Sunday, December 6, 2020
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बिहार: घटिया जातिवादी गणित को सोशल इंजीनियरिंग कहने से वो सही नहीं हो जाता

जनता तो जनता है, बरगलाने वाले बरगला ले जाते हैं। ग़रीब, मासूम और आम जनता को क्या पता कि जाति के ये स्वघोषित ठेकेदार उनके काम नहीं आने वाले, काम आएगी एक अच्छी सरकार और एक अच्छी नीतियों वाला प्रधानमंत्री।

बिहार में इस बार चुनावों के दौरान कुछ ऐसा देखने को मिला, जो न सिर्फ़ जाति प्रथा को बढ़ावा देता है बल्कि एक देश के तौर पर, एक राष्ट्र के रूप में हमारी एकता पर भी सवाल खड़े करता है। मामला कुछ यूँ है कि जाति A हमेशा से अपनी जाति के उम्मीदवार को ही वोट देते हैं और जाति B ने भी अपने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनानी शुरू कर दी, बिना यह देखे कि व्यक्ति अच्छा है या फिर बुरा। जब जाति B के समाज के कुछ अच्छे लोगों ने यह समझाने की कोशिश की कि जातिवाद ग़लत है तो जाति B के लोगों का तर्क था कि चूँकि जाति A के लोग जातिवाद कर रहे हैं, अपनी जाति के उम्मीद्वार को वोट कर रहे हैं, इसीलिए हम जाति B के लोग भी ऐसा ही करेंगे। अर्थात, इनका सीधा अर्थ यह था कि अगर कोई अन्य समाज ग़लत कर कर रहा है तो हम भी ग़लत करेंगे। इस जातिवादी राजनीति के विस्तार और पोषण में व्हाट्सप्प और फेसबुक ग्रुप्स का अहम योगदान रहा है।

जैसे यहाँ हम एक क्षेत्र के तौर पर मोतिहारी का उदाहरण लेते हैं, क्योंकि चुनाव संपन्न हो गया है और मैंने सभी दलों, नेताओं, प्रत्याशियों, स्वघोषित जाति के ठेकेदारों और टुटपुंजिया नेताओं से लेकर सजग युवाओं तक के अब तक के फेसबुक पोस्ट्स, गली-नुक्कड़ के क्रियाकलापों और शेखियों को करीब से देखा है। अतः, मैं अब एक अंतिम विश्लेषण रखने में ख़ुद को सक्षम मानता हूँ। इन सभी वर्णित महानुभावों के प्रचार अभियान, दुष्प्रचार प्रोपेगंडा और नारावीरता सहित सभी पक्षों के गहन अध्ययन के बाद प्रस्तुत है कुछ कड़वी सच्चाइयाँ। यहाँ एक तरफ़ पूर्व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री अखिलेश सिंह के बेटे 27 वर्षीय आकाश सिंह उम्मीदवार थे तो दूसरी तरफ़ वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह।

चूँकि, यहाँ बात जातिवादी अभियानों की पोल खोलने के लिए हो रही है और हम किसी भी प्रकार से जातिवाद को बढ़ावा नहीं देते। लेकिन, फिर भी हमें यहाँ जाति की बात करनी पड़ेगी और उम्मीदवारों की जाति भी बतानी पड़ेगी। अखिलेश सिंह भूमिहार हैं और बिहार कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं। राधा मोहन सिंह राजपूत हैं और बिहार भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। चूँकि, मैं भूमिहार जाति से आता हूँ, मैं किसी अन्य जाति का उदाहरण नहीं लूँगा और न ही मैं किसी अन्य जाति पर कुछ भी टिप्पणी करूँगा। यहाँ मैं आपको वहीं बताऊँगा, जो मैंने सोशल मीडिया और लोकल स्तर पर देखा है। यहाँ मैं वहीं बताने जा रहा हूँ, जो समाज में मैंने पिछले कुछ दिनों में ऑब्ज़र्व किया है।

सबसे पहले बात जाति व समाज के स्वघोषित ठेकेदारों की। ये ऐसे लोग हैं, जो जाति के कारण या यूँ कहिए कि जाति की आड़ में भाजपा उम्मीदवार का विरोध कर रहे हैं। इससे इन्हें काफ़ी फायदे होते हैं। ख़ुद इनकी जाति के लोग इनके विरोध में नही बोल सकते क्योंकि कुलघाती का तमगा लगा दिया जाएगा। दूसरा फ़ायदा यह कि इन्हें भाजपा विरोधियों का भी अच्छा साथ मिल जाता है। जहाँ तक मैंने फेसबुक और व्हाट्सप्प पर भूमिहारों को लेकर बनें ग्रुप में देखा, इनकी पहचान निम्नलिखित है (बाकी जातियों के भी अलग-अलग ग्रुप हैं और शायद ही कोई इन सबसे अछूता है, लेकिन यहाँ मैंने अपनी जाति का उदाहरण लिया है क्योंकि मैं ख़ुद पर टिप्पणी करना चाहता हूँ, किसी को हर्ट करने का मेरा इरादा नहीं है):

