Wednesday, April 21, 2021
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‘राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है, लोगों को डरने की जरूरत नहीं’ – यूँ शुरू हुआ था दमन का दौर

12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने और 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को कानून की औकात दिखा दी। लेकिन 25 जून को 'तानाशाह' इंदिरा गाँधी ने संविधान की आड़ लेकर कानून और कोर्ट के साथ-साथ देश की जनता से खिलवाड़ किया।

भारत में आजकल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हुए वर्तमान सरकार की आलोचना करना जैसे फैशन हो गया है। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को सबसे ज्यादा चोट 25 जून, 1975 को पहुँचाई गई।

इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा लोकतंत्र का सर्वाधिक मखौल उड़ाया गया। भारतवासियों के सभी नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित और नेस्तनाबूद करते हुए पूरे भारत में दहशत फैलाई गई। आपातकाल आजादी के बाद की सबसे बड़ी दुर्घटनाओं में से एक है।

25 जून, 1975 की रात को देशवासियों पर अचानक और अकारण आपातकाल थोप दिया गया। निश्चय ही, इस दुर्घटना को भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय कहा जा सकता है। आपातकाल के दौरान पूरे देश को एक बहुत बड़े जेलखाने में तब्दील कर दिया गया।

25 जून, 1975 की सुबह ऑल इंडिया रेडियो पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की आवाज में जो संदेश प्रसारित हुआ, उसे पूरे देश ने सुना। इस संदेश में इंदिरा गाँधी ने कहा “भाइयो और बहनो! राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। लेकिन इससे सामान्य लोगों को डरने की जरूरत नहीं है।”

इन चंद अर्थहीन और अनर्गल शब्दों के बाद ही पूरे भारत में आपातकाल का भयावह दौर शुरू हुआ। भारतीय संविधान में आपातकाल लगाए जाने का प्रावधान उन परिस्थितियों के लिए किया गया है, जब देश में आंतरिक अशांति का माहौल हो। ऐसी परिस्थिति आने पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश मे शांति की पुनः बहाली के लिए आपातकाल लगाया जा सकता है।

लेकिन 25 जून, 1975 में ऐसी कोई आतंरिक अशांति की स्थिति नहीं थी। वस्तुतः “गरीबी हटाने” वाली इंदिरा गाँधी ने लोकतंत्र हटा दिया। आपातकाल इंदिरा गाँधी ने अपनी गद्दी बचाने के लिए सत्ता मोह में लगाया था l यह ‘इंदिरा इज इंडिया’ जैसी आत्ममुग्ध मानसिकता का दुःखद प्रतिफलन था। आपातकाल के परिणामस्वरूप देश भर में प्रेस सेंसरशिप लगा दी गई।

इंदिरा गाँधी के रेडियो संदेश प्रसारित होने से पहले ही 24 जून की रात को देश में आपातकाल लागू करने और विपक्ष के तमाम नेताओं की गिरफ्तारी का फैसला हो चुका था। आधी रात को ही प्रधानमंत्री ने तत्कालीन ‘रबर स्टैम्प’ राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से इस फैसले पर हस्ताक्षर करवा लिए थे।

माहौल इतना डरावना हो चुका था कि इसके खिलाफ कुछ भी बोलते/लिखते ही गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया जाता था। आपातकाल 21 मार्च, 1977 तक जारी रहा। आपातकाल के इन 21 महीनों को भारतीय लोकतंत्र का संकट काल माना जाता है।

आपात काल लागू होने से पहले देश में नाराजगी और राजनीतिक गहमा-गहमी बढ़ती जा रही थी। मसलन, बढ़ती बेरोजगारी, महँगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ तमाम विपक्ष सड़कों पर था। जनता लोकनायक जयप्रकाश नारायण के पीछे लामबंद हो रही थी। गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन देश भर में फैलने लगा था।

इंदिरा गाँधी के सलाहकारों ने इस आंदोलन से सख़्ती से निपटने की सलाह दी। उनसे कहा गया कि अगर सख़्ती नहीं दिखाई गई तो उनकी सत्ता को खतरा है। सवाल यह उठता है कि ऐसे कौन से कारण थे, जिनकी वजह से भारतीय संविधान को ताक पर रखते हुए आपातकाल की घोषणा की गई थी?

