‘इस्लामोफोबिया’ और मल्टीकल्चरलिज़्म के मुखौटे के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई है न्यूज़ीलैंड का नरसंहार

इस्लामोफोबिया नामक बीमारी तो बता दी गई लेकिन इसका कारण नहीं बता पाए। आतंकवाद का रिलिजन नहीं होता यह स्थापित कर दिया गया लेकिन रिलिजन ही कई बार आतंकवादी मनोवृत्ति का उद्गम स्थल क्यों होता है इसकी पड़ताल नहीं की गई।

आज न्यूज़ीलैंड में एक व्यक्ति ने क्राइस्टचर्च नगर में स्थित मस्जिद में गोलीबारी कर बेरहमी से लगभग 50 लोगों की जान ले ली। चारों तरफ इस कृत्य की निंदा हो रही है। न्यूज़ीलैंड की क्रिकेट टीम ने बांग्लादेश के साथ मैच रद कर दिया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने तो मारे गए लोगों के सम्मान में राष्ट्रीय ध्वज तक झुका दिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान सहित तमाम मुस्लिम देशों ने मारे गए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि प्रकट की है। इमरान खान ने तुरंत ‘आतंकवाद का कोई रिलिजन नहीं होता’ वाला जुमला पलट कर फेंका। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ ने क्राइस्टचर्च में हुए इस कत्लेआम को ‘इस्लामोफोबिया’ करार दिया।  

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बयान स्वयं न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री की तरफ से आया है। प्रधानमंत्री जसिन्डा एर्डर्न ने कहा कि यह न्यूज़ीलैंड के इतिहास में काला दिन है। एर्डर्न ने घटना की प्राथमिक जाँच पूरी होने से पहले ही अपने ट्वीट में यह बयान दिया, “मरने वालों में अधिकतर बाहर से आकर बसे हुए (माइग्रेंट समुदाय) लोग होंगे, न्यूज़ीलैंड जिनका घर है और वे हमारे अपने हैं।”

जिस व्यक्ति ने क्राइस्ट चर्च में लगभग पचास लोगों को मार दिया उसने एक मैनिफेस्टो जारी कर इस हमले की जिम्मेदारी ली और कारण भी बताया। आरोपित के अनुसार उसने न्यूज़ीलैंड में बाहर से आने वाले इमिग्रेंट्स (मुस्लिम समुदाय) को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वह अपनी मातृभूमि को उनसे आज़ाद करवाना चाहता था। वह चाहता था कि ‘यूरोपीय भूमि’ (ऐसे स्थान जहाँ यूरोपीय सभ्यता के लोग रहते हैं) पर इमिग्रेंट्स की संख्या में कटौती की जाए। मस्जिद जैसी जगह पर इतने बड़े स्तर पर हुए कत्लेआम की जितनी भर्त्सना की जाए उतनी कम है। पुलिस ने जिन तीन लोगों को गिरफ्तार किया है उन्हें दंड भी मिलेगा। लेकिन इस घटना के और भी आयाम हैं जिनपर चिंतन आवश्यक है।

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विकसित देशों में इमीग्रेशन आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। किसी देश में बाहर से आकर बसने वाले अपने साथ अपनी संस्कृति, खानपान, भाषा, पहनावा, उपासना पद्धति और रहन सहन का हर वो तरीका लेकर आते हैं जो उस देश से भिन्न होता है जहाँ वे जाते हैं। संख्याबल बढ़ने पर उस समुदाय विशेष के लोग उस स्थान की डेमोग्राफी और संस्कृति बदलने की क्षमता रखते हैं। यह धीमा लेकिन बेहद प्रभावशाली तरीका है किसी स्थान पर अपनी सामुदायिक विशिष्टता की जड़ें जमाने का।

यह भी सर्वविदित है कि इस्लाम जहाँ भी गया वहाँ तलवार के बल पर सत्ता कायम की। लेकिन एक सभ्य समाज में हम किसी समुदाय के पुरखों के कुकर्मों की सज़ा आज जीवित लोगों को नहीं दे सकते यह भी स्थापित सत्य है। लेकिन इस सवाल पर भी सोचने की आवश्यकता है कि जिस प्रकार यूरोपीय सभ्यता के लोग ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में आकर बसे और वहाँ की आदिम जनजातियों को समाप्त कर दिया, क्या वही कृत्य आज स्वीकार्य होगा?

इस्लामी आक्रमण के कई उदाहरण हमारे सामने हैं। चाहे ईरान का पारसी समुदाय हो या बंगाली, बलोची, सिंधी, दरदी, बल्ती और मूलतः हिन्दू कश्मीरी अस्मिताएँ- ये सब एक इस्लामी स्टेट बनाने की ज़िद की भेंट चढ़ गए। आज भारत के पूर्वोत्तर में स्थित असम में बांग्लादेशियों की घुसपैठ का मामला उठता है तो कोर्ट में तर्क दिया जाता है कि बांग्लादेशियों का इतनी बड़ी संख्या में आगमन असम की सदियों पुरानी वनवासी जनजातियों के अस्तित्व पर खतरा है। म्यांमार में स्वभावतः शांत रहने वाले बौद्ध लोगों ने रोहिंग्यों के विरुद्ध हथियार उठा लिए हैं क्योंकि वे उनकी अस्मिता पर संकट बन गए हैं।