  • ये व्हाट्सएप्प और फेसबुक के भूमिहारों वाले ग्रुप में आने वाले फेक मैसेज और पोस्ट शेयर करते हैं। उदाहरण: राधा मोहन सिंह ने भूमिहारों को गाली दी। मुझे अपनी जाति के कुछ लोगों ने यह सूचना दी कि राधा मोहन सिंह ने भूमिहारों को लेकर फलाँ अपशब्द कहे लेकिन मुझे विश्वास नहीं था कि एक केंद्रीय मंत्री किसी जाति विशेष को लेकर अभद्र टिप्पणी कर सकता है। मेरा अंदेशा सही निकला और ये ख़बर झूठी निकली।
  • इन्होंने भगवान परशुराम को नहीं पढ़ा होता, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह की जीवनी इन्हें नही पता होती और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं को धता बताते हैं। परशुराम जयंती पर ब्राह्मणों व भूमिहारों द्वारा उनके फोटोज व ग्राफ़िक्स शेयर किए जाते हैं पर उनके विचारों व सुकर्मों का अध्ययन करने में इनकी कोई रूचि नहीं होती।
  • अपनी जाति की बात करते-करते ये अंत में नेहरू-राजीव को सही ठहराने में लग जाते हैं, उनके हर कुकृत्यों का बचाव करते हैं। जैसे, अगर इनकी जाति का उम्मीदवार कॉन्ग्रेस की तरफ़ से खड़ा है तो कल के प्रखर भाजपाई भी आज नेहरू-राजीव के फैन हो सकते हैं। यही बिहार की जातिवादी राजनीति की सच्चाई है।
  • ये भाजपा से नाराज़गी की वजह “भाजपा द्वारा भूमिहारों को टिकट न देना” बताते हैं। जबकि, ये ख़ुद “भूरा बाल साफ़ करो” का समर्थन कर रहे होते हैं। लालू यादव ने एक बार ये नारा दिया था जिसमें ख़ास जातियों के सफाई की बात कही गई थी। इसकी चर्चा हम यहाँ नहीं करेंगे। आप किसी भी उस बिहारी से पूछ सकते हैं, जिसनें लालू राज को देखा है।
  • इनमें से अधिकतर कुछ दिनों पहले तक मोदी के गुणगान करते नहीं तक रहे थे और ख़ुद को हिंदूवादी बताते हुए चल रहे थे। ये अपनी जाति के आपराधिक छवि के नेताओं को भी देवता बना कर उनकी पूजा करते हैं। अपराधियों को मसीहा की तरह देखा जाता है और उनके साथ फोटो क्लिक करवाने में ये गर्व महसूस करते हैं।

अगर मोदी का विरोध करना ही है तो उसके लिए सामान्य वर्ग के ग़रीबों को मिलने वाले आरक्षण का विरोध करने वाले को समर्थन क्यों? कल तक भाजपा-एबीवीपी में हाथ-पाँव मारने वाले अपना स्वार्थ साधने और पहचान स्थापित करने के लिए “चौकीदार चोर है” का नारा लगा रहे हैं तो आप उनके झाँसे में मत आइए। देश सर्वोपरि है, सांसद अगर काम नहीं करेगा तो इतिहास उसे याद नहीं रखेगा। लालू यादव ने 15 वर्षो लगातार राज किया, आज इतिहास का न्याय देखिए, जरा सोचिए कि क्या किसी को हरा देने भर से बदला निकल जाता है? हमेशा कोई समाज इसीलिए क्यों एकजुट होता है कि फलाँ उम्मीदवार हमारे ‘दुश्मन’ जाति का है और इसे हरा देना है। अच्छे उम्मीदवारों को जिताने के लिए जाति के लोग एकजुट क्यों नहीं होते?

