Thursday, August 13, 2020
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कश्मीरी औरतें (हिंदू-मुसलमान दोनों) जो हवस और जहन्नुम झेलने को मजबूर हैं

आज जब कश्मीरी लड़कियों से शादी वगैरह की बातें हो रही हैं तो समाज को यह समझना चाहिए कि कश्मीरी लड़कियाँ और महिलाएँ शेष भारत से अलग जीवन नहीं जीतीं बल्कि कुछ ज्यादा ही वेदना झेलती हैं।

‘ग़र फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त, हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ हमीं अस्त’- यह कहकर किसी ने कश्मीर को स्वर्ग बताया था। जिसने भी यह कहा था उसको शायद यह इल्म नहीं था कि आने वाले समय में आज़ादी की चाह रखने वाले कुछ कश्मीरी ही कश्मीर को नर्क बना देंगे। दहशतगर्द तंज़ीमों के साए में रहने वाली औरतों के लिए तो कम से कम कश्मीर जहन्नुम से कम नहीं। प्रोफेसर कविता सूरी ने अपनी पुस्तक Voices Unheard में उन कश्मीरी औरतों की कहानियाँ लिखी हैं जिनका जीवन आतंक के साए में जीते जी नर्क बन गया।

अनंतनाग में रहने वाली हसीना बानो की ज़िंदगी खुशहाल थी। पिता डाक विभाग में काम करते थे और हसीना अपनी माँ के साथ घर के कामों में हाथ बंटाती थीं। फिर एक दिन हसीना की माँ अल्लाह को प्यारी हो गई और बाप के कंधे पर बेटी की ज़िम्मेदारियों का आसमान टूट पड़ा। धीरे-धीरे पाल पोस कर बाप ने बेटी को बड़ा किया और एक दिन कारपेंटरी का काम करने वाले मोहम्मद अमीन शाह के साथ हसीना का निकाह हो गया।

हसीना ने सोचा कि अब खुशियाँ उसका दामन नहीं छोड़ेंगी लेकिन कुछ ही सालों बाद अमीन शाह ने घर परिवार छोड़कर दहशतगर्दी की राह पकड़ ली। वह आतंकी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन में शामिल होकर ‘तहरीक़’ की खूनी मुहीम का हिस्सा बन गया। अमीन ने बंदूक उठाई थी तो अंत भी एक दिन वैसा ही हुआ। सुरक्षा बलों के हाथों अमीन मारा गया और पीछे रह गई हसीना बानो और उसकी बेटियाँ। आज हसीना किसी तरह अपनी बेटियों को पाल रही हैं। कश्मीर में ऐसी न जाने कितनी औरतें हैं जिन्होंने दहशतगर्दी के कारण अपने पति, बेटे और बाप खोए हैं।

शहज़ादा युसूफ बेग़म का निकाह इदरीस खान से हुआ था। इदरीस खान जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के सरगना यासीन मलिक का दाहिना हाथ हुआ करता था। सन 1995 में इदरीस मारा गया और पीछे छोड़ गया अपनी बीवी शहज़ादा और दो बेटियाँ। आज शहज़ादा कहती है, “मेरे शौहर ने यासीन मलिक के लिए जान दे दी लेकिन पार्टी (JKLF) ने उसके लिए कुछ नहीं किया।” शहज़ादा के ससुरालवालों ने भी उसे बुरे वक़्त में घर से निकाल दिया था। उस वक़्त कोई भी आज़ादी चाहने या दिलाने का दिलासा देने वाला उसकी मदद के लिए नहीं खड़ा हुआ था।  

ऐसी अनेकों कहानियाँ हैं जब किसी कश्मीरी औरत का बाप, बेटा, भाई या शौहर दहशतगर्द बन सुरक्षाबलों के हाथों मारा जाता है तब उन औरतों का साथ निभाने के लिए कोई खड़ा नहीं होता। ऐसी औरतें दहशतगर्दों के हाथों बलात्कार, हिंसा समेत हर तरह के सितम का शिकार होती हैं। बाइस साल की गुलशन बानो के दो भाई हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन में शामिल होकर आतंकी बन गए थे। उनके मारे जाने के बाद गुलशन को सिलाई कढ़ाई कर मात्र ₹1000 महीने पर परिवार चलाने को मजबूर होना पड़ा था।

ज़िंदगी केवल उनकी ही बर्बाद नहीं होती जिनके परिवार के मर्द दहशतगर्द बनