Saturday, July 24, 2021
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अप्रिय रवीश कुमार! एक ‘शांतिपूर्ण आंदोलन’ 53 लोगों की जान ले चुका है, अभी कितने बाकी हैं?

एक जो बड़ा फर्क इस बार के आन्दोलन में देखा जा रहा है वो ये कि पिछले दिसंबर में फैज की नज्में पढ़ी जा रहीं थीं जबकि इस बार फैज की जगह पाश की कविता ने ले ली हैं।

एक वामपंथी के लिए इससे ज्यादा सुकून की बात और क्या हो सकती है कि देशभर में दंगे, विरोध-प्रदर्शन, अराजकता का माहौल हो। दक्षिणपंथी सत्ता विरोध के लिए एक दिसंबर पिछले साल शाहीनबाग के रस्ते आया था और दूसरा दिसंबर हमारे सामने सिंघु बॉर्डर की शक्ल में सामने आ रहा है। एक जो बड़ा फर्क इस बार के आन्दोलन में देखा जा रहा है वो ये कि पिछले दिसंबर में फैज की नज्में पढ़ी जा रहीं थीं जबकि इस बार फैज की जगह पाश की कविता ने ले ली हैं।

वास्तव में, इस तरह के भारत बंद या देश में बढ़ती अराजकता, यह सब वामपंथी समाचार चैनल्स और रवीश कुमार जैसे प्रपंचकारियों द्वारा रोजाना लोगों के दिमाग में भरे जा रहे उन्माद का ही नतीजा होते हैं। पूँजीवादियों के विरोध में अपनी पहचान कायम रखने के अपने नशे की संतुष्टि के लिए रवीश कुमार ने निरंतर ही अपने प्राइम टाइम और फेसबुक पोस्ट के जरिए फेक ख़बरों, फर्जी दावों का सहारा लिया और जमकर ‘अम्बानी-अडानी‘ का भ्रम बेचा। कविता और लेखों के जरिए संविधान की आड़ में अपने अजेंडा को हवा देने का यह सबसे सभ्य तरीका है।

रवीश कुमार एकबार फिर अपने प्राइम टाइम में सक्रीय हो चुके हैं और अपनी पोजीशन ले ली है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के कुलपति ने अपने नए प्राइम टाइम वीडियो में आरोप लगाया है कि किसानों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को बदनाम किया जा रहा है।

इस दिसंबर में रवीश के दुःख का मूल किसानों का कथित शांतिपूर्ण आन्दोलन है। पिछले साल भी ठीक इन्हीं दिनों एक ‘शांतिपूर्ण आँदोलन’ आगे बढ़ रहा था। उसका नतीजा यह रहा कि दिल्ली में 53 लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी। शाहीनबाग के नाम पर इन हिन्दू विरोधी दंगों ने दिल्ली के इतिहास में जिस काले अध्याय को जोड़ दिया उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी।

रवीश के इन शान्तिपूर्ण आंदोलनों को यदि ‘पिछला दिसंबर बनाम नया दिसंबर’ कर के देखा जाए तो हमें इन शांतिपूर्ण आंदोलनों में एकरूपता नजर आती है। जैसे- शाहीनबाग़ में भी सड़कों को जाम कर दिया गया। दैनिक जीवन को प्रभावित करने के षड्यंत्र किए गए। संगठित तरीके से यह सब काम किया जाता रहा।

पिछले दिसंबर के ‘शांतिपूर्ण आन्दोलन’ में भी वहाँ मौजूद शायद ही किसी प्रदर्शनकारी ने नागरिकता कानून के बारे में पढ़ा था। वहाँ बिरियानी बाँटी गई और लंगर लगाए गए, जामिया में आगजनी की गई और भारत विरोधी षड्यंत्र उस शांतिपूर्ण आन्दोलन की आत्मा बने रहे।

अब पिछले दिसंबर की तुलना इस दिसंबर से कर के देखें तो हम देखते हैं कि इन किसान आंदोलनों की शुरुआत ही ट्रेक्टर जलाकर की गई। यहाँ भी खाने के एकदम दुरुस्त इंतजाम हैं। भारत को तोड़ने की बातें की जा रही हैं, कानून का जिक्र तक नहीं, फर्जी मानवाधिकारों का हवाला दिया जा रहा है। किसान आंदोलनों में भी वो तस्वीरें सामने आने लगी हैं जिनमें या तो चिकेन नेक से पूर्वोत्तर भारत को भारत के नक़्शे से काट दिया गया है या फिर जम्मू कश्मीर के नक़्शे से लद्दाख समेत कश्मीर को अलग किया गया है।

किसान सड़कों पर हैं, जाम की धमकी दे रहे हैं और लगातार सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। इस बीच खालिस्तान जिंदाबाद, कश्मीर की आजादी के नारे और मजहबी नारों ने चुपके से किसान प्रदर्शनों के रास्ते अपने लिए जगह बना ली है।

किसान नेता यह भी माँग कर चुके हैं कि इस साल की शुरुआत में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में जितने भी आरोपित UAPA के तहत गिरफ्तार हैं, उन्हें रिहा कर दिया जाए। इनके अलावा, जितने भी शहरी नक्सली माओवादियों से सम्बन्ध या नक्सली गतिविधियों में शामिल पाए गए हैं, उन्हें भी ‘क्लीन चिट’ देने की माँग की गई है।

जितने भी नाम किसान आन्दोलन में किसान नेताओं ने लिए हैं, चाहे वह शरजील इमाम हो, उमर खालिद, उनमें से कितने किसान हैं यह रहस्य बना हुआ है। शर्जील इमाम और उमर खालिद जैसे नामों की रिहाई और उन्हें क्लीन चिट देने से कौनसा कृषि सुधार हो जाएगा यह और भी बड़ा रहस्य बन चुका है।

जिन तस्वीरों को किसान आंदोलनों में दिखाया जा रहा है उनके नाम शरजील इमाम, उमर खालिद, गौतम नवलखा, पी वरवरा राव, वर्नन गोंज़ाल्वेस, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज आदि हैं.. अब इन किसान आन्दोलनों में अगर कुछ बाकी रह गया है तो वह है किसानों की बात और किसानों की तस्वीर।

ऐसे में रवीश कुमार का दावा है कि इन शांतिपूर्ण आंदोलनों को बदनाम किया जा रहा है। नहीं रवीश बाबू, इन्हें बदनाम नहीं किया जा रहा बल्कि इस दिसंबर के आन्दोलन की आत्मा में भी वही है जो शाहीनबाग़ के मूल में था। इन्हें बदनाम नहीं किया जा रहा है, इन आन्दोलनों की प्रकृति ही संदेहास्पद है। धूर्त वामपंथियों को इससे शिकायत नहीं करनी चाहिए, उन्हें खुश होना चाहिए कि भारत एकबार फिर पिछले दिसंबर की ओर बढ़ रहा है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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