जब इस सवाल का जवाब खोजा जाता है तो हमें उन असंख्य राजनीतिक गाँठों को खोलना पड़ता है, जो तमाम सुविधाभोगी बुद्धिजीवियों द्वारा लगाई गई हैं। इन पेचीदगियों को इस पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है- आपातकाल से पहले 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी रायबरेली सीट से निर्वाचित हुई थीं। इस चुनाव में इंदिरा गाँधी ने विपक्ष के उम्मीददवार और मुख्य प्रतिद्वन्द्वी राजनारायण को पराजित किया था। चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप के साथ राजनारायण अदालत गए।

12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गाँधी का निर्वाचन रद्द करते हुए उनके अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। अन्ततः मामला सुप्रीम कोर्ट गया और 24 जून को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन रद्द करने के फैसले को सही ठहराया। लेकिन इंदिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दी। वह संसद की कार्यवाही में भाग ले सकती थीं, लेकिन वोट नहीं कर सकती थीं।

जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण ने ऐलान किया कि अगर 25 जून, को इंदिरा गाँधी अपना पद नहीं छोड़ेंगी, तो अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन किया जाएगा। दिल्ली के रामलीला मैदान की विशाल जनसभा में जेपी ने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ”सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” को नारे की तरह इस्तेमाल किया।

उन्होंने कहा, “मुझे गिरफ्तारी का डर नहीं है। मैं इस रैली में भी अपने आह्वान को दोहराता हूंँ ताकि कुछ दूर संसद में बैठे लोग भी सुन लें। मैं आज एक बार फिर सभी पुलिसकर्मियों और जवानों का आह्वान करता हूँ कि इस सरकार के आदेश को नहीं मानें क्योंकि इस सरकार ने शासन की अपनी वैधता खो दी है।”

इंदिरा गाँधी ने अपने सलाहकारों से आपातकालीन मंत्रणा के बाद आंतरिक उपद्रव की आशंका की आड़ लेकर आपातकाल लगाने का फैसला किया। आधी रात को ही तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आंतरिक आपातकाल लागू करने का फरमान जारी करवा लिया गया।

25 जून की शाम को तमाम अखबारों की बिजली काट दी गई। इसके 21 महीने बाद यानी 21 मार्च, 1977 को आपातकाल हटाया गया। आपातकाल लागू करने का फैसला कॉन्ग्रेस के लिए इस कदर घातक साबित हुआ कि इसके बाद हुए चुनाव में कॉन्ग्रेस की तब तक की सबसे बुरी हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में देश में पहली बार गैर कॉन्ग्रेसी सरकार बनी। आपातकाल की घोषणा के बाद इसका नकारात्मक प्रभाव सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में देखने को मिला।

आपातकाल की घोषणा के बाद देश में मीसा एक्ट लागू किया गया। सरकार ने मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) के तहत नेताओं को बंदी बनाया। इस एक्ट के अंतर्गत विरोधी दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थानों पर नज़रबंद या जेलबन्द कर दिया गया।

विपक्ष के सभी मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस और जय प्रकाश नारायण जैसे शीर्षस्थ नेताओं को भी जेल भेज दिया गया। चंद्रशेखर जो कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य थे, को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

इस दौरान ऐसा कानून बनाया गया, जिसके तहत गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत माँगने का अधिकार नहीं था। नेताओं की गिरफ्तारी की सूचना उनके रिश्तेदारों, मित्रों और सहयोगियों को भी नहीं दी गई। जेल में बंद नेताओं को किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थीl उनकी डाक तक सेंसर होती थी। इस दौरान पुरुष और महिला बंदियों के साथ अमानवीय अत्याचार किया गया।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी को सबसे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का निपटारा करना था। इसलिए इन फैसलों को पलटने वाला कानून लाया गया। इसके लिए संविधान को संशोधित करने की भी कोशिश की गई।

