जम्मू-कश्मीर में लद्दाख को अलग डिवीज़न बनाने के क्या मायने हैं

लद्दाख क्षेत्र का भारत से भौगोलिक ही नहीं सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहरा है। किंतु जम्मू कश्मीर राज्य की पूरी राजनीति सदैव कश्मीर केंद्रित रही है जिसका ख़ामियाज़ा लद्दाख को भुगतना पड़ा है।

सन 1947-48 में विश्व का सबसे बड़ा भूराजनैतिक परिवर्तन हो रहा था और इस परिवर्तन की धुरी था भारत का जम्मू कश्मीर राज्य। नवंबर 1948 में पाकिस्तानी फ़ौज की अगुआई में कबाईलियों ने ज़ोजिला दर्रे पर कब्जा कर लिया था जिसके कारण श्रीनगर से कारगिल द्रास होते हुए लेह तक जाने का मार्ग कट गया था। तब भारतीय सेना ने 11,500 फ़ीट की ऊँचाई पर टैंकों की तैनाती की और (तत्कालीन) मेजर जनरल थिमैय्या के नेतृत्व में भीषण युद्ध हुआ जिसे ‘बैटल ऑफ़ ज़ोजिला’ कहा जाता है।  

लगभग एक महीने तक चले इस युद्ध को जीतने के बाद ज़ोजिला दर्रे से पाकिस्तानियों को मार भगाया गया और लद्दाख पाकिस्तान के कब्जे में जाने से बच गया। ज़ोजिला की लड़ाई में केवल भारतीय सेना ने ही बलिदान नहीं दिया था अपितु लद्दाख के बौद्ध लामा 19वें कुशोक बकुला रिनपोछे ने युद्ध के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पाकिस्तानी आक्रमण के समय लद्दाखी जनता घबराई हुई कुशोक बकुला की ओर देख रही थी क्योंकि उसी समय से शेख अब्दुल्ला की मौकापरस्त राजनीति में लद्दाख कहीं नहीं था।

भारतीय सेना को ज़ोजिला की लड़ाई में स्थानीय युवकों की अत्यंत आवश्यकता थी क्योंकि वे लद्दाख के पहाड़ों के दुर्गम रास्तों से परिचित थे। कुशोक बकुला ऐसे समय आगे आए और उन्होंने लद्दाख के युवाओं का एक संगठन बनाया जो नुब्रा गार्ड्स के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नुब्रा गार्ड्स के सैनिकों ने पाकिस्तानी तोपें तबाह करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने पाकिस्तानियों को नुब्रा घाटी में आगे बढ़ने से रोके रखा।

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इस प्रकार लद्दाख भारत का अंग बना रहा। यही नहीं सन 1962 के युद्ध में कुशोक बकुला ने बौद्ध मठों को भारतीय सेना के लिए अस्पताल बनाने की मंज़ूरी दे दी थी। जब कभी कश्मीर का एक वर्ग अलगाववाद और जनमत संग्रह की बात करता तब कुशोक बकुला उसका विरोध करते और कहते कि लद्दाख पाकिस्तान के साथ कभी नहीं जाएगा।  

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि लद्दाख क्षेत्र का भारत से भौगोलिक ही नहीं सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहरा है। किंतु जम्मू कश्मीर राज्य की पूरी राजनीति सदैव कश्मीर केंद्रित रही है जिसका ख़ामियाज़ा लद्दाख को भुगतना पड़ा है। यह स्थिति आज से नहीं बल्कि आधुनिक लद्दाख के निर्माता कहे जाने वाले कुशोक बकुला के समय से है। वास्तव में लद्दाख का क्षेत्रफल कश्मीर से अधिक है किंतु वहाँ की जनसंख्या बहुत कम है। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति शेष जम्मू कश्मीर राज्य से भिन्न और अनोखी है इसीलिए उसे अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है।

