Thursday, January 21, 2021
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भय बिनु होय न प्रीत: ड्रैगन को सामरिक और आर्थिक तरीकों से एक साथ घेरना ही उचित रास्ता

चीन जैसे खलों के बारे में ही गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरित मानस' में लिखा है: "विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीत। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत।"

हाल ही में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गलवान घाटी में अतिक्रमण को लेकर भारत और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक भिड़ंत हुई। भारतीय सेना ने इस सशस्त्र झड़प में बिहार रेजीमेंट के 20 सैनिकों के शहीद होने की पुष्टि की है। वहीं, दूसरी ओर चीनी पक्ष के भी 43 सैनिकों के हताहत होने की सूचना है। इससे जाहिर होता है कि चीन ऐसे समय में भी आक्रामक तेवर अपना रहा है, जबकि सारी दुनिया उसी के द्वारा फैलाई गई कोरोना नामक महामारी जैसे एक बड़े संकट का सामना कर रही है।

पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों द्वारा की गई बर्बरता भारत और चीन के बीच 1993, 1996, 2003 और 2005 के द्विपक्षीय समझौतों का उल्लंघन है। इन समझौतों में सीमा पर शांति और सौहार्द बनाए रखने की बात कही गई है। यही बात 2018 में हुए वुहान और 2019 में हुए चेन्नई शिखर सम्मेलन में भी दुहराई गई है।

1962 में भी पंचशील समझौते का उल्लंघन करके चीन ने अपनी बदनीयती का परिचय दिया था। अब यह बात एक बार फिर सिद्ध हो गई है कि चीन एक अविश्वसनीय और अवसरवादी पड़ोसी है और उसके लिए आपसी समझौते, शांति और सौहार्द कोई मायने नहीं रखते हैं।

जिस प्रकार 1962 में भारतीय सैनिकों पर एलएसी का अतिक्रमण करने के चीन के आरोपों को खारिज करते हुए भारत ने साफ कर दिया है कि तनाव कम करने के लिए वह बातचीत को तो राजी है, मगर चीन की ऐसी हरकतों का माकूल जवाब देने में भी सक्षम है। स्पष्ट है कि भारत सीमा विवाद सुलझाने के लिए चीन के सैन्य दबाव के सामने झुकने को कतई तैयार नहीं है और विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेष रूप से तैयार है।

यह एक स्थापित और सर्वज्ञात सत्य है कि सीमा विवाद और तदजन्य संघर्ष चीनी विस्तारवाद की रणनीति है। वह अंधाधुंध पूंजीनिवेश और अपार सैन्यबल के बलबूते अपनी विस्तारवादी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना चाहता है।

चीन की इस परोक्ष आक्रमण की नीति के प्रति आगाह करते हुए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 19 अक्टूबर, 1960 के “पांचजन्य” में लिखा था-

“आज हमारे पड़ोसी चीन ने हमारी प्रभुता को चुनौती दी है। यह सत्य है कि उसने यह चुनौती स्पष्ट युद्ध की घोषणा करके नहीं दी है तथा हमारे उसके साथ सभी तरह के दौत्य संबंध पूर्ववत बने हुए हैं। किंतु इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि चीन ने आक्रमण किया है।”

आज एक बार फिर वैसी ही स्थिति बन गई है। इसलिए चीन की आर्थिक और सामरिक शक्ति से डरने की नहीं बल्कि उसकी आँख में आँख डालकर बात करने की आवश्यकता है। भारत की वर्तमान सरकार ने भी यही रुख अख्तियार किया है।

आज चीन दूसरी विश्वशक्ति है। उसके विस्तारवाद और दबाव का सफल प्रतिरोध विश्व बिरादरी में भारत की छवि को मजबूत करते हुए उसकी अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को मजबूत आधार प्रदान करेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने गतिरोध के बीच स्वयं लद्दाख जाकर भारत के मजबूत इरादों का खुलासा कर दिया है।


वैसे तो चीन का भारत के साथ सीमा-विवाद कोई नई और अनोखी बात नहीं है। डोकलाम प्रकरण भी पुरानी बात नहीं है। मगर पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा अपने सीमाई क्षेत्रों में सड़क, पुल, मोबाइल टॉवर और हवाई पट्टी आदि के निर्माण में विशेष तेजी दिखाई गई है।

