कॉन्ग्रेस जिस कारण से शिवसेना से बचना चाहती थी, उसी हिंदुत्व का लालच बना गठबंधन का गोंद?

"मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कथित तौर पर तर्क यह दिया कि एक हिंदूवादी इतिहास वाली पार्टी के साथ गठबंधन कर लेने से कॉन्ग्रेस पर लगा 'हिन्दू विरोधी' का ठप्पा कमज़ोर पड़ जाएगा। उन्होंने अपना उदाहरण भी दिया कि...."

अगर मीडिया में आ रही खबरों और मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के नेताओं के दावो पर यकीन करें तो महाराष्ट्र में ‘महा विकास अघाड़ी’ का असली चाणक्य तो इस पूरे शतरंजनुमा खेल के दौरान महाराष्ट्र में आया ही नहीं। कमलनाथ ने भोपाल में बैठकर ही कथित तौर पर ऐसी लॉबिंग की कि मातोश्री के ‘महल’ से निकल कर सरकार बनाने के लालच में होटलों के पिछले दरवाजे तक पहुँच गए उद्धव ठाकरे की सीएम पद की गोटी फिट हो गई।

‘वादाखिलाफ़ी’ का ताव देकर बेटे की राजनीति में ओपनिंग ही सीएम पद से कराने के इच्छुक उद्धव ठाकरे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से निकल तो आए थे, लेकिन समस्या यह थी कि महज़ 56 विधायक लेकर जाएँ किसके दर पर। हिंदुत्व के नाम से उल्टियाँ करने वाली कॉन्ग्रेस (44 विधायक) के पास जाने का विकल्प (उस समय तक) था नहीं, एनसीपी (54) भी उसी खेमे की थी, और निर्दलीय और अन्य केवल 30 थे- वे भी फडणवीस के पाले में अधिक दिख रहे थे। उनमें भी एक नाराज़ भाई राज ठाकरे की मनसे का था, दो हिन्दुओं के सबसे बड़े विरोधी ओवैसी की पार्टी के। और अगर कहीं न जाते तो भी दिक्कत थी- भाजपा (105 विधायक) देर-सबेर येद्दियुरप्पा फॉर्मूले के तहत किसी न किसी पार्टी के विधायकों से सदन में इस्तीफ़ा दिलाकर बहुमत के लिए ज़रूरी संख्या गिराकर सरकार बना लेती, और इस्तीफ़ा देने वालों को अपने टिकट पर स्थिर सरकार और नैतिक-ईमानदार राजनीति के हवाले से जिता कर पूर्ण सदन में भी संख्याबल का पाला छू लेती।

ऐसे में उद्धव ने तो विचारधारा को तिलांजलि देकर कॉन्ग्रेस के साथ जाने का फैसला कर लिया था, लेकिन पेंच यह फँसा कि भले ही महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस कमेटी सबसे लचर प्रदर्शन के बावजूद मुफ्त में मिल रही सत्ता की मलाई के लिए लालयित थी, लेकिन इसमें राष्ट्रीय आलाकमान को फ़ायदा कम और नुकसान ज़्यादा दिख रहा था। चिंता यह थी कि हिंदुत्व वाली शिवसेना के साथ जाने से मोदी-शाह के राजनीतिक ‘नरसंहार’ में गाजर-मूली की तरह कट रहे कॉन्ग्रेसी वोटों में और कमी न हो जाए- बीच के एकाध अपवादों को छोड़ कर 2012-13 के मोदी-उदय के बाद से कॉन्ग्रेस का वोट-शेयर लगातार गोते खा रहा है, और मज़हब के आधार पर वोट करने वाले मुसलमान भी कहीं ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ माने जाने वाले बाला साहेब की पार्टी देख कर अलविदा न कह दे। गोटी यहीं अटक गई थी। सामने दिल्ली, बिहार, झारखंड के चुनाव थे जहाँ कॉन्ग्रेस बिना मुस्लिम वोटबैंक के बहुत मुश्किल में होगी।

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एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार जब ‘अस्थाई’ कॉन्ग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी से मिलने पहुँचे थे तो लोगों को उम्मीद थी कि इस पार या उस पार की कोई बात हो जाएगी- शरद पवार न केवल पुराने कॉन्ग्रेसी रह चुके हैं, बल्कि जिस सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ी, उन्हीं सोनिया ने यूपीए में डॉ. मनमोहन सिंह के बाद दूसरे नंबर का मंत्री बनाया, तत्कालीन गृह मंत्री को यह पद देने के प्रोटोकॉल को ताक पर रखते हुए। लेकिन वे भी सोनिया गाँधी को तैयार पूरी तरह नहीं कर पाए।

ऐसे में कथित तौर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कथित तौर पर तर्क यह दिया कि एक हिंदूवादी इतिहास वाली पार्टी के साथ गठबंधन कर लेने से कॉन्ग्रेस पर लगा ‘हिन्दू विरोधी’ का ठप्पा कमज़ोर पड़ जाएगा। उन्होंने अपना उदाहरण भी दिया कि कैसे उन्होंने शिवराज सिंह चौहान की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की लकीर छोटी करने के लिए एक साल में इतनी गौसेवा कर डाली है कि उन्हें ‘गौभक्त’ कमलनाथ के नाम से जाना जाने लगा है। यानी जिस हिंदूवाद के नाम से सोनिया गाँधी को एलर्जी हो रही थी, कमलनाथ ने समझाया कि उन्हीं हिंदूवादियों के साथ गठबंधन कर के कॉन्ग्रेस गाँधी-नेहरू के समय से चले आ रहे हिन्दू-विरोधी होने के दाग को हल्का कर सकती है।

मीडिया की खबरों के अनुसार इसके बाद भी सोनिया गाँधी को आश्वस्त होने में 4 दिन लग गए। कमलनाथ के बारे में यह जान लेना ज़रूरी है कि वे न केवल सोनिया गाँधी के खास हैं, बल्कि पूर्व प्रधानमंत्रियों राजीव गाँधी और इंदिरा गाँधी के भी नज़दीकी रहे। इंदिरा उन्हें राजीव-संजय के बाद अपना तीसरा बेटा कहतीं थीं, और उनकी हत्या के बाद हुए सिख दंगों में हत्यारी भीड़ का नेतृत्व करने का आरोप भी कमलनाथ पर लग चुका है

बहरहाल, येन-केन-प्रकारेण सोनिया गाँधी मान गईं- और आज सीएम की कुर्सी को ताकत का स्रोत नहीं बल्कि उस पर एक अवांछित बाँध मानने वाले बाला साहेब ठाकरे का बेटा उसी कुर्सी के लिए हिंदूवाद को ही राम-राम कर कॉन्ग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने जा रहा है। और इस अहसान के लिए उद्धव कमलनाथ के कृतज्ञ भी हैं। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के नेताओं का दावा है कि उन्होंने खुद फ़ोन कर के कमलनाथ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आने के लिए आमंत्रित किया है। और कमलनाथ मान भी गए हैं। फुटबॉल के नॉन-प्लेइंग कैप्टेन की तरह बिना मैदान में उतरे ही इस प्रकरण के अहम वार्ताकार के रूप में उनकी भूमिका पर शायद किसी दिन एक पूरी किताब लिखी जाएगी!

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उद्धव ठाकरे-शरद पवार
कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी के सावरकर को लेकर दिए गए बयान ने भी प्रदेश की सियासत को गरमा दिया है। इस मसले पर भाजपा और शिवसेना के सुर एक जैसे हैं। इससे दोनों के जल्द साथ आने की अटकलों को बल मिला है।

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