Thursday, May 28, 2020
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जिसका भाग्य गधे के लिंग से लिखा गया हो… उसे कोई चीन या विदेशी मुसलमान काम नहीं आता (भाग-1)

इमरान खान कश्मीर का सपना देख सकता है क्योंकि भारत के कुछ नेता, कुछ पार्टियाँ और नैरेटिव चलाने वाले लोग पाकिस्तान के लिए, पाकिस्तान की भाषा में, छद्म शब्दों से भारत के टुकड़े होने की राह देख रहे हैं।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

पाकिस्तान की बात करें तो बहुत सारी चीजें याद आती हैं, उनमें से बहुत कम चीजें अच्छी हैं। ‘ब्लीडिंग इंडिया बाय थाउज़ेंड कट्स’ की नीति लेकर चलने वाले पाकिस्तान के बारे में एक बात तो तय रूप से कही जा सकती है कि ये ऐसी कौम है जो बहुत ही निःस्वार्थ भाव से काम करती है। पाकिस्तान के बारे में आप ये तो मान ही सकते हैं कि उन्होंने कभी अपना ख्याल किया ही नहीं, हमेशा यह देखा है कि घर में खाने को न हो, पूरे देश में बर्बादी फैली हो, वज़ीर कभी चीन को गधे बेच रहा हो, तो कभी अपने घर की भैंसों को, लेकिन इन सब में अपना स्वार्थ बिलकुल भी नहीं। जो भी किया भारत के लिए किया।

जिन्ना ने जब पाकिस्तान की बात उठाई थी, तभी पाकिस्तान का भविष्य भी तय हो गया था। मजहब के आधार पर देश को बाँटना ही उसका लक्ष्य था ताकि वो सत्ता पा सके। उस देश के बनने के बाद से उनका लक्ष्य कभी भी अपनी बेहतरी रहा ही नहीं, बल्कि उनका पूरा कुनबा इसी फिराक में रहा कि कैसे भारत को नुकसान पहुँचाया जाए। इन्होंने अपनी चिंता की ही नहीं, बल्कि अपना पैसा, अपने नागरिक, अपनी सेना, हर संसाधन को इस बात पर खर्च किया कि वो लोगों को यह ख्वाब बेच सकें कि कश्मीर उनका हो जाएगा।

ये बात कोई नहीं जानता कि कश्मीर लेकर पाकिस्तान क्या करेगा? वहाँ के लोग बस इसलिए खुश हैं कि ‘आपने देखा है कि वहाँ के लड़ाके जब मरते हैं तो उन्हें पाकिस्तानी झंडे में लपेटते हैं’। पाकिस्तानी बुद्धिजीवी इसी से खुश है कि कोई आतंकी पाकिस्तान के झंडे में लपेटा जाता है, जबकि अगर वो सही मायने में बुद्धिजीवी होता तो यह भी सोचता की उसकी भवों के बीच गोली डालने वाली सेना कहाँ की है जो साल में दो सौ आतंकियों को निपटा रही है।

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इनकी मूर्खता आप देखिए कि खुद खाने के लाले पड़े हैं और चाहते हैं कि कश्मीर ले कर उन्हें भी अपने जैसा बना देंगे। यही तो खिलाफत है कि खलीफा के शासन में सारे मुसलमान सिर्फ इसलिए खुश रहें कि अब तो हम इस्लामी खिलाफत में हैं और शरिया कानून है यहाँ। वो रुक कर ये तक नहीं सोचते कि ऐसे शासन में उनका जीवन स्तर क्या होगा? उनका जीवन स्तर क्या होगा, उसका नमूना आईसिस ने सीरिया में दिखा दिया है। जिसको वो जीवन सही लगता है, वो बेशक जिहाद की राह पर निकल जाए।