आपातकाल के दौरान ही संविधान के मूल ढांचे को कमजोर करने और उसकी संघीय विशेषताओं को नुकसान पहुँचाने तथा सरकार के तीनों अंगों के संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश की गई । आपातकाल की शुरुआत में ही संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 को निलंबित कर दिया गया। मसलन कानून की नजर में सबकी बराबरी, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा की गारंटी और गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर अदालत के सामने पेश करने के अधिकारों को स्थगित कर दिया गया l

जनवरी, 1976 में अनुच्छेद 19 को भी निलंबित कर दिया गया। इसके जरिए (अभिव्यक्ति की आजादी, प्रकाशन करने, संघ/संगठन बनाने और सभा करने की आजादी) को भी छीन लिया गया।

आपातकाल लगते ही अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई। अखबारों और समाचार एजेंसियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने नया कानून बनाया। सरकार ने चारों समाचार एजेंसियों पीटीआई, यूएनआई, हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती को खत्म कर एक नई समाचार एजेंसी बना दी। इसके साथ ही प्रेस के लिए “आचार संहिता” की घोषणा कर दी गई।

कई संपादकों को सरकार विरोधी लेख लिखने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। इतना ही नहीं मनोरंजक कार्यक्रमों और कार्टून आदि के माध्यम से सरकार पर कटाक्ष करने वालों को भी उत्पीड़ित किया जाने लगा। फिल्मों, गानों और ऐसे तमाम कार्यक्रमों और माध्यमों पर रोक लगा दी गई थी।

आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की फिल्म “किस्सा कुर्सी का” को जब्त कर लिया गया। किशोर कुमार जैसे गायकों को काली सूची में डाल दिया गया और ‘आँधी’ फिल्म पर पाबंदी लगा दी गई। आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले वकीलों और जजों को भी नहीं बख्शा गया।

आर्थिक मोर्चे पर भी आपातकाल का काफी नकारात्मक असर पड़ा। इस दौरान आर्थिक नीतियों में मनचाहे परिवर्तन और श्रमिक कानूनों को कमजोर करके उनके बुनियादी अधिकारों को कम करने की कोशिश की गई। जहाँ कहीं भी मज़दूरों की हड़ताल हुई, वहीं उसे कुचलने की कोशिश की गई।

जबरन नसबंदी आपातकाल के दुःस्वप्नों में से एक थाl जबरिया “परिवार नियोजन” के लिए अध्यापकों और छोटे कर्मचारियों पर काफी सख्ती की गई। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर लोगों की निर्ममतापूर्वक नसबंदी की गई।

परिवार नियोजन, नगरों के सुंदरीकरण और सुधारीकरण के नाम पर आम लोगों, दुकानदारों और व्यापारियों का अत्यधिक उत्पीड़न हुआ। आपातकाल में अफसरशाही और पुलिस को जो अनियंत्रित अधिकार मिले थे, उनका बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया। हालाँकि, इस दौरान प्रचार यह किया गया कि आपातकाल के दौरान भ्रष्टाचार कम हुआ है। लोगों में अनुशासन आया है और समय पर काम होने लगे हैं। रेलें समय पर चलने लगीं हैं।

प्रोपेगेंडा ही सर्वप्रमुख राजनीतिक एजेंडा था। लेकिन दो-तीन महीने बाद ही हालात पहले से भी कहीं ज्यादा खराब हो गए। आपातकाल ने आम लोगों के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया। आपातकाल के विरोध में लोगों का गुस्सा फूटा और 1977 के आम चुनाव में जनता ने एकजुट होकर इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस को हराकर लोकतंत्र में अपनी गहरी आस्था का सबूत दे दिया।

