Monday, September 21, 2020
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जावेद साहब! प्रेमगीत लिखिए, वीर रस आपको शोभा नहीं देता

यदि भारतीय सेना में गुजरात रेजिमेंट नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि गुजराती लोगों का देश की प्रगति में कोई योगदान नहीं है। वस्तुतः देश की आर्थिक प्रगति में गुजरातियों का सबसे बड़ा हाथ है।

जावेद अख्तर अल्फ़ाज़ों के अच्छे जादूगर हैं। हाल ही में उन्होंने एक बार फिर जादू दिखाया है। इस बार उन्होंने भारतीय सेना के कंधे पर कमान रखकर मोदी के तीर से संघ को निशाना बनाया है। अख्तर का कहना है कि नरेंद्र मोदी को भारतीय सेना में गुजराती रेजिमेंट बनानी चाहिए ताकि उसमें स्वयंसेवक भर्ती हो सकें।

जावेद अख्तर अपने इस कथन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘स्वयंसेवकों’ को निशाना बना रहे थे। लेकिन शायद उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि भारतीय सेना में रेजिमेंट सिस्टम अंग्रेज़ों का बनाया हुआ है। अंग्रेज़ों ने कुछ क्षेत्रों और जातियों के लोगों को ‘मार्शल कास्ट’ घोषित किया था। ब्रिटिश अधिकारी नस्लभेदी विचारधारा से ग्रसित होते थे इसीलिए कुछ क्षेत्र विशेष या जाति के लोगों के प्रति उनकी यह धारणा थी कि उस जाति के लोगों का जन्म युद्ध लड़ने के लिए ही हुआ है।

क्षेत्र और जाति विशेष के आधार पर ही अंग्रेज़ों ने सेना की इन्फैंट्री में रेजिमेंट बनाई थी। आज की भारतीय सेना एक मॉडर्न फ़ोर्स है और वह उस पुरातन औपनिवेशिक अवधारणा में विश्वास नहीं करती। हालाँकि रेजीमेंट सिस्टम आज भी हैं और प्रत्येक रेजिमेंट का अपना गौरवशाली इतिहास है। लेकिन यह भी सत्य है कि सेना में देश के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी एक रेजिमेंट नहीं है। और यदि किसी क्षेत्र या जाति के नाम पर रेजिमेंट नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस क्षेत्र अथवा जाति, समुदाय, पंथ के लोग हीन हैं। वास्तव में स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना ने यह निर्णय लिया था कि रेजिमेंट का नाम किसी क्षेत्र या समुदाय के नाम पर नहीं रखा जाएगा।

यदि भारतीय सेना में गुजरात रेजिमेंट नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि गुजराती लोगों का देश की प्रगति में कोई योगदान नहीं है। वस्तुतः देश की आर्थिक प्रगति में गुजरातियों का सबसे बड़ा हाथ है। सेना जहाँ देश की अखंडता सुनिश्चित करती है वहीं अर्थ जगत प्रगति का कारक है। सेना में गुजराती रेजिमेंट भले न हो लेकिन गुजराती लोग सेना में हैं और उनका पराक्रम किसी से कम नहीं है।

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जावेद अख्तर ने सेना में गुजरातियों के बहाने संघ के स्वयंसेवकों पर निशाना साधा है। नरेंद्र मोदी को यह सलाह देने से पहले कि आरएसएस के स्वयंसेवकों को सेना में लिया जाए अख्तर को अपनी योग्यता जाँच लेनी चाहिए थी। क्या जावेद अख्तर इस योग्य हैं कि वे प्रधानमंत्री को सलाह दें कि देश की सेना कैसे चलानी है? देश कोई एक व्यक्ति नहीं चलाता। यहाँ सेना, व्यवसायी, लेखक, पत्रकार, सिनेमा के लोग सबका योगदान होता है और एक प्रधानमंत्री को सबको साथ लेकर चलना होता है। वह किसी संगठन के लोगों को किसी दूसरे संस्थान का हिस्सा बनने पर मजबूर नहीं कर सकता।

जावेद अख्तर को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र में हर किसी का अपना काम होता है। एक गीतकार गाने लिखता है, सैनिक युद्ध लड़ता है, शिक्षक पढ़ाता है और प्रधानमंत्री शासन करता है। ऐसे में संघ का जो काम है वह संघ बखूबी समझता है और करता है। एक गाना लिखने वाला व्यक्ति जिसने कभी किसी संगठन की कमान नहीं संभाली वह क्या जानेगा कि आरएसएस कैसे काम करता है? क्या कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर किसी कलाकार को यह बता सकता है कि उसे अभिनय कैसे करना है?

जावेद अख्तर ने खुद को इतना काबिल कैसे मान लिया कि अब वह देश के प्रधानमंत्री को समझाएंगे कि सेना में फलाने रेजिमेंट होनी चाहिए? प्रधानमंत्री भी सेना से संबंधित निर्णय स्वयं नहीं लेते। सेना से संबंधित निर्णय लेने के लिए सेना से पूछा जाता है। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों तथा सेनाध्यक्ष की राय ली जाती है तब कोई निर्णय होता है। इसलिए जावेद साहब आप गाने लिखते हैं तो वही काम कीजिए। देश कैसे चलाना है यह शासन व्यवस्था पर छोड़ दीजिए।

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