जनसंख्या के आधार पर पूरे जम्मू कश्मीर राज्य को दो डिवीज़न में बाँटा गया था- जम्मू और कश्मीर। पहले लद्दाख के दो ज़िलों- कारगिल और लेह- का प्रशासन भी कश्मीर डिवीज़न द्वारा ही चलाया जाता था। श्रीनगर में बैठे डिविज़नल कमिश्नर मनमानी करते थे और लद्दाख की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते थे। सन 2010 में जब बादल फटा था और लद्दाख में बाढ़ आ गई थी तब राहत सामग्री के लिए लेह और कारगिल में बैठे दोनों डिप्टी कमिश्नर तब तक इंतज़ार करते रहे जब तक श्रीनगर से डिविज़नल कमिश्नर का आदेश नहीं आ गया।

दरअसल डिवीज़नल कमिश्नर के पास ही सारे अधिकार होते हैं और जब तक वहाँ से फंड रिलीज़ नहीं होता तब तक डिवीज़न में कोई विकास या राहत कार्य नहीं हो सकता। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि छह महीने वहाँ बर्फ गिरती है जिसके कारण बाहरी दुनिया से सम्पर्क टूट जाता है। ऐसे में किसी भी प्रशासनिक आदेश के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है।

लद्दाख में रोजगार के अवसर कम हैं क्योंकि यह क्षेत्र शेष कश्मीर से अधिक पिछड़ा हुआ है। यहाँ फंड की कमी है जिसके कारण विकास कार्य बाधित होते हैं। विकास परियोजनाओं की चाभी श्रीनगर में बैठे डिविज़नल कमिश्नर के पास होती है जो कश्मीर घाटी की अलगाववादी राजनीति से प्रभावित होती है।

अब जब लद्दाख को एक अलग डिवीज़न बना दिया गया है तब वहाँ कश्मीर से अलग एक डिविज़नल कमिश्नर होगा, प्रत्येक विभाग का अलग डायरेक्टरेट होगा तथा वरीयता और अन्य मापदंडों के आधार पर प्रोन्नति में बाधा नहीं आएगी। सबसे बड़ी बात कि अब लद्दाख के लोगों को किसी भी प्रशासनिक कार्य के लिए श्रीनगर का मुँह नहीं देखना होगा। पहले श्रीनगर में बैठे अधिकारी अपने हिसाब से लद्दाख का प्रशासनिक कामकाज देखते थे और लद्दाख की समस्याओं की अनदेखी करते थे।  

राज्यपाल की मुहर के बाद अब लद्दाख डिविज़न का प्रशासनिक और रेवेन्यू मुख्यालय लेह में होगा जिसके बनने की तैयारी शुरू कर दी गई हैं। अब लेह में एक अलग डिविज़नल कमिश्नर और इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस का पद और कार्यालय होंगे। साथ ही प्रिंसिपल सेक्रेटरी के निगरानी में एक टीम बनायी गई  है, जो अन्य प्रशासनिक विभागों के डिविज़नल ऑफिस, उसके अधिकारियों और स्टाफ की नियुक्ति और लागू करने का काम देखेंगे। इससे न सिर्फ लोगों को सुविधा होगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास में बढोत्तरी होगी। मुख्यालय खुलने से आसपास बिज़नेस की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।

राज्यपाल के लद्दाख को अलग डिवीज़न बनाने के निर्णय के विरुद्ध कश्मीर के नेताओं की बिलबिलाहट भी दिखने लगी है। एक तरफ तो उनका वर्चस्व टूटा है दूसरी तरफ वे इससे खुलकर असहमति भी नहीं जता पा रहे हैं। आनन-फानन में नेताओं और पत्रकारों ने ट्वीट कर बेमन बधाई तो दी लेकिन असली भड़ास इन “किन्तु-परन्तु” और “but” जैसे शब्दों के साथ निकालनी शुरू कर दी गई हैं। अब इन्हें चेनाब और पीर पंजाल की याद भी आने लगी है।


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