ठेठी में एक कहावत है कि ‘खाय क खर्ची नै, डेहरी पर नाच’। इसका अर्थ यह होता है कि खाने के पैसे नहीं हो और चाहते हैं कि घर के आगे नाच का प्रोग्राम रखा जाए। पाकिस्तान के साथ यही समस्या है। पाकिस्तान के साथ-साथ काफी हद तक दुनिया के मुसलमानों की भी यही समस्या है। भारत से बाहर के देशों को देखिए कि वहाँ के मुसलमान कश्मीर पर क्या रिएक्शन दे रहे हैं। एक संस्था है ‘ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कन्ट्रीज़’। कश्मीर का मसला भारत का है, कुछ हद तक पाकिस्तान का क्योंकि हमारे देश के बाप-दादाओं ने कुछ मूर्खताएँ की थीं, हम भोग रहे हैं।

अब आप यह सोचिए कि इन देशों को कश्मीर को लेकर कष्ट क्यों हो रहा है? आखिर जब यूएन सिक्योरिटी काउंसिल की अध्यक्षा ने इस पर कमेंट करने से मना कर दिया तो फिर मुसलमान देशों के समूह के स्थान विशेष में दर्द क्यों उठ रहा है? वेल… क्योंकि वो समूह मुसलमान देशों का है। मसले से जगह, यानी कश्मीर, गायब हो चुका है, ये मसला मुसलमानों का हो गया है। उन्हीं मुसलमानों का जो लहसुन-ए-हिन्द और नारा-ए-बुलशिट चिल्लाते हुए आईसिस और तमाम आतंकी संगठन बना कर पूरी दुनिया को इस्लामी शासन के भीतर लाने का ख्वाब देखते हैं।

और जब ये खिलाफत स्थापित भी हो जाएगी तो क्या होगा? वही होगा जो यजीदी महिलाओं के साथ हुआ। आईसिस के मुसलमान आतंकी, जो रात में बलात्कार करते हैं, और दिन में उन महिलाओं को कहते हैं कि वो बुर्के में रहें क्योंकि बाहर के दूसरे मर्द देख लेंगे! ये शासन कैसा होगा? ये शासन वैसा ही होगा जहाँ पाकिस्तान जैसे मुल्कों में नेशनल टीवी पर, अपने होशो-हवास में पैनलिस्ट कहते हैं कि पाकिस्तान को लाखों मुजाहिद्दीन, मिलिटेंट भारत की धरती पर भेजना चाहिए, और एंकर कहता है कि क्या इतना ह्यूमन रिसोर्स है पाकिस्तान के पास? मतलब, आतंकियों को भेजने की बात वहाँ की मीडिया से लेकर बुद्धिजीवी तक इतनी आसानी से कहते हैं जैसे ये एक सामान्य सी बात हो।

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जब देश का पीएम ही घोड़े की लीद चिलम में भर कर पीता है, क्योंकि आप मानें या न मानें, इमरान खान और उसके देश की हालत लीद सुखा कर पीने लायक ही बची है, तो फिर टीवी पर डिबेट में खुल्लमखुल्ला आतंकियों को तैयार कर भारत में भेजने की बातें क्यों नहीं होंगी? ये है पाकिस्तान जिसका मसला पाकिस्तान कभी रहा ही नहीं, वरना कश्मीर के मुसलमानों की छोड़ कर अपने देश के मुसलमानों की हालत में सुधार ले आता।

पाकिस्तान का पीएम, जिसे कि दुनिया उधार न दे तो शायद इमरान खान अपनी चौथी बीवी के लिए ढंग का बुर्का न सिलवा पाए, वो संसद में पूछता है कि क्या भारत पर हमला बोल दिया जाए? इसी पर मुझे राजकुमार की फिल्म से एक डायलॉग याद आता है कि ‘छिपकली अगर तैरना सीख जाए तो वो मगरमच्छ नहीं बन जाता’। पाकिस्तान वो बंदर है जिसके हाथ में उस्तरा है और इसकी प्रबल संभावना है कि वो अपना ही अंग विशेष एक दिन उसी उस्तरे से काट लेगा।

भारत के लिए घृणा फैला कर ही पाकिस्तान में सत्ता पाई जाती है। अगर वहाँ के नागरिकों को भारत का डर न दिखाया जाए तो सेना और आईएसआई की मनमानी चल नहीं पाएगी। भारत को गाली देना पाकिस्तान की मजबूरी है क्योंकि वहाँ की जनता को इसी से मतलब है पाकिस्तान ने एटम बम सजाने के लिए नहीं रखे हैं। लेकिन जनता ये नहीं जानती कि उसके पीएम को अगर रोटी, नान और टिमाटर का दाम तय करने के लिए आला अधिकारियों की मीटिंग बुलानी पड़ती है, तो उस मुल्क के साथ बहुत बड़ी दिक्कत है।

