Friday, March 5, 2021
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क्रिकेटर की मिलिट्री कैप हो गई ‘खतरनाक’, पाक अकुपाइड पत्रकार कब सुधरेंगे?

जब धोनी और कोहली मिलिट्री कैप को पहनकर मैदान पर उतरे तब उन्होंने देश के उन करोड़ों लोगों का दिल जीता जिनके भीतर राष्ट्र और सेना के प्रति सम्मान है।

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ एक दिवसीय मैच के तीसरे मुकाबले में भारतीय क्रिकेट टीम ने शुक्रवार (मार्च 8, 2019) को पुलवामा में वीरगति प्राप्त हुए सेना के जवानों और उनके परिवार के सम्मान में मिलिटरी कैप को पहना।भारतीय टीम के इस कदम को सबके द्वारा सराहा गया लेकिन कुछ लोगों से यह बर्दाशत नहीं हुआ। वैसे तो इस कदम का विरोध पाकिस्तान द्वारा भी किया गया जो कि अपेक्षित था लेकिन कुछ घर के दीमकों ने इसे मुद्दा बनाया और अपनी सनी हुई विचारधारा को परोसने का एक बार फिर प्रयास किया।

इस मैच के खत्म होने के साथ ही न्यूज़ में एक हेडलाइन आई, “Indian team wearing Military Cap is a dangerous sign” जिसका अर्थ हुआ कि भारतीय टीम ने जो मिलिटरी कैप पहनी है वो एक खतरनाक निशान है। जाहिर है कि इतनी ‘बढ़िया’ हेडलाइन वाले आर्टिकल को अंदर तक पढ़ने का किसी का भी मन करेगा। आखिर इसी से तो मालूम चलता है कि एक पाठक को किस तरह बकवास बताते हुए बरगलाया जाता है।

इस लेख में पहले बताया गया कि वीरगति को प्राप्त हुए जवानों के परिवार वालों की मदद के लिए टीम द्वारा मिलिटरी कैप पहनकर प्रचार करना आवश्यक नहीं था और बाद में इस लेख में भारतीय टीम के इस कदम को अंधराष्ट्रीयता (outward military jingoism) से जोड़कर बताया गया। हालाँकि, भारतीय क्रिकेट टीम के लिए इस प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल एक मज़ाक से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं लेकिन ऐसा करने के साथ आर्टिकल को लिखने वाले लेखक ने खुद के लिए अतिश्योक्ति के रास्ते को अख्तियार कर दिया।

मिलिट्री कैप को पहनने का स्पष्ट अर्थ था कि भारतीय क्रिकेट टीम वीरगति प्राप्त हुए सीआरपीएफ के जवानों और उनके परिवार वालों के साथ खड़ी है। यह कोई युक्ति नहीं थी जिससे अंदाजा लगाया जाए कि ऐसा दान कार्य को प्रचारित करने के लिए किया गया है। बल्कि यह कदम तो सभी भारतीय नागरिकों को राष्ट्रीय रक्षा कोष में योगदान देने के लिए प्रेरित करने का एक प्रयास था।

मालूम नहीं कि इस लेख को लिखने वाले लेखक इस बात को जानते हैं या नहीं लेकिन भारत में जिन दो चीजों को सबसे ज्यादा सराहा जाता है वो एक भारतीय सेना और दूसरी भारतीय क्रिकेट टीम है। सीमा पर सेना की कार्रवाई और पिच पर भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी के प्रदर्शन को लेकर लोगों में उत्साह बराबर ही देखने को मिलता है। ऐसे में अगर भारतीय क्रिकेट टीम भारतीय सेना के साथ खड़ी दिखती है, तो जाहिर है न इसमें कोई हैरानी वाली बात है और न ही खतरे वाली।

लेकिन इस लेख में इतने के बावजूद भी टीम और मिलिट्री कैप का military jingoism (सैन्य अंध-राष्ट्रभक्ति)के साथ तुल्नात्मक अध्य्यन खत्म नहीं हुआ और धीरे-धीरे इसका इतना विस्तार हुआ कि केवल मिलिट्री कैप पहनने भर को खतरनाक राष्ट्रवाद का नाम दे दिया गया।

राष्ट्रवाद के नाम पर ऐसा कभी नहीं हुआ? सचिन का हेलमेट भूल गए…

इस आर्टिकल में आगे लच्छेदार बातें करते हुए कहा गया कि आज से पहले कभी भारतीय क्रिकेट टीम ने इस तरह की ‘अंध-राष्ट्रीयता’ को अपने सर पर नहीं पहना था, लेकिन शायद लेखक महोदय भूल गए हैं कि क्रिकेट की दुनिया के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर ने हमेशा मैदान में अपने सिर पर तिरंगे को गर्व से सजाए रखा है।

सचिन तेंदुलकर

इसके बाद इस आर्टिकल में सवाल किया गया कि आखिर अब तक भारतीय टीम ने शिक्षा और अन्य जगहों में अपनी कमाई को क्यों नहीं दिया? मतलब साफ़ है लेखक को दिक्कत इस बात से हैं कि जवानों के लिए भारतीय क्रिकेट टीम में इतना प्यार क्यों है… खैर इस पूरे आर्टिकल को पढ़ते हुए आपको लगातार हँसी आएगी और आप यह सोचने पर मजबूर हो जाएँगे कि लेखक को आखिर यह तय करने का अधिरकार किसने दिया कि भारतीय टीम अपनी कमाई कब, किसे और कैसे देगी। लेकिन फिर भी, चूँकि इस लेख से लगता है कि लिखने वाला ‘गजनी’ फिल्म वाली बीमारी से पीड़ित है इसलिए याद दिला दें कि हाल ही में केरल बाढ़ पीड़ितों के लिए भारतीय क्रिकेट टीम ने पूरे टेस्ट मैच में मिलने वाले रुपयों को दान में दिया था। इसके अलावा टीम के खिलाड़ियों ने आम बच्चों और कैंसर पीड़ितों के लिए चैरिटी फुटबॉल मैच भी खेला था।