और समर्थन किसका करना है? एक ऐसे व्यक्ति का, जो अपने बेटे का कैरियर बनाने के लिए सारे दाँव-पेंच आज़माने में लगा हुआ है? जो पिछले 3 चुनावों से लगातार हार रहा है और ख़ुद कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार समीति का अध्यक्ष रहते हुए भी अपने रालोसपा उम्मीदवार बेटे को जिताने के लिए क्षेत्र विशेष में कैम्प किए हुआ है? जो अपनी पार्टी के प्रति ही गम्भीर नहीं, वो क्षेत्र का क्या विकास करेगा? महागठबंधन को वोट देकर देश में अस्थिरता लानी है तो कोई दिक्कत नहीं है। अखिलेश सिंह कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं और पूरे राज्य में चुनाव की कमान उनके ज़िम्मे थी और अभी भी है लेकिन वह रालोसपा उम्मीदवार अपने बेटे को जिताने के लिए वह चम्पारण में बैठे रहें। राज्य में पार्टी का जो भी हो, बेटा जीतना चाहिए।

क्या कॉन्ग्रेस एक डूबती नैया है? अगर है भी तो उसके पदाधिकारियों का अपनी पार्टी के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? राजद से कॉन्ग्रेस में गए अखिलेश के बेटे रालोसपा से मैदान में उतरे और अखिलेश ने ख़ास जाति के बड़े नेताओं को बुलाकर प्रचार अभियान शुरू किया। अनंत सिंह, जिन्हें बिहार में छोटे सरकार के नाम से जाना जाता है और जो कई महीनों तक जेल में बंद रहे हैं, उन्हें बुलाकर रोड शो कराया गया ताकि जाति विशेष के मत प्राप्त किए जा सके। किसी भी लोकसभा में कैसे निर्णायक जाति समूहों को अलग-अलग बाँट कर अंकगणित बैठाया जाता है और समीकरण साधा जाता है, इसका ये अच्छा उदाहरण है। उस जाति के बाहुबलियों व दबंगों को बुलाकर सम्बोधन कराए जाते हैं।

और, कुछ ऐसे भाजपा फैन हैं, जिनका मानना है कि एक-दो सीटों से क्या होगा, मोदी तो आ ही रहा है। 2004 में वाजपेयी के समय यही हुआ था। लोगों से अपनी-अपनी सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों को हरा दिया और कहते रहे कि वाजपेयी तो आ ही रहा है, उसे कौन हरा देगा। आपके सामने अब बस 2 विकल्प हैं। पहला, देश की सुरक्षा, देश का विकास, बिजली, पानी, सड़क देने वाले और घर-घर उज्ज्वला से गैस पहुँचाने वाली और ग़रीबों का बैंक एकाउंट खुलवाने वाली सरकार को मौका दें या फिर अपने समाज के झूठे ठेकेदारों के लिए देश के लिए कार्य करने वालों को धोखा दें। ख़ुद आडवाणी ने एक इंटरव्यू में कि वाजपेयी की हार इसीलिए हुई क्योंकि संसदीय क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को यह कहते हुए हरा दिया गया कि ‘वाजपेयी तो जीत ही रहा है, इस उम्मीदवार को हरा दो’।

ज्यादा विरोध कीजिएगा तो चंद मुट्ठी भर नेताओं को कुछ अच्छी पदवियाँ मिलेंगी। सीपी ठाकुर हों या अखिलेश सिंह, अपने-अपने दलों में इनकी पूछ बढ़ेगी और इन्हें रुपए कमाने के नए रास्ते दिए जाएँगे, न आपका कुछ होगा और न राष्ट्र का। ये सब क्षणिक आवेश के क्षण हैं, इनसे प्रभावित न होते हुए जनता को उसी उम्मीदवार को वोट देना चाहिए, जो सही लगे। अगर आपको कॉन्ग्रेस पसंद है तो इसीलिए वोट कीजिए क्योंकि उसकी कुछ बातें आपको अच्छी लगती है, इसीलिए नहीं कि उसने आपकी जाति के उम्मीदवार को टिकट दिया है। यही भाजपा के बारे में भी कह सकते हैं। अगर आपको मोदी को जिताना है तो भाजपा को वोट करें। जिस भी पार्टी को वोट करें, जाति के आधार पर नहीं, उसकी नीतियों, इतिहास और प्रदर्शन के आधार पर।

इसमें मीडिया का भी दोष है। मीडिया ने हर जातिवादी नेता की करतूतों को ‘सोशल इंजीनियरिंग’ नाम दिया है और उसे बढ़ावा दिया है। लालू अगर माई (मुस्लिम-यादव) के भरोसे जीतने की बात करता है तो यह उसका ‘सोशल इंजीनियरिंग’ है, ऐसा मीडिया में बताया जाता है। नीतीश अगर महादलितों के भरोसे बैठे हैं तो यह उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ है। जब क्षेत्रीय नेता जाति की बात करते हैं, तो उन्हें इंजीनियर बोलकर उनका मान बढ़ा दिया जाता है, जिससे ऐसा प्रैक्टिस करने वालों को और बल मिलता है। जनता तो जनता है, बरगलाने वाले बरगला ले जाते हैं। ग़रीब, मासूम और आम जनता को क्या पता कि जाति के ये स्वघोषित ठेकेदार उनके काम नहीं आने वाले, काम आएगी एक अच्छी सरकार और एक अच्छी नीतियों वाला प्रधानमंत्री।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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