1975 में आपातकाल लागू होने के बाद संविधान में ऐसे संशोधनों का दौर शुरू हो गया, जिन्होंने नवोदित भारतीय गणतंत्र का गला घोंट कर रख दिया। आपातकाल और इसको लागू करने के संबंध में भारतीय संविधान में अलग से प्रावधान किया गया है। भारतीय संविधान के भाग-18 में अनुच्छेद 352 से लेकर 360 के बीच आपातकाल की चर्चा की गई है। संविधान में उल्लेखित आपातकालीन शक्तियों का बहुत अधिक दुरुपयोग किया गया।

आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गाँधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किए। मसलन, जुलाई 1975 में 38वें संविधान संशोधन के जरिए न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया। 2 महीने बाद ही किए गए 39वें संविधान संशोधन के जरिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के निर्वाचन को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया गया।

40वें और 41वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान के कई अन्य प्रावधानों को बदलने के बाद 42वाँ संविधान संशोधन भी किया गया। 42वें संविधान संशोधन के जरिए एक प्रकार से पूरे संविधान का पुनरीक्षण किया गया और संविधान में बहुत से मूलभूत बदलाव किए गए।

42वें संविधान संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था – मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता दिया जाना। इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों तक से वंचित किया जा सकता था। इस संशोधन ने न्यायपालिका को पंगु कर दिया और विधायिका को असीमित शक्तियाँ प्रदान कर दीं।

दूसरा बदलाव यह किया गया कि अब केंद्र सरकार को यह अधिकार था कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी। इसके साथ ही राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया।

तीसरा 42वें संविधान संशोधन के जरिए यह प्रावधान किया गया कि संसद द्वारा किए गए संविधान संशोधन को किसी भी आधार पर न्यायपालिका में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार ने मानो पूरे संविधान की ही कमर तोड़कर रख दी थी। इसलिए 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की आवश्यकता महसूस की गई।

44वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के जरिए आपातकालीन प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की गई। इसलिए कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को संविधान में शामिल किया गया, जिससे कि भविष्य में कोई अन्य सरकार संविधान की आत्मा को आहत ना कर सके।

इन प्रावधानों में 44वें संविधान संशोधन के द्वारा आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर रोक लगाई गई। 42वें संविधान संशोधन का प्रभाव कम किया गया। संविधान को फिर से अपने मूल रूप में लाया गया। संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर वैधानिक अधिकार बना दिया गया। इस प्रकार 44वें संविधान संशोधन ने ऐसे कई बदलाव किए, जिससे आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न ना हो।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र के लिए कहा जाता है कि लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, और जनता द्वारा चलाया जाने वाला शासन है। लेकिन जब जनता द्वारा चुनी गई सरकार ही निरंकुश हो जाए और सारे संवैधानिक उपायों को ताक पर रख कर अधिनायकवादी बन जाए तो लाजिमी है कि देश में अराजकता और अंधेरगर्दी आ ही जाएगी।

भारत में 1975 में ऐसा ही हुआ, जब सत्ता न छोड़ने के लोभ और खुद को सबसे ताकतवर मानने के भ्रम में इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। यह भारत के युवा लोकतंत्र की बुनियाद पर सबसे गहरी चोट थी।

भारत की भावी पीढ़ियों के लिए आपातकाल को याद रखना जरूरी है ताकि उन्हें यह मालूम रहे कि कैसे संविधान को ही हथियार बनाकर जनता के खिलाफ इस्तेमाल किया गया और अन्ततः कैसे संविधान ने ही इस स्थिति से भारतवासियों को बचाया।

साथ ही, आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की दुहाई देने वालों के डीएनए में मौजूद अधिनायकवादी प्रवृत्तियों और तानाशाही तत्वों की पहचान करके उनके पाखण्ड का पर्दाफाश किया जा सके।

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प्रो. रसाल सिंह
प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

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