डु प्लेसी जी, जिस IPL को आप कोस रहे हैं, उसी से रशीद खान और नबी स्टार बन रहे हैं

इसी विश्व कप में एक भी मैच न जीतने वाली अफगानिस्तान भी है, जो शायद सबसे ज़्यादा दिल जीत रही है- क्योंकि वह लड़ती हुई दिख रही है, संघर्ष करती दिख रही है। यहीं इसके उलट डु प्लेसी के खिलाड़ी जीतने के लिए नहीं, खेलने के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं।

एक कहावत है, “धोबी से पार न पाए, गदहे के कान मरोड़े”। यह पूरी तरह से चरितार्थ होता है विश्व कप से बाहर होने के मुहाने पर खड़ी दक्षिण अफ़्रीकी क्रिकेट टीम के कप्तान फाफ डु प्लेसी पर, जो अपनी टीम के खराब प्रदर्शन का ठीकरा आईपीएल के सर फोड़ना चाहते हैं। पाकिस्तान के हाथों सात में से अपना पाँचवाँ मैच हारने के बाद दक्षिण अफ़्रीकी कप्तान ने कहा कि आईपीएल के चलते उनके खिलाड़ी, और खासकर उनके मुख्य गेंदबाज कैगिसो रबादा को ठीक से आराम करने का मौका नहीं मिला और इसीलिए रबादा की गेंदबाजी सुस्त रही।

थके ज़रूर हैं आपके खिलाड़ी, लेकिन आईपीएल से नहीं, ‘बोझ’ से

यह पूरी तरह सच है कि रबादा ही नहीं, मौजूदा विश्व कप में सबसे थके, सुस्त खिलाड़ियों की पूरी जमात दक्षिण अफ्रीकियों की ही है। लेकिन इसके लिए किस हद तक आईपीएल दोषी है, और कितना दोष इस तथ्य का है कि आधी से अधिक दक्षिण अफ़्रीकी टीम ही ‘नौसिखिया’ है, और बेंच स्ट्रेंथ बनाने पर दक्षिण अफ्रीका के खेल प्रशासकों ने ध्यान ही नहीं दिया? पिछले विश्व कप के पहले जैक्स कैलिस के रिटायरमेंट के बाद से ही बड़े खिलाड़ियों की टीम से विदाई एक-एक कर हो रही है, और उनकी जगह लेने के लिए नए खिलाड़ी नहीं आए।

अगर पिछले विश्व कप से ही तुलना करें तो इस बार कई बड़े दक्षिण अफ़्रीकी नाम टीम का हिस्सा नहीं हैं- मोर्ने मोर्केल, डेल स्टेन, एबी डिविलियर्स, वेन पर्नेल, वर्नोन फिलेंडर। यह सब केवल स्टार भर ही नहीं थे- इन बड़े खिलाड़ियों की जमात के होने का मतलब था कि अगर एक कोई किसी दिन न भी चले तो उस दिन कोई दूसरा तो है प्रदर्शन करने के लिए। इस बार दक्षिण अफ्रीका के साथ ऐसा नहीं है। इस बार अगर रबादा मान लिया जाए कि आईपीएल खेल-खेल कर थक गए, तो उनकी जगह कोई नहीं था उनके स्तर का प्रदर्शन कर सकने वाला। और यह बेंच स्ट्रेंथ बनाना, यह एक ही खिलाड़ी पर से निर्भरता कम करना, वेन पर्नेल और वर्नोन फिलेंडर जैसे खिलाड़ियों को विश्व कप से बाहर करते समय यह जिम्मेदारी लेना कि जिसे बदले में ला रहे हैं, वह भी गच्चा न दे जाए- यह सब रबादा की नहीं, बोर्ड की, चयनकर्ताओं की जिम्मेदारी होती है।