जनता ये नहीं जानती कि अगर वो टेरर फायनेंसिंग के मामले में अगर ब्लैक लिस्ट हो जाएँगे तो कैबिनेट की मीटिंग इस बात के लिए भी बुलानी पड़ सकती है कि चीन वालों को पाकिस्तानी सेना के जवानों के शरीर का कौन सा हिस्सा बेचना सही रहेगा। आप सब जानते हैं कि पाकिस्तान कौन सा अंग ऑफर करेगा, और यह भी कि चीनियों को शायद उसमें कोई रुचि नहीं होगी।

हमारी प्यारी कॉन्ग्रेस

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वहाँ की मीडिया में एक और गजब की बात देखने को मिलती है। वहाँ की चर्चाओं में पैनलिस्ट और एंकर दोनों ही इस बात से खुश होते रहते हैं कि भारत की पार्टियाँ, मीडिया का एक हिस्सा और बुद्धिजीवी मोदी के साथ नहीं हैं। यूट्यूब पर जाइए और सर्च कर लीजिए, वहाँ आपको ऐसे वीडियो मिल जाएँगे जहाँ वो ये कहते मिल जाएँगे कि पूरा भारत इस मुद्दे पर साथ नहीं है और पाकिस्तान को इससे फायदा हो सकता है। वो नाम लेकर कहते हैं कि कॉन्ग्रेस पार्टी, राहुल गाँधी समेत भारत की मीडिया, कम्यूनिस्ट पार्टियाँ मोदी के इस फैसले के साथ नहीं है।

लेकिन ऐसा सोचने में पाकिस्तानियों की कोई गलती नहीं है क्योंकि यहाँ एनडीटीवी जैसे समूह हैं जो कश्मीर को ‘इंडिया अकुपाइड कश्मीर’ लिखने से नहीं हिचकिचाते। यहाँ कॉन्ग्रेस पार्टी है जिसके परनाना ने कहा था कि 370 का मसला अस्थाई है और ये घिसते-घिसते घिस जाएगा लेकिन पाँच दशक के शासन के बावजूद कॉन्ग्रेसियों के हलक से थूक सूख गया लेकिन वो 370 को घिस नहीं सके। एक पार्टी जो लगातार चुनाव हार रही है, आंतरिक कलह से जूझ रही है, जहाँ नेतृत्व का संकट है, उसे इस क्षण में भी यह नहीं दिख रहा है कि भारत की जनता क्या चाहती है।

मुट्ठी भर वोट के लिए कॉन्ग्रेस को देश का मूड नहीं दिख रहा कि लोग क्या चाहते हैं। इस कारण ये लोग अपनी ही पार्टी में इस मुद्दे पर बिखरे हुए दिख रहे हैं। इसका स्वतः लाभ तो भाजपा को मिलेगा ही, लेकिन कॉन्ग्रेस यह नहीं देख पा रही कि पाकिस्तान के चैनलों, ट्विटर हैंडलों आदि पर उसका नाम लगातार लिए जाने को भारत की आम जनता कैसे देखती है। उसकी एक नकारात्मक छवि बनती जा रही है कि ये लोग न सिर्फ देश को बर्बाद करने वाले हैं, बल्कि ये तो पाकिस्तान जो चाहता है, उसी की बात, उसी की भाषा में भारत में बैठ कर कर रहे हैं।

कश्मीर को लेकर मीडिया में प्रोपेगेंडा और ‘पाक अकुपाइड पत्रकार’

कश्मीर में पाकिस्तान समेत भारतीय नक्सली और आतंकियों के हिमायतियों, देशविरोधी शक्तियों ने मानवाधिकारों के हनन से लेकर तमाम तरह की खबरें फैलाने की कोशिश की, लेकिन दूसरे धड़े के सजग रहने के कारण, वो प्रोपेगेंडा काफी हद तक चल नहीं पाया। आप सोचिए कि पाकिस्तान को बहुत कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है, यहाँ उसके लिए, भारत की ही खाने वाले, लगातार उसका काम कर रहे हैं।