ऐसी ढाँचागत परियोजनाओं को लेकर जो सक्रियता और सजगता दिखाई गई है, उससे पड़ोसी देश चीन बौखला गया है। इसलिए अभी उसका उद्देश्य भारत के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण गलवान घाटी में भारत की सड़क विकास परियोजना को पूरा होने से रोकना है ताकि वह भारत पर अपनी सामरिक बढ़त बनाए रख सके।

चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया है कि विवादित क्षेत्र में भारत द्वारा किए जा रहे रक्षा निर्माण कार्यों के विरुद्ध सीमा नियंत्रण की कार्रवाई की गई है। दरअसल, भारत चीन सीमा-विवाद की असल वजह क्षेत्र विशेष में बनाई जा रही सड़क मात्र नहीं, बल्कि भारत का एशियाई एवं वैश्विक राजनीति में तेजी से बढ़ता कद है।

भारत की यह उपलब्धि चीन के लिए असहनीय है क्योंकि वह एशिया महाद्वीप की एकमात्र महाशक्ति बना रहकर अपने वर्चस्व का स्थायित्व चाहता है। इस बात की पुष्टि प्रभावशाली अमेरिकी थिंक टैंक हडसन इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट करती है जिसमें दावा किया गया है कि दक्षिण एशिया में चीन का तात्कालिक लक्ष्य विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की हर प्रकार की चुनौती को सीमित करना और अमेरिका के साथ उसकी तेजी से मजबूत होती साझेदारी को बाधित करना है।


चीन का असीम आर्थिक विकास उसके भू-राजनीतिक विस्तारवाद का प्रमुख अस्त्र है। आर्थिक सुधारों के बाद से चीन सबसे ज्यादा तेजी से आर्थिक वृद्धि कर रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि इस रफ्तार से बढ़ते हुए वह जल्दी ही दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति अमेरिका से भी आगे निकल जाएगा।

आर्थिक स्तर पर अपने पड़ोसी देशों से जुड़ाव के चलते चीन पूर्वी एशिया के आर्थिक विकास का इंजन जैसा बना हुआ है और इस कारण क्षेत्रीय मामलों में उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया है। इस चिंता को ध्यान में रखते हुए अमेरिका ने भारत, आस्ट्रेलिया एवं जापान के साथ मिलकर एक चतुष्कोणीय गठबंधन तैयार किया है।


1949 में माओ के नेतृत्व में हुई साम्यवादी क्रांति के बाद चीन ने अर्थव्यवस्था के साम्यवादी माॅडल को अपनाया। इस माॅडल में चीन ने औद्योगिक अर्थव्यवस्था का आधार खड़ा किया। विदेशी मुद्रा की कमी के कारण चीन ने आयातित सामानों को धीरे-धीरे घरेलू स्तर पर ही तैयार करवाना शुरू किया। चीनी नेतृत्व ने 1970 के दशक में कुछ बड़े निर्णय लिए। 1973 में चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई ने कृषि, उद्योग, सेना और विज्ञान प्रौद्योगिकी के चार महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे।

1978 में चीन के तत्कालीन नेता देंग श्याओपेंग ने चीन में आर्थिक सुधारों की शुरुआत करते हुए “खुले द्वार की नीति” की घोषणा की। चीन ने ‘शाॅक थेरेपी’ के बजाय अपनी अर्थव्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से निवेश के लिए खोला। नई आर्थिक नीतियों के कारण उद्योग और कृषि दोनों ही क्षेत्रों में चीन की वृद्धि दर काफी तेज रही है।

व्यापार के नए उदारवादी कानूनों तथा विशेष आर्थिक क्षेत्रों के विकास के परिणामस्वरूप चीन पूरे विश्व में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए सबसे आकर्षक देश बनकर उभरा है। उल्लेखनीय आर्थिक वृद्धि करने वाले चीन के पास विदेशी मुद्रा का अपरिमित कोष है और इसी के बल पर वह दूसरे छोटे-बड़े देशों में व्यापक स्तर पर आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक निवेश में जुटा हुआ है।

चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल हो गया और इस संगठन के कमजोर कानूनों, सस्ते श्रम और कुशल एवं सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था के कारण उसने विश्वभर के बाजारों को चीनी सामानों से पाट दिया है।

अब चीन की योजना विश्व अर्थव्यवस्था से अपने जुड़ाव को और सशक्त और प्रभावशाली बनाने की है ताकि भविष्य में वह विश्व-व्यवस्था को मनचाहा स्वरूप दे सके। इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते हुए चीन अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना “वन बेल्ट, वन रोड” को धरातल पर उतारने की कोशिश में लगा है।

