लैंगिक समानता हिन्दू जीवन-दर्शन का अभिन्न अंग: अन्य धर्मों-सभ्यताओं से एक तुलनात्मक अध्ययन

क्या आपको पता है जब ईसाई धर्म में एक ज्ञानी महिला ने पुरुषों के बराबर खड़े होने की हिमाक़त की तो उसके साथ क्या किया गया?

कोई भी धर्म, सम्प्रदाय, संस्था, राज्य और समाज कितना उदार है, इसे इस पैमाने पर मापा जा सकता है कि वहाँ महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार होता है। नारी को शक्ति के रूप में देखने वाली धरती और लैंगिक समानता का सन्देश देने वाले हिन्दू धर्म पर यह आरोप लगता रहा है कि यहाँ महिलाओं के साथ सही व्यवहार नहीं होता है। पश्चिमी सभ्यता के उदारवाद की दुहाई देते नहीं थकने वाले भारतीय समाज, हिन्दू जीवन-दर्शन और पुरातन भारतीय संस्कृति को इसी आधार पर हीन दृष्टि से देखते रहे हैं। लेकिन क्या ये सच है? क्या सच में क्रिश्चियनिटी, इस्लाम इत्यादि में महिलाओं को वो जगह मिली है, जिससे हिन्दू समाज ने आपने आपको वंचित रखा है? इसके लिए कुछ घटनाओं को देखना जरूरी है, तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।

क्या एक महिला का महामंडलेश्वर बनाना बदलाव है?

इसकी शुरुआत कल या 15 जनवरी 2019 की ख़बर के साथ करते हैं। प्रयागराज में कुम्भ की शुरुआत हो गई है और सभी अखाड़े गंगा-यमुना-सरस्वती संगम में डुबकी लगा चुके हैं। इसी बीच श्री पंचायती तपोनिधि निरंजनी अखाड़े में केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री निरंजन ज्योति का पट्टाभिषेक किया गया। अर्थात एक महिला महामंडलेश्वर के नेतृत्व में निरंजनी अखाड़े ने कुम्भ में स्नान किया। क्या यह एक सुखद बदलाव है? क्या यह एक ऐसा बदलाव है, जिसकी कामना कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें कर रही थीं? अगर हम कहें कि नहीं, ऐसा नहीं है तो शायद आप चौंक जाएँ लेकिन हमारे पास इसके लिए तर्क हैं, सबूत है, ऐतिहासिक विवरण है और झूठ बोल कर भारतीय संस्कृति को बदनाम करने वालों के पोल खोलने के लिए और भी बहुत कुछ है।

साध्वी निरंजन ज्योति को निरंजनी अखाड़ा का महामंडलेश्वर नियुक्त किया गया

अब बात महिला महामंडलेश्वर के इतिहास की! केंद्रीय मंत्री निरंजन ज्योति इस अखाड़े की महामंडलेश्वर बनने वाली पहली महिला नहीं हैं। इस से पहले 10 महिलाएँ इस अखाड़े का नेतृत्व कर चुकीं हैं। महिलाओं द्वारा धार्मिक कार्यों, सार्वजनिक त्योहारों, पारिवारिक अनुष्ठानों में अग्रणी भूमिका निभाने, उनका संचालन करने का ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं मिलता है। अब इसकी तुलना ब्रिटेन जैसी मॉडर्न सोच वाली जगह पर स्थित एक मस्ज़िद से करते हैं। ऐसा करना इसीलिए जरूरी है क्योंकि जब तक हम दो अलग-अलग संस्कृतियों और स्थानों की तुलना नहीं करेंगे, तब तक हमें यह पता नहीं चल पाएगा कि कौन बेहतर है।

क्या हालात हैं मॉडर्न सोच वाले ब्रिटेन में?

