जब अम्मी-अब्बू ही ‘वेश्या’ कहकर हत्या कर दें, तो जहाँ में ‘बेटियोंं’ के लिए कोई जगह महफ़ूज़ नहीं

अपनी ही औलाद का दम घोटते इफ्तिख़ार अहमद के हाथ उस वक़्त कैसे नहीं काँपे, यह अत्यंत ही पीड़ादायी प्रश्न है? इसे सहजता से नहीं स्वीकारा जा सकता।

आज़ादी भला किसे नहीं पसंद क्योंकि वो किसी की जागिर नहीं होती। इस पर सबका एकसमान हक़ होता है, फिर चाहे वो महिला हो या पुरुष। लेकिन पितृसत्ता कभी-कभी इतनी हावी हो जाती है कि अपनी पसंद के कपड़े पहनना भी किसी ग़ुनाह से कम नहीं होता। और इसके लिए जान देकर चुकानी पड़ जाती है भारी क़ीमत।

अपनी पसंद से कपड़े पहनना 17 साल की शैफिला के लिए जानलेवा बन गया। उसके पिता इफ्तिख़ार अहमद और अम्मी फरजाना को बेटी के चाल-चलन पर शक़ था, जिसके चलते उसके मुँह में प्लास्टिक का बैग ठूंसकर उसकी निर्मम हत्या कर दी गई। उसके माता-पिता को लगता था कि उनकी बेटी छोटे कपड़े पहनती है और वो ज़रूर कोई ग़लत काम करने लगी है। इसी शक़ ने शैफिला की जान ले ली।

सवाल यह है कि अपनी पसंद के कपड़े पहनना क्या किसी माता-पिता को इतना नागवार लग सकता है कि वो अपनी ही संतान की जान तक ले लें, अगर ऐसा है तो फिर आज़ादी के क्या मायने?

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शैफिला की हत्या करने के बाद पिता ने उसकी लाश को अपनी कार के पीछे रखा और वैरिंगटन (Warrington) के घर से 70 किलोमीटर जाकर दूर फेंक दिया। पुलिस की हरक़त के बाद माता-पिता ने जवाब दिया कि उनकी लड़की घर से भाग गई है। लेकिन झूठ की बुनियाद आख़िर कब तक टिकी रह सकती थी, सच सामने आ ही गया।

दरअसल, यह मामला 2003 का है। Cheshire (चेशायर) के वैरिंगटन में इस निर्मम हत्या को अंजाम दिया गया था। हत्या की इस घटना की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कड़ी निंदा हुई थी। मामला भले ही 2003 का हो लेकिन इसमें अब एक नया मोड़ आया है। वो यह कि शैफिला के क़रीबी दोस्तों में से एक शनिन मुनीर ने ख़ुलासा किया कि शैफिला अक्सर ख़ुद पर होने वाले अत्याचार के बारे में बताती थी। इसमें वो बताती थी कि उसके माता-पिता उसके साथ दुर्व्यवहार करते हैं। उसे धमकाया जाता है और मारने तक की धमकी दी जाती थी। उसके दोस्त ने बताया कि शैफिला के माता-पिता उसको ‘वेश्या’ तक कहते थे और कभी-कभी हालात इतने विपरीत हो जाते थे कि वो घर से भाग जाने के बारे में भी सोचा करती थी।

आमतौर पर यह कहा जाता है कि महिलाओं की सुरक्षा उनके घर की दहलीज़ के भीतर होती है, यानी अगर महिलाएँ घर के अंदर हैं तो वो सुरक्षित हैं और यदि बाहर हैं तो उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। ऐसे में सवाल आता है कि जब घर की चार दीवारी में ही बेरहमी से हत्या हो जाए तो उसे सुरक्षा के किस दायरे में रखा जाए?

शैफिला के माता-पिता ने समाज के सामने अपना एक ऐसा रूप रखा जिसकी एक सभ्य समाज में कल्पना भी नहीं की जा सकती। अपनी ही औलाद का दम घोटते इफ्तिख़ार अहमद के हाथ उस वक़्त कैसे नहीं काँपे, यह अत्यंत ही पीड़ादायी प्रश्न है? इसे सहजता से नहीं स्वीकारा जा सकता।

निक़ाह-हलाला और ट्रिपल तलाक़ जैसी कुप्रथाएँ क्या कम पड़ गईं थी, जो अपनी पसंद के कपड़े पहनने को भी इस प्रताड़ना के दायरे में ला दिया गया! 17 साल की बच्ची पर ये ज़ुल्म किस हद तक सही है, इस पर समय रहते विचार किया जाना चाहिए। अन्यथा अपनी कुंठित सोच के चलते न जाने कितनी शैफिला ऐसी ही निर्मम हत्या का शिकार होती रहेंगी।

एक तरफ दुनिया आगे बढ़ने की दिशा में नित नए इतिहास रचने में लगी हुई है और नई बुलंदियों पर क़दम रख रही है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की घटना यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि इफ़्तिखार और फरजाना जैसे लोग इस तरक्की की राह में रोड़े हैं, जो अपनी दूषित सोच के ज़रिए समाज में ज़हर घोलने का काम करते हैं। आज भी जब महिला वर्ग पर उनके कपड़ों और बिंदास छवि को चाल-चलन के तराजू पर तौला जाता है तो ऐसी मानसिकता पर तरस आता है जो आज भी अपनी रुढ़िवादी और कुंठित सोच का खुला प्रदर्शन करते हैं।


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