इस परियोजना के माध्यम से चीन दुनिया की लगभग साठ फीसद आबादी को अपने साथ जोड़ने की जुगत में है, जिससे स्वयं द्वारा नियंत्रित एक सशक्त ग्लोबल सप्लाई चेन तैयार की जा सके और संबंधित देशों की निर्भरता सुनिश्चित की जा सके। इस संदर्भ में चीन द्वारा अप्रैल, 2017 में एक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें 29 देशों के राष्ट्राध्यक्ष, 70 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख, दुनिया भर के 100 मंत्रिस्तरीय अधिकारी और विभिन्न देशों के 1200 प्रतिनिधिमंडल शामिल हुए थे।

अमेरिका और पाकिस्तान भी इसमें शामिल हुए परन्तु भारत ने इस पर अपनी आपत्ति दर्ज की थी। दरअसल, चीन द्वारा निर्मित किया जा रहा ‘चाइना पाकिस्तान इकोनोमिक काॅरिडोर’ पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजर रहा है जोकि भारत का अभिन्न अंग है। इसलिए भारत का स्पष्ट मत है कि चीन का यह कदम भारत की संप्रभुता एवं अखंडता का उल्लघंन कर रहा है।

उल्लेखनीय है कि यदि चीन “वन बेल्ट, वन रोड” रूपी अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को अमलीजामा पहनाने में सफल होता है तो दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा और यह भारत के लिए हानिकारक सिद्ध होगा।

दबाव और लालच की राजनीति करते हुए चीन भारत के पड़ोसी देशों में भारी निवेश कर रहा है। इसका ताजा उदाहरण – नेपाल द्वारा भारतीय विरोध के बावजूद तीन भारतीय क्षेत्रों- लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियुधरा को संवैधानिक संशोधन के माध्यम से अपने देश के नक्शे में शामिल किया जाना है। चीन म्यांमार और श्रीलंका में बंदरगाह बनाने में भी भारी निवेश कर रहा है। इसी प्रकार वह भारत के एक और पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी अपनी पैठ बनाने के लिए प्रयासरत है।

चीन द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा का लगातार उल्लघंन किया जा रहा है। चीन ने विश्व के अधिकांश देशों के साथ सीमा विवाद सुलझा लिया है जबकि भारत के साथ यह विवाद अभी भी बना हुआ है। चीन विश्व के समक्ष यह प्रदर्शित करना चाहता है कि सीमा विवाद का समाधान न हो सकने का मूल कारण भारत है।

भारत चाहता है कि सीमा का समाधान सेक्टर के अनुसार होगा, वहीं चीन पैकेज डीलिंग पर बल दे रहा है। चीन अरुणाचल प्रदेश सहित 90,000 वर्ग किमी भारतीय क्षेत्रफल पर अपना दावा प्रस्तुत कर रहा है। इससे स्पष्ट है कि चीन जानबूझकर सीमा विवाद को सुलझाना नहीं चाहता ताकि वह भारत पर निरंतर सामरिक दबाव बनाए रख सके।

चीन का लंबे समय से आसियान देशों जिनमें वियतनाम, ब्रूनेई, फिलीपींस और मलेशिया आदि हैं, के साथ दक्षिण चीन सागर में स्थित स्पार्टले और पारासेल द्वीप को लेकर विवाद चल रहा है। चीन ने इन एशियाई देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्र में अतिक्रमण कर वहां अपनी संप्रभुता के दावों के लिए 9 स्थानों पर डैश लगाकर विवाद बढ़ा दिया है।

दरअसल, चीन दक्षिण चीन सागर में पाए जाने वाले प्राकृतिक संसाधनों, प्राकृतिक तेल, गैस, मत्स्य संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है। इन द्वीपों पर नियंत्रण कर चीन अपने आर्थिक प्रभाव और क्षेत्र का विस्तार करना चाहता है।

इस विवाद के कारण अनन्य आर्थिक क्षेत्र का निर्धारण नहीं हो पा रहा है। चीन के द्वारा दक्षिण चीन सागर में स्थित द्वीपों में सैनिक अड्डे के निर्माण का भी प्रयत्न किया जा रहा है और चीन ने इन द्वीपों पर एक हवाई पट्टी भी बनाई है।