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शेलीना जनमोहम्मद ब्रिटेन की लेखिका हैं। दिसंबर 2018 में अंतरराष्ट्रीय मीडिया पोर्टल ‘द नेशनल’ के लिए लिखे लेख में उन्होंने एक अनुभव साझा किया है। जब वो ब्रिटिश यूनिवर्सिटी टाउन में नई-नई आई थीं, तभी उनके साथ एक ऐसा अनुभव हुआ, जिससे उन्हें इस्लाम में इक्कीसवीं सदी में भी चली आ रही रूढ़िवादी मानसिकता का पता चला। नमाज़ के समय पर वह पास के एक छोटे से मस्ज़िद में पहुँचीं। ब्रिटेन में कई घरों को छोटे-छोटे मस्ज़िदों में परिवर्तित कर दिया गया है, ये भी उनमें से ही एक था।

जब शेलीना ने मस्ज़िद के बंद दरवाज़े पर दस्तक़ दी तो एक शख़्स बाहर निकला, जिससे शेलीना ने अंदर नमाज़ अदा करने की इजाज़त मांगी।

“हमारे पास नमाज़ की जगह नहीं है।”- उस शख्स ने रूखेपन से जवाब दिया। जबकि शेलीना दरवाज़े से अंदर साफ़-साफ़ देख रही थीं कि वहाँ अच्छी-ख़ासी जगह खाली पड़ी है। उन्होंने उससे बस थोड़ी देर के लिए अंदर आने की अनुमति माँगी और खाली जगह की ओर इशारा करते हुए कहा कि मैं वहाँ पर नमाज़ अदा कर लूँगी। उसके बाद उस शख़्स ने ‘ना’ की मुद्रा में सर हिलाते हुए दरवाज़े को बंद कर लिया। इस लेख में उन्होंने कहा है कि ब्रिटेन में 25% से ज्यादा मस्ज़िदों में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है।

अब तथाकथित मॉडर्न सोच के स्वयंभू वकीलों से ये पूछा जाना चाहिए कि भारतीय संस्कृति और हिन्दूत्व-दर्शन में जिस लैंगिक असमानता की वो बात करते हैं, वो किस जगह पाई जाती है। सच तो यह है कि उनके पास अपने तर्क़ों को आधार देने के लिए कोई सबूत ही नहीं है। भारतीय पूजा-पाठ, अनुष्ठानों और धार्मिक त्योहारों में महिलाओं की भूमिका समझने के लिए अब हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा।

भारतीय परंपरा में महिला संतों का रहा है पुराना इतिहास

हिन्दू धर्म में प्रकृति यानी कि समस्त मानवता की पोषक को स्त्री रूप में देखा गया है। देवी दुर्गा सहित कई देवियाँ हैं, जो स्त्री हैं लेकिन हम यहाँ उनकी बात नहीं करेंगे क्योंकि इस पर काफ़ी कुछ पढ़ा जा चुका है। यहाँ हम उन महिलाओं की बात करेंगे, जिन्होंने अपने हाथ में धार्मिक कार्यों की बागडोर संभाली और उसे बखूबी निभा कर अपनी नेतृत्व क्षमता से इतिहास में अमर हो गईं। आज 21वीं सदी में भी जब चर्च में महिलाओं को बिशप बनाने की बहस चल रही है, हम हजारों साल पहले जा कर देखेंगे कि कैसे भारत में महिलाएँ सदियों से इस क्षेत्र में हावी रही हैं।

भारत में बारहवीं सदी में जब बहुत सारे कवि व संत कालजयी रचनाएँ लिख कर भक्ति युग को नई दिशा दे रहे थे, तब महादेवी नाम की एक महिला संत हुईं, जो तुलनात्मक रूप से अन्य संतों के मुकाबले कम कविताएँ लिख कर भी उनसे ज्यादा प्रसिद्ध हुईं। इन्हें लिंगायत समुदाय में गुरु बसवन्ना के साथ रखा गया और ‘अक्का’ की उपाधि दी गई। अक्का का अर्थ होता है ‘बड़ी बहन’।

अगर पुरातन भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन करें तो पता चलता है कि वेदों के रचयिता सिर्फ़ पुरुष ऋषि-मुनि ही नहीं, बल्कि महिलाएँ भी रही थीं। क्या किसी अन्य धर्म या संस्कृति में कहीं भी ऐसा देखने को मिला है, जहाँ उनकी प्राथमिक पुस्तक लिखने में किसी महिला का योगदान रहा हो? अगर हम बाइबिल और क़ुरानशरीफ़ की बात करें तो उन दोनों पवित्र पुस्तकों को लिखने में किसी महिला का योगदान नहीं रहा है। जबकि दुनिया की सबसे पुरानी पुस्तकों में से एक- ऋग्वेद में कई श्लोक महिलाओं द्वारा भी लिखे गए हैं।

ऋग्वेद के दस ऐसे श्लोक हैं, जिन्हे महिला मुनि मैत्रयी द्वारा लिखा गया है। इसी तरह वाचकन्वी गार्गी भी ऐसी महिला संत हुईं हैं, जिन्होंने ऋग्वेद का एक भाग लिखा। ऋग्वेद के कुछ अंश लिखने में लोपमुद्रा का भी योगदान माना जाता है। जब हमारी सनातन परम्परा की प्रथम पुस्तक को लिखने में ही महिलाओं का योगदान रहा है- तो किस मुँह से इस पर सवाल उठाए जाते हैं कि हिन्दू धर्म के कर्ता-धर्ताओं में महिलाओं की भागीदारी नहीं रही है। विश्व में कहीं भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता, जहाँ महिलाओं ने धर्म की दशा एवं दिशा तय करने में पुरुषों के साथ ऐसे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया हो।

ईसाई पंथ में जब एक महिला उभर कर सामने आईं

ईसाई पंथ और सम्प्रदाय में महिलाओं के उभरने के बाद उनका क्या हश्र किया जाता है, उसका एक उदाहरण हमें हिपेशिया के रूप में देखने को मिलता है। अलेक्सेंड्रिया हिपेशिया एक ऐसा नाम है- जिसकी कहानी सुन कर आज अनेकों चर्च में ननों के साथ हो रहे निर्मम व्यवहार भी फीकी लगनी लगेगी। गणित, दर्शन सहित कई विषयों की विद्वान रही हिपेशिया चौथी-पाँचवी सदी में पूर्वी रोमन साम्राज्य के मिस्र में एक जानी-पहचानी नाम थीं। उनके आधुनिक विचार और उनका ज्ञान क्रिश्चियनिटी के स्वयंभू पंडितों को काटने दौड़ता था।

फिर एक दिन ऐसा आया, जब क्रूरता अपनी सारी हदें पार कर गई। पीटर नाम के लेक्टर ने कुछ लोगों के साथ उसका अपहरण कर लिया। उसके बाद उसे एक धार्मिक स्थल में लाए गए, जहाँ उन्होंने ऑस्ट्राका (मिट्टी के कड़े बर्तनों को तोड़ कर बनाया गया हथियार) से उसकी हत्या कर दी। निर्ममता अपनी सारी हदें तब पार कर गई, जब उसके शरीर को इतने टुकड़ों में काटा गया कि शायद उनका कोई रिश्तेदार भी उन्हें पहचान नहीं पाया होगा।

हिपेशिया : एक महिला गणितज्ञ और दार्शनिक, जिनकी मॉब लिंचिंग एक लेक्टर द्वारा की गई (फोटो साभार: HSW Static )

ये मॉब-लिंचिंग का सबसे भयावह दृश्य था। लेक्टर के नेतृत्व में भीड़ ने उसके क्षत-विक्षत शव को पूरे शहर में घुमाया और फिर एक ख़ास जगह पर ले जा कर उसमें आग लगा दी। ये इतना डरावना था, इतना भयावह था- कि इसने बिना सोशल मीडिया वाले उस युग में भी मिस्र सहित पूरे रामन साम्राज्य को हिला दिया था। भीड़ द्वारा हत्या का यह एक ऐसा जीवंत उदाहरण है, जो आज-कल की लाशों पर आग जलाकर प्रोपेगंडा से अपना हाथ सेंकने वाले कथित एक्टिविस्ट्स की सारी पोल खोल देगी।

इतिहास को देखें या संदर्भ की बात करें; महामंडलेश्वर कोई महिला भारत की धरती पर ही बन सकती है, बनती रही हैं, बनती रहेंगी। वेदों से लेकर अन्य धार्मिक पुस्तकों तक- उन्होंने इन सब के लेखन में अपना योगदान दिया है, दे रही हैं और देती रहेंगी। लैंगिक समानता का यह उदाहरण कहीं और नहीं मिलेगा- किसी धर्म में नहीं, अन्यत्र कहीं नहीं।

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