आज डेमोग्राफी चेंज किसी देश पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा है। लेकिन यह दुःखद है कि यूरोपीय देश और पश्चिमी सभ्यता इस खतरे को देखकर भी आँखें मूँदे हुए हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि क्राइस्ट चर्च में नरसंहार करने वाले को तुरंत ‘आतंकवादी’ घोषित कर दिया गया जबकि उसने एक आपराधिक कृत्य किया था। मुस्लिम देशों के राजनेता अपराध और आतंकवाद में अंतर करना ही भूल गए।

नए ग्लोबल ऑर्डर को स्थापित करने में जो सबसे महत्वपूर्ण विचार है वह यह है कि अब समस्याएँ किसी एक देश की न होकर वैश्विक हैं और पूरा विश्व उनके समाधान में योगदान देगा। इसकी आड़ में लिबरल विचारों को हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसी का परिणाम है कि सच और झूठ में अंतर समझ में नहीं आता। सही और गलत का भेद धुंधला हो चला है।

यह एक नए प्रकार का शिष्टाचार युक्त रेसिज़्म है जिसमें प्रत्येक सभ्यता में अच्छाई जबरन खोजी जाती है। और जिसे वह न दिखाई दे उसे परले दर्ज़े का मूर्ख और फासीवादी मान लिया जाता है। सभी मनुष्य अच्छे हैं, किसी में कोई भेदभाव नहीं और सभी रिलिजन शांति का संदेश देते हैं- इस लिबरल रेसिज़्म के आदर्श वाक्य हैं। इन आदर्श वाक्यों पर चलने वाले वस्तुतः द्वितीय विश्व युद्ध के समय यहूदियों पर हुए अत्याचारों से उपजे अपराधबोध से इस कदर ग्रसित हैं कि उन्हें आतंकवाद और अपराध में अंतर समझ में ही नहीं आता।

इस्लामोफोबिया नामक बीमारी तो बता दी गई लेकिन इसका कारण नहीं बता पाए। आतंकवाद का रिलिजन नहीं होता यह स्थापित कर दिया गया लेकिन रिलिजन ही कई बार आतंकवादी मनोवृत्ति का उद्गम स्थल क्यों होता है इसकी पड़ताल नहीं की गई। यह बड़ी विचित्र वैश्विक व्यवस्था बनाई जा रही है जिसके घटकों का ओर-छोर पता नहीं चलता।

मल्टीकल्चरलिज़्म अर्थात मिलावटी संस्कृति इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन दुर्भाग्य से इसके सिद्धांत केवल सहिष्णु समुदाय के लोगों पर ही लागू होते हैं। मुस्लिम किसी दूसरे देश में जाकर बसें तो उस देश के लोगों पर मल्टीकल्चरलिज़्म लागू होगा लेकिन कोई सऊदी अरब या पाकिस्तान जाकर रहने लगे तो उसपर वही सिद्धांत लागू नहीं होते।

डगलस मरे अपनी पुस्तक The Strange Death of Europe में लिखते हैं कि सन 2012 की जनगणना के अनुसार लंदन के मात्र 44.9% निवासियों ने ही स्वयं को ‘white British’ कहा। आश्चर्य है कि जिस ब्रिटेन ने कभी हिटलर जैसे फासीवादी के सामने घुटने नहीं टेके थे आज वह पाकिस्तानी नागरिकों को सहर्ष गले लगाता है। समूचा यूरोप अपनी डेमोग्राफी बदलने के प्रति सचेत नहीं है।

जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने 2010 में लगभग पचास हज़ार शरणार्थियों को आने दिया था। पाँच वर्षों बाद यह संख्या डेढ़ करोड़ तक पहुँच गई। इसके बाद जर्मनी और बाकी यूरोपीय देशों में इस्लाम को न मानने वालों के खिलाफ हिंसक वारदातों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। काफिरों के विरुद्ध स्वतः हिंसा करने वाले ‘लोन वुल्फ’ अर्थात बिना किसी संगठन से जुड़े हुए आतंकी पहचाने गए।

मल्टीकल्चरलिज़्म और इस्लामोफोबिया के मुखौटे के पीछे की सच्चाई यही है कि कोई वैश्विक राजनेता सच स्वीकार नहीं करना चाहता। कोई यह खुलकर नहीं कहता कि इस्लामी देशों को अपने नागरिकों को खुद संभालना चाहिए। उन्हें नौकरी और सामाजिक सुरक्षा देने का जिम्मा किसी दूसरे देश ने नहीं ले रखा है। आयलान कुर्दी के नाम पर जिस ‘विक्टिमहुड’ को बड़ी चतुराई से बेचा गया था अब वह बर्दाश्त के बाहर हो चुका है। आज न्यूज़ीलैंड में एक साधारण नागरिक ने बंदूक उठाई और अपराध किया। उसे उसकी करनी की सज़ा मिलेगी लेकिन जो क्षोभ जनमानस के भीतर गहरा गया है वह विप्लव बन कर एक दिन उठेगा और सभ्यताओं के संघर्ष का कथन सत्य सिद्ध हो जाएगा।   

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