हाल ही में दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ मिलकर अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र से अपील की है कि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय द्वारा दक्षिण चीन सागर के विवाद पर फिलीपींस के पक्ष में दिए गए निर्णय का त्वरित क्रियान्वयन होना चाहिए। इस मामले में न्यायालय के निर्णय की अवहेलना करके चीन हठधर्मिता के साथ दावा कर रहा है कि यह समुद्री क्षेत्र का विवाद नहीं है, बल्कि चीन की भौगोलिक संप्रभुता का मुद्दा है, जिस पर न्यायाधिकरण निर्णय नहीं दे सकता है।

चीन ने नवंबर, 2013 में पूर्वी चीन सागर में अपना पहला एयर डिफेंस आइडेंटिटी जोन बनाकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक बार फिर अपना दबदबा दिखाने की कोशिश की है। उसने इस जोन में न सिर्फ विवादों से घिरे सेंकाकू द्वीप समूह के साथ जापान, दक्षिण कोरिया तथा फिलीपींस के वायु निषेध क्षेत्रों को शामिल किया है, बल्कि विदेशी विमानों के लिए प्रवेश के कड़े नियम कानून भी जारी किए हैं। यह चीन की मनमानी है। दरअसल, धौंसपट्टी और भू-क्षेत्रों को हड़पने की चीन विस्तारवादी नीति से उसके लगभग दर्जन भर पड़ोसी देश उत्पीड़ित हैं।

पाकिस्तान द्वारा चीन को सर्वाधिक वरीयता वाले राज्य का दर्जा दिया गया है। चीन के द्वारा पाकिस्तान में बड़ा निवेश किया जा रहा है। चीन, पाकिस्तान का बचाव अपनी वीटो पावर के बल पर सुरक्षा परिषद में भी करता है। चीन द्वारा गिलगिट, बाल्टीस्तान क्षेत्र में सेना की तैनाती भारतीय सुरक्षा के लिए एक नवीन चुनौती है। कराकोरम राजमार्ग के माध्यम से चीन अपनी सामरिक स्थिति को और सुदृढ़ कर रहा है।

भारत को घेरने के लिए चीन के द्वारा पाकिस्तान के ग्वादर पत्तन का विकास किया गया है ताकि ग्वादर पत्तन से पाकिस्तान को चीन से जोड़ा जा सके। वर्तमान में चीन द्वारा दक्षिण एशिया में भारत को घेरने के लिए पड़ोसी कार्ड की नीति अमल में लाई जा रही है जो भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ एवं ‘नेबरहुड फर्स्ट’ की नीति के लिए संकट का कारण बन सकती है।

वर्तमान में अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक और सामरिक संबंधों का तेजी से विकास हो रहा है और वह भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक और सामरिक सहयोगी बन रहा है। अमेरिका द्वारा चीन को हथियारों का निर्यात नहीं किया जाता। इसीलिए चीन और अमेरिका के बीच सामरिक संबंध नगण्य हैं। अमेरिका की भारत के साथ बढ़ती निकटता से पैदा हुई बौखलाहट के कारण चीन द्वारा सीमा विवाद के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया जा रहा है और वह भारत पर दबाव बनाना चाहता है।

अमेरिका द्वारा भारत को साथ लेकर चीन को प्रतिसंतुलित करने की नीति अपनाई जा रही है। भारत अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों के साथ समानांतर संबंध विकसित करना चाह रहा है परंतु इस स्थिति में भारत को अवसर का लाभ उठाते हुए अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत बनाकर चीन के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद करना चाहिए ताकि चीन को यह अहसास कराया जा सके कि भारत देशकाल के अनुरूप अपनी परंपरागत सॉफ्ट डिप्लोमेसी को एग्रेसिव डिप्लोमेसी में भी बदलना जानता है।

भारत और चीन दोनों की अर्थव्यवस्थाएं प्रतिस्पर्धी हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार में दोनों काफी हद तक समान वस्तुओं का निर्माण और निर्यात करते हैं। परंतु चीन से आयातित सस्ती वस्तुओं से भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। चीन वर्तमान में भारतीय उत्पादों का तीसरा बड़ा निर्यात बाजार है। वहीं, चीन वस्तुओं का भारत सबसे ज्यादा आयात करता है और भारत चीन के लिए एक सर्वाधिक संभावनाशील बाजार है। यहाँ सस्ते चीनी उत्पादों के उपभोक्ताओं की बड़ी भारी संख्या है।