लेखक ने अपने लेख में जिन खिलाड़ियों पर सवाल उठाए हैं वो शायद नहीं जानते कि इन खिलाड़ियों ने निजी स्तर पर पशु कल्याण, स्वच्छ भारत मिशन, नारी सशक्तिकरण जैसे आदि मुद्दों पर अलग-अलग अपना योगदान दिया है। और अगर उन्हें याद है तो लगता है चुनाव के नज़दीक होने के कारण लेखक को केवल राष्ट्रवाद की छवि धूमिल करना ही उचित लग रहा है।

इस लेख में उस समय का भी हवाला दिया गया जब भारत की हॉकी टीम ने 1936 में “हेल हिटलर” को सैल्यूट करने से इंकार कर दिया था। उस समय इस घटना को फॉसिज्म के ख़िलाफ़ उठा कदम बताया गया था लेकिन वहीं आज भारतीय टीम के कदम को खतरनाक बता दिया गया जो स्पष्ट रूप से जवानों के साथ और आतंकवाद के ख़िलाफ़ खड़े थे।

वैसे देखा जाए तो अब हमें ऐसे लोगों की कही बातों पर हैरान होने की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि देश में अभिव्यक्ति की आजादी का फायदा उठा कर तो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे दे दिए गए। फिर सेना की टोपी भर पहनने को अगर यहाँ पर ‘सैन्य अंध-राष्ट्रवाद’ से जोड़ा जाए तो क्या हैरानी है। दरअसल ऐसे लोगों को कोई लेना-देना नहीं हैं कि देश की सेना हमें सुरक्षित रखने के लिए किस तरह के प्रयास कर रही है। एक मिलिट्री कैप को पहनना इनके लिए निश्चचित ही डरावना हो सकता है, क्योंकि उससे इनकी विचारधारा पर खतरा मंडराना शुरू हो जाता है।

जब मोइन अली ने कलाई में बैंड बाँधकर खेला था मैच

इस आर्टिकल में लिखे झूठ अभी यहीं खत्म नहीं होते बल्कि आगे भी इसमें झूठों का विस्तार है। इस आर्टिकल में लिखा है कि मॉडर्न क्रिकेट के इतिहास में कभी अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान किसी ने भी सैन्य छलावरण टोपी या फिर कोई प्रतीक नहीं पहना। अब लेखक को कौन बताए कि आर्टिकल लिखने से पहले अगर वो सिर्फ गूगल पर थोड़ी जानकारी ले लेते तो उन्हें मालूम पड़ता कि 2014 में साउथएम्पटन टेस्ट में मोइन अली ने गाजा और पैलेस्टीन को आजाद करने के लिए कलाई में बैंड बांधकर खेल खेला था और पूरी टीम के कॉलर पर ‘हेल्प फॉर हीरोज़’ का लोगो भी लगा था। जाहिर है अति लिब्रल लोगों को उनके इस इशारे से किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं हुई होगी क्योंकि यहाँ से उनकी विचारधारा को कोई दिशा नहीं मिलती।

मोइन अली

जब धोनी और कोहली मिलिट्री कैप को पहनकर मैदान पर उतरे तब उन्होंने देश के उन करोड़ों लोगों का दिल जीता जिनके भीतर राष्ट्र और सेना के प्रति सम्मान है।

लेकिन आज हमारे देश में कुछ तथाकथित पत्रकारों की वो हालत है कि वो देश के नागरिकों में राष्ट्रवाद का गलत पर्याय फैलाने में जुटे हुए हैं। ऐसे लोग डरते हैं कि राष्ट्रवाद की भावना लोगों के भीतर जागरूकता को फैला रही है, जिसके कारण इनके अजेंडे कामयाब नहीं हो रहे। अब ऐसे में इसलिए यह लोग ऐसे माहौल का निर्माण कर रहे हैं जिसमें एक राष्ट्रवादी को आतंकवाद का चेहरा बताकर पेश किया जा रहा है और आतंकियों को सहिष्णुता और मानवता का संरक्षक।

बता दिया जाए कि ऐसे प्रोपोगेंडा फैलाने वाले ये वहीं लोग हैं जो ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं’ जैसे नारों को पैदा करते हैं और ‘भारत माता की जय’ बोलने पर इन्हें शर्म आने लगती हैं। ऐसे ही लोग पत्थरबाजों के समर्थन में खोज-खोज कर आर्टिकल लिखने को तैयार रहते हैं लेकिन जैसे ही भारतीय सेना इनके ख़िलाफ़ कदम उठाती हैं तो इन्हें उससे गुरेज़ होता है।

अंग्रेज़ी के मूल लेख का अनुवाद जयंती मिश्रा ने किया है।

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Chandan Kumar
Works 9 to 5 to feed the stomach Writes in free time to feed the soul.

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