहीं बल्कि स्वयं आप हैं?

देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करते हुए जब आपके चैनल NDTV पर पठानकोट हमलों की कवरेज़ के दौरान संवेदनशील जानकारियाँ देने के आरोप में एक दिन का प्रतिबंध लगाया जाता है, तब आप अपनी ‘लप्रेक’ शैली का प्रयोग कर सवाल उठाते हैं कि ‘क्या बाग़ों में बहार है?’ आप इसे अघोषित आपातकाल ठहराते हैं और कहते हैं कि यह मीडिया की हत्या है।

क्या आदतानुसार बरगलाने वाले तथ्यों को लाकर लगातार ‘फ़ुट इन माउथ’ जैसे ज़ुमलों का शिकार होने के बावज़ूद रवीश कुमार को यह नहीं लगता है कि आज वो ख़ुद एक चलती-फिरती व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी बन चुके हैं? आज रवीश कुमार गोदी मीडिया के साथ-साथ ‘प्रोपैगेंडाबाज़’ और स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए आतंकवाद मात्र बनकर रह गए हैं। हालात ये हैं कि शायद दूसरों को टेलिविज़न कम देखने की सलाह देने वाले रविश कुमार खुद टेलिविज़न पर जासूसी और ‘साज़िशों’ से भरे धारावाहिक देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं।

JNU प्रकरण के बाद आपने किस तरह अपने प्राइम टाइम और ब्लॉग के माध्यम से दोनों भटके हुए युवाओं को सान्निध्य और सराहना दी, यह भी छुपा हुआ नहीं है। फिर भी आप इस बात पर आए दिन माथा पीटते हुए देखे जाते हैं कि TRP नहीं आ रही है और मोदी जी लोगों की छतों पर जाकर आपके चैनल वाली केबल काट रहे हैं।

आप इसके बाद कहते हैं कि छोड़िए इस हिंदी मीडिया को यह सब गोदी मीडिया है, ‘कारवाँ’ पर जाकर पढ़िए कि अमित शाह के लड़के ने कितना ‘माल’ बनाया है। फिर आपकी इस सनसनी को भी न्यायालय नकार देते हैं।

अब आप एक बार फिरसे उसी ‘कारवाँ’ मैगज़ीन का हवाला देकर NSA अजीत डोभाल के बेटे पर आरोप लगा रहे हैं और इस देश के रिसोर्सेज़ को एक बार फिर से दिशा भटकने पर मजबूर किया है। आप हाईलाईट करना चाह रहे हैं कि विवेक डोभाल इस देश के नागरिक नहीं हैं, लेकिन, अगर विवेक डोभाल भारत देश के नागरिक ही नहीं हैं तो फिर आप क्यों विदेशियों के मामले में सिर खपाते हैं? आपको तो जा कर ब्रिटेन के न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए।

रवीश जी! यह किस प्रकार का दोमुँहापन है, जिसमें आप कभी सुप्रीम कोर्ट और संविधान को माई-बाप बताते हैं और जब वही न्यायालय आपके तमाम सनसनी की चासनी में डूबे ‘प्रोपैगेंडों’ को नकारते हुए आपके मुताबिक़ निर्णय नहीं सुनाते हैं, तब आप तमाम संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर देते हैं, और संस्थाओं के बिके हुए होने के साथ ही ‘लोकतंत्र की हत्या’ जैसे मुहावरे इजाद करते हैं।

यही न्यायालय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों के लिए क्लीन चिट देते हैं, जस्टिस लोया की मृत्यु पर निर्णय देते हैं और UPA सरकार में हुए घोटालों पर भी निर्णय देते हैं। लेकिन आप केवल अपने पसंदीदा निर्णयों पर ही नाराज़गी ज़ाहिर नहीं करते हैं, जबकि और निर्णयों पर आप बवाल खड़ा कर देते हैं।

आप तमाशा खड़ा कर देते हैं और दूसरे पत्रकारों को बेझिझक ‘दरबारी मीडिया’ की संज्ञा दे देते हैं। क्या यह सही समय नहीं आ गया है कि आप अपनी ‘सत्यान्वेषी जिज्ञासाओं’ को एकांत में हिमालय पर जा कर शांत करें और देश की संस्थाओं का समय ख़राब ना करें? आपको मानना चाहिए कि आपके ऊपर उन्माद सवार हो गया है।

स्वयं को ही निष्पक्ष और सही ठहराने का यह उन्माद देश-हित और ख़ासकर पत्रकारिता के लिए ज़हरीला साबित हो रहा है। लोगों ने ख़बरों पर विश्वास करना बंद कर दिया है और दर्शक इस उन्माद के कारण अफ़वाह और सनसनी-परस्त होता जा रहा है।

आप कूड़ा पेश करते हैं, लोगों और संस्थाओं का समय बर्बाद करते हैं, मुद्दों से भटकाते हैं, कोर्ट में हारते हैं। आपको चिंतन की आवश्यकता है, सत्य की खोज के लिए देश में कई और संस्थाएं हैं और वो अपना काम बहुत बेहतर तरीके से कर रहे हैं।

आपको पढ़ते ही राँझना फ़िल्म का एक डायलॉग दिमाग में गूँजता है, “साँप के फन से **** मत खुजाइये, वर्ना सैप्टिक हो जाएगा”। हो सके तो अपने इस प्रोपैगंडा के कारवाँ को रोक दीजिए, क्या पता बाग़ों में बहार आ जाए।

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