चीन से भारत मुख्यतः इलेक्ट्रिक उपकरण, मेकेनिकल सामान, कार्बनिक रसायनों आदि का आयात करता है। वहीं, भारत से चीन को मुख्य रूप से खनिज ईंधन और कपास आदि का निर्यात किया जाता है। भारत में चीनी टेलीकॉम कंपनियाँ और चीनी मोबाइल का मार्केट बहुत बड़ा है। यहाँ तक कि चीन की कंपनी शंघाई अर्बन ग्रुप काॅर्पोरेशन दिल्ली मेट्रो का भी काम कर रही है।

भारत का थर्मल पावर एवं सोलर मार्केट चीनी उत्पादों पर निर्भर है। दवाओं के लिए कच्चे माल की प्राप्ति के लिए भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर है जिसका दुखद परिणाम कोरोनाकाल में लाॅकडाउन के कारण चीन से कच्चे माल की आपूर्ति न हो सकने के कारण दवाओं के उत्पादन एवं आपूर्ति में कमी और यकायक हुई मूल्य वृद्धि के रूप में देखा गया। इस समस्या से शीघ्र छुटकारा प्राप्त किए जाने की आवश्यकता है। वरना भविष्य में भारत को गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

भारत चीन द्विपक्षीय व्यापार के संदर्भ में वर्ष 2019 में भारत ने चीन से 75 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात किया था जबकि इस दौरान भारत ने चीन को सिर्फ 18 अरब डॉलर की वस्तुओं का निर्यात किया। स्पष्ट है कि भारत को 57 अरब डाॅलर के व्यापार घाटे का सामना करना पड़ा। इससे बचने के लिए भारत को चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता कम करनी होगी। इसके लिए घरेलू स्तर पर कच्चे माल की उपलब्धता के साथ उत्पादक गतिविधियों को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है।

भारत को तत्काल नई औद्योगिक इकाइयाँ लगाने और व्यापार करने के नियमों को सरल बनाने की आवश्यकता है। नौकरशाही और लालफीताशाही जनित लेटलतीफी और अव्यवस्था को भी दूर किया जाना चाहिए। यह एक चिंतनीय प्रश्न है कि भारत में श्रम सस्ता होने के बावजूद उत्पादन लागत चीन के मुकाबले इतनी अधिक क्यों है ?

यह सर्वविदित है कि डब्लूटीओ के अधीन भारत चीनी या अन्य किसी देश की वस्तुओं के आयात पर प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंध नहीं लगा सकता है, परन्तु परोक्ष रूप से आयात शुल्कों में वृद्धि करके या सुरक्षा मानकों के आधार पर ऐसी प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

गौरतलब है कि दिसंबर, 2010 में भारत द्वारा चीन से आयातित दूध और दूध से निर्मित अन्य वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, क्योंकि चीनी दूध में मोलामिन नामक पदार्थ से कई चीनी बच्चों की मृत्यु हो गई थी। चीनी वस्तुओं के आयात और उपयोग के सामरिक प्रभावों के विषय में भारतवासियों में जागरूकता पैदा किया जाना अति आवश्यक है।

स्वदेशी उत्पादों का अधिकाधिक उपयोग चीन के सामरिक सामर्थ्य को क्रमशः कमजोर करेगा। स्वदेशी, स्वावलंबन और संकल्प चीन के आर्थिक वर्चस्व और क्रमिक विस्तारवाद का सबसे कारगर इलाज है।

सरकार को इस दिशा में व्यापक विचार-विमर्श करके ठोस पहल करनी चाहिए ताकि वर्षों पुरानी इस समस्या का समाधान करके भारत की आत्मनिर्भरता के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा को दूर किया जा सके। वस्तुतः आर्थिक आत्मनिर्भरता ही चीन की सामरिक हेकड़ी का सही और समीचीन जवाब है।

चीन जैसे खलों के बारे में ही गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरित मानस’ में लिखा है:

“विनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीत। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत।”

अपनी सामर्थ्य के तीव्र विकास, अन्य पड़ोसी देशों के साथ विश्वसनीय मैत्री-संबंध और चीन के विस्तारवाद से त्रस्त देशों के साथ गठजोड़ बनाकर ही भारत चीन की चुनौती से निपट सकता है।

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प्रो. रसाल सिंह
प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

 

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