यहाँ के पार्टियों और बुद्धिजीवियों को अब भारत की ही जनता गंभीरता से नहीं लेती। चाहे वो पाकिस्तान के इशारे पर लिख रहे हों या खुद ही अंतरात्मा बेच कर ‘राष्ट्र’ की अवधारणा से ऊपर दुश्मन राष्ट्र के संघर्ष को मजबूती प्रदान कर रहे हों, उनका मुकाबला नरेन्द्र मोदी से है जिसने अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भारत का कद ऐसा कर दिया है कि उसकी सहमति के बगैर बोलने पर ट्रम्प तक को अपनी बात वापस लेनी पड़ती है। इसलिए दो-चार डॉलर लेकर विदेशी अखबारों में लेख लिखने वाले पत्रकारों को, टीवी पर मुस्कुराते हुए वाहियात बातें करने वाले एंकरों को देखते बहुत हैं, लेकिन अधिकतर बस ये देखते हैं कि उनकी जमीन भारत में है, या वो मानसिक तौर पर ‘पाक अकुपाइड पत्रकार’ बन चुके हैं।

अजित डोभाल के कश्मीर में होने, और एक भी बड़ी हिंसक घटना के न होने पर यह माना जा सकता है कि वहाँ स्थिति नियंत्रण में है, और सरकार कश्मीरियों का विश्वास जीतने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। मीडिया और सोशल मीडिया पर झूठी खबरें फैलाई गईं, जो कि भारत के लिए थी भी नहीं। उन लोगों ने सीधे यूएन ह्यूमन राइट्स कमीशन को टैग करके प्रपंच फैलाया कि कश्मीरियों को सताया जा रहा है, सेना गोलियाँ चला रही हैं।

इन बातों को लेजिटिमेसी किसने दी? शाह फैजल जैसे लम्पटों ने, जिसका राजनैतिक करियर शुरु होने से पहले ही शीघ्रपतन का शिकार हो गया। दुर्भाग्य यह है कि वो इलाज कराने अलीगढ़ के हाशमी दवाखाने तक भी नहीं आ सकता। फैजल जैसे लोगों ने लिखा कि कश्मीरियों की जमीन छीन ली गई है! जबकि वो अच्छे से जानता है कि जमीन अगर किसी ने छीनी भी है तो वो पाकिस्तान के कब्जे में है। दूसरी बात, जो आईएएस रह चुके फैजल को पता नहीं होगी, वो यह है कि जो जिसका है ही, उसे वो छीन नहीं सकता। कश्मीर हमारा है, और उसके चाहने से वो पाकिस्तान के साथ नहीं दिया जा सकता क्योंकि उसे यह लगता है कि उसके कुछ बाप-चाचा सीमा के उस पार हैं।

इन्हें लगा था कि पत्थरबाजी करवा कर, मीडिया में बयानबाजी करते हुए ये भारत की छवि बर्बाद करने की कोशिश करेंगे और फिर किसी तरह मोदी-शाह को झुकना पड़ेगा। लेकिन इनका दुर्भाग्य यह है कि अलगाववादियों के पास अब पाकिस्तानी रुपए नहीं हैं। पत्थरबाज मूर्ख जरूर होते हैं, लेकिन फ्री में वो पत्थर नहीं फेंकने वाले क्योंकि इस बार गृह मंत्री अमित शाह हैं, और सेना ने कश्मीरी माँ-बापों को बता दिया है कि आतंकियों में 83% वैसे लोग होते हैं जिनका पत्थरबाजी की इतिहास रहा है, और उनमें से दो तिहाई साल भर के भीतर कुत्ते की मौत मारे जाते हैं। तो, हर बार की तरह सेना इन पत्थरबाजों को छोड़ ही देगी, ऐसा नहीं लगता।

दूसरा और अंतिम भाग यहाँ पढ़ें: क्या बदल गया है ‘हज़ार जख्म दे कर मारेंगे’ से कराची वालों के ‘अल्ला खैर करे’ तक? (भाग-2)

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