Saturday, July 31, 2021
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सशस्त्र सेनाओं की संयुक्त साइबर, स्पेशल ऑपरेशन तथा स्पेस कमान

यह बड़ी विचित्र विडंबना है कि भारत में ‘इंडियन नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी’ का बिल 2016 से सरकार की वेबसाइट पर जनता के विचारार्थ पड़ा हुआ है जिसपर 1,000 से अधिक विचार आ भी चुके हैं लेकिन सरकार के पास समय नहीं है कि इस बिल को संसद तक ले जाए।

सशस्त्र सेनाओं की संयुक्त साइबर, स्पेशल ऑपरेशन तथा स्पेस कमान का गठन भारत गणतंत्र को सुरक्षित करने की दिशा में महत्वूर्ण निर्णय है। विगत डेढ़ दशक से सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंगों की संयुक्त साइबर, स्पेशल ऑपरेशन तथा स्पेस कमान बनाने की माँग ने ज़ोर पकड़ा था।

आज के समय में जहाँ युद्ध धरती, समुद्र और आकाश तक सीमित नहीं रह गए हैं और नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध का सिद्धांत दिया जा चुका है वहाँ भारत के पास भी साइबर, स्पेशल ऑपरेशन और स्पेस की संयुक्त कमान होना समय की माँग है। भारत सरकार ने इन तीनों कमान के गठन को स्वीकृति प्रदान की है।

जल्दी ही भारत के पास एक संयुक्त स्पेशल ऑपरेशन डिवीज़न, स्पेस और साइबर एजेंसी होगी जो इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के अधीन कार्य करेंगी। रक्षा संबंधी विभिन्न समितियों की रिपोर्टों में इन तीनों की संकल्पना एक ‘कमांड’ के रूप में की गई थी- वैसे ही जैसे थलसेना, नौसेना या वायुसेना की कमांड होती है- परंतु सरकार ने साइबर और स्पेस के लिए एक बड़ी कमांड नहीं बल्कि ‘एजेंसी’ और स्पेशल ऑपरेशन के लिए ‘डिवीज़न’ शब्द प्रयोग किया है।

चूँकि थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों के पास अपने पृथक साइबर विभाग हैं और साइबर विभाग से तीनों के सामने आने वाले खतरे समान हैं इसलिए एक संयुक्त साइबर कमान की आवश्यकता पड़ी जिसमें सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंगों के अधिकारी मिलकर कार्य करेंगे।

स्पेशल ऑपरेशन कमान या एजेंसी का महत्व समझने के लिए स्पेशल ऑपरेशन को समझना आवश्यक है। जब युद्ध चल रहा होता है तब किसी देश की सेना के विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिक शत्रु के क्षेत्र में भीतर तक घुसकर किसी विशेष लक्ष्य को भेदकर वापस लौट आते हैं। ऐसा मिलिट्री ऑपरेशन ‘स्पेशल ऑपरेशन’ कहलाता है। इसका प्रारंभ द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुआ था जब अमेरिका ने हवा से कूद कर शत्रु की भूमि पर उतरने वाली स्पेशल एयरबोर्न डिवीज़न बनाई थी।       

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही लगभग सभी शक्तिशाली देशों की सेनाओं के पास स्पेशल ऑपरेशन दस्तों की बटालियनें रही हैं जिन्हें वे पारंपरिक युद्ध के अतिरिक्त शांतिकाल में लड़े जाने वाले छद्म युद्धों में प्रयोग करते रहे हैं। उदाहरण के लिए इस्राएल ने फ़लस्तीन के साथ कई वर्षों तक छद्म युद्ध लड़ा जिसमें इस्राएली डिफेंस फ़ोर्स की भूमिका अहम रही।

जब भी फ़लस्तीन के आतंकी इस्राएल पर हमला करते तब इस्राएली डिफेंस फ़ोर्स की स्पेशल फ़ोर्स यूनिट उन्हें दंडित करती। आज स्पेशल फ़ोर्स का प्रयोग लंबे समय तक चलने वाले ‘प्रॉक्सी वॉर’ या छद्म युद्ध से लड़ने के लिए ही किया जाता है।  

भारत की थलसेना के पास भी स्पेशल ऑपरेशन के लिए PARA SF यूनिट है। इसके अतिरिक्त नौसेना, वायुसेना और यहाँ तक की केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के पास भी क्रमशः MARCOS, GARUD और COBRA नामक दस्ते हैं जो कठिन परिस्थितियों शत्रु के क्षेत्र में विशेष लक्ष्य को बर्बाद करने का कार्य करते हैं।

लेकिन हमारे यहाँ समस्या यह है कि हमने स्पेशल फ़ोर्स की आधिकारिक परिभाषा नहीं गढ़ी है जिसके कारण भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसे में स्पेशल फ़ोर्स डिवीज़न- जिसे मेजर जनरल रैंक का अधिकारी कमांड करेगा- में किस विशेष बल के जवानों को रखा जाएगा यह तय करना पड़ेगा।  

भारतीय थलसेना की PARA SF का अंग रहे लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश कटोच (सेवानिवृत्त) अपनी पुस्तक India’s Special Forces: History and Future of Special Forces में लिखते हैं कि पहले तो यह निर्धारित करना पड़ेगा कि किस बल की यूनिट को स्पेशल फ़ोर्स कहा जाएगा क्योंकि किसी भी देश की स्पेशल फ़ोर्स उस देश की विदेश नीति निर्धारित करने का कारगर हथियार होता है।

इसका हालिया उदाहरण हमें तब देखने को मिला था जब भारत ने म्यांमार और पाकिस्तान में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की थी। यह सर्जिकल स्ट्राइक केवल भारतीय सशस्त्र सेनाओं (आर्मी, नेवी, एयर फ़ोर्स) के जवान ही कर सकते थे क्योंकि भारत सरकार किसी दूसरे देश में जाकर मिलिट्री ऑपरेशन करने का अधिकार सशस्त्र सेनाओं को ही प्रदान करती है।

ऐसे में हम यह नहीं कह सकते कि विशेष रूप से प्रशिक्षित COBRA कमांडो स्पेशल फ़ोर्स की श्रेणी में आकर विदेश में सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते हैं। स्पेशल फ़ोर्स के महत्व को सबसे पहले अमेरिका ने समझा था। आज अमेरिका के पास न केवल संयुक्त स्पेशल ऑपरेशन कमान है बल्कि उन्होंने छद्म युद्ध के अध्ययन के लिए एक अलग जॉइंट स्पेशल ऑपरेशन यूनिवर्सिटी तक स्थापित कर ली है।

यह बड़ी विचित्र विडंबना है कि भारत में ‘इंडियन नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी’ का बिल 2016 से सरकार की वेबसाइट पर जनता के विचारार्थ पड़ा हुआ है जिसपर 1,000 से अधिक विचार आ भी चुके हैं लेकिन सरकार के पास समय नहीं है कि इस बिल को संसद तक ले जाए।

आज के दौर में स्पेशल फ़ोर्स की अहमियत इतनी अधिक है कि सामरिक विशेषज्ञ भरत कर्नाड ने लिखा है कि यदि भारत को दक्षिण एशिया में अपना सामरिक प्रभुत्व स्थापित करना है तो हमारे पास तीन मूलभूत सामरिक क्षमताओं का होना अनिवार्य है: परमाणु क्षमता युक्त इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल, नेटवर्क सेंट्रिक युद्धक प्रणाली और स्पेशल ऑपरेशन कमांड।

इस दृष्टि से यदि भारत एक वर्ष के भीतर संयुक्त स्पेशल ऑपरेशन डिवीज़न बना लेता है तो हमारे पास पाकिस्तान से दीर्घकालिक छद्म युद्ध लड़ने के लिए डिवीज़न स्तर का एक संयुक्त विशेष युद्धक बल होगा।

संयुक्त साइबर एजेंसी बनाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि भविष्य में सशस्त्र सेनाओं के सभी विभाग आपस में साइबर नेटवर्क से जुड़ कर युद्ध लड़ेंगे। नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर में समुद्र, थल और नभ में स्थित उपकरण आपस में एक ही नेटवर्क से जुड़े होंगे। यदि इस नेटवर्क को शत्रु भेद देगा तो हम युद्ध हारने की स्थिति में होंगे।

यही नहीं युद्ध और शांतिकाल में सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंग एक साथ देश के संसाधन साझा करते हैं चाहे वह बिजली हो या वित्तीय लेनदेन। ऐसे में एक संयुक्त एजेंसी होना आवश्यक है जो किसी भी परिस्थिति में सेनाओं के तीनों अंगों के बीच तारतम्य टूटने न दे।

सेनाएँ गोपनीय सूचनाओं का आदान प्रदान भी करती हैं जिनपर चीन की विशेष नज़र है। इंटेलिजेंस एजेंसियों द्वारा साझा की जा रही सूचनाएँ साइबर डोमेन में सुरक्षित नहीं हैं। मई 2017 में Wanna Cry नामक रैन्समवेयर ने विश्व भर में उत्पात मचाया था। अक्टूबर 2016 में साइबर अटैक से भारत के लगभग 30 लाख डेबिट कार्ड प्रभावित हुए थे।

आतंकवाद से लड़ने के लिए भी संयुक्त साइबर एजेंसी की आवश्यकता है। विभिन्न आतंकी संगठन युवाओं को बरगलाने के लिए साइबर स्पेस का उपयोग करते हैं। मुंबई में 2008 में हुए हमले में voice over internet प्रोटोकॉल का प्रयोग किया गया था। ऐसे अनेक साइबर खतरे हैं जिनसे संयुक्त रूप से निपटने के लिए संयुक्त एजेंसी की आवश्यकता है।

इसके अतिरिक्त देश में सभी प्रकार के संगठनों की सूचनाएँ NTRO और NATGRID में संग्रहित होती हैं जो मिलिट्री इंटेलिजेंस से साझा की जाती हैं। इन सभी सूचनाओं की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण अंग है।

साइबर के अतिरिक्त स्पेस अर्थात अंतरिक्ष भी आज के समय में युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है। जनवरी 2007 में चीन ने अपनी ही सैटेलाइट को मार गिराया था और दुनिया के सामने इसे एक दुर्घटना बताया था। वास्तव में चीन किसी सैटेलाइट को मार गिराने की अपनी क्षमता को जाँच रहा था। डीआरडीओ के अध्यक्ष वी के सारस्वत ने 2010 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस में अपने संबोधन में कहा था कि भारत भी शत्रु के सैटेलाइट मार गिराने की तकनीक विकसित कर रहा है।

आज भारत ने स्पेस एक्सप्लोरेशन ASTROSAT से लेकर नेविगेशन सैटेलाईट IRNSS तक अंतरिक्ष में स्थापित की है। देश में पूरी संचार व्यवस्था इन्हीं सैटेलाइट की सुरक्षा पर टिकी है। थलसेना, वायुसेना और नौसेना के उपकरण इस संचार व्यवस्था पर कार्य करते हैं इसलिए एक संयुक्त एजेंसी का गठन स्वागतयोग्य निर्णय है।

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