इसी आईपीएल की पैदाइश मुहम्मद नबी और रशीद खान भी हैं

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इसी विश्व कप में एक भी मैच न जीतने वाली अफगानिस्तान भी है, जो शायद सबसे ज़्यादा दिल जीत रही है- क्योंकि वह लड़ती हुई दिख रही है, संघर्ष करती दिख रही है। यहीं इसके उलट डु प्लेसी के खिलाड़ी जीतने के लिए नहीं, खेलने के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं। और इसी आईपीएल में सबका ध्यान खींचने वाले मुहम्मद नबी और रशीद खान अपनी राष्ट्रीय टीमों के लिए भी वैसा ही प्रदर्शन कर रहे हैं। डु प्लेसी को सोचना चाहिए ऐसा क्यों है।

संक्रमण काल के लिए सही तैयारी न करना है असली वजह

दक्षिण अफ्रीका की पतली हालत की असली वजह है संक्रमण काल, जो हर टीम के साथ लगभग एक-डेढ़ दशक बाद आता रहता है। एक साथ कई सारे बड़े खिलाड़ी या तो ढलान पर होते हैं, या रिटायर होने लगते हैं, और युवाओं की फ़ौज उनकी जगह लेने के लिए तुरंत-तुरंत तैयार नहीं होती। ऐसे में चयनकर्ताओं और बोर्ड की जिम्मेदारी होती है कि बड़े खिलाड़ियों के साथ बैठकर उनके भविष्य पर बात करें, उनके लिए बाकायदा ‘रिटायरमेंट प्लान’ तैयार करें, और उनके कैरियर के अंतिम दौर में उन्हें अधर में छोड़ने या टीम से पूरी तरह बाहर करने की बजाय उस दौर को थोड़ा लम्बा खींचने की कोशिश करें, ताकि वह खिलाड़ी भले ही पूरे समय उपलब्ध न हो लेकिन अहम मौकों पर जब तक उसका विकल्प नहीं मिलता, वह रहे।

यही भारत में सचिन, द्रविड़ जैसे खिलाड़ियों के साथ किया गया। उन्हें अपनी मर्जी की महत्वपूर्ण सीरीजों में खेलने की छूट थी, न कि ‘या तो हर मैच के लिए उपलब्ध रहो, या निकल जाओ’ का दबाव। सहवाग को सर्वश्रेष्ठ फॉर्म में न होने के बावजूद 2011 के अहम विश्व कप में रखा गया, और टीम की खिताबी जीत में उनका योगदान रहा। और यह केवल भारत नहीं, कमोबेश हर टीम ऐसा ही करती है। इसका इकलौता अपवाद ऑस्ट्रेलिया है, जो बड़े-से-बड़े कप्तान और खिलाड़ी को उसका चरम निकल जाने के बाद नहीं बर्दाश्त करता। लेकिन इसके लिए उसके पास योजना होती है, बेंच स्ट्रेंथ होती है। इसीलिए ऑस्ट्रेलिया के ‘स्वर्णिम प्रतिमान’ (गिलक्रिस्ट, वॉ बंधु, पोंटिंग, शेन वॉर्न, मैक्ग्रा) आदि के बिना भी, ऑस्ट्रेलिया के खुद के मानक पर कमज़ोर होते हुए भी माइकल क्लार्क की टीम विश्व कप जीत ले गई।

अब दक्षिण अफ्रीका के पास ऑस्ट्रेलिया जैसी बेंच स्ट्रेंथ भी नहीं है, और जब टीम की ख़राब हालत का पूर्वानुमान कर रिटायर हो चुके एबी ने विश्व कप के लिए लौटने का प्रस्ताव दिया तो उसे भी प्रबंधन ने ठुकरा दिया। वह भी तब जबकि कप्तान डु प्लेसी और कोच ओटिस गिब्सन एबी की वापसी चाहते थे। दुधारू गाय की लात खाई जाती है, अपने भूखे होने पर उसके सींग की नुक्ताचीनी नहीं की जाती। गांगुली, जवागल श्रीनाथ को रिटायरमेंट से निकाल कर ले आए और 2003 विश्व कप में वह भारत को फाइनल तक पहुँचाने वाले सबसे अहम खिलाड़ियों में एक साबित हुए। आईपीएल को दोष देना असली समस्याओं को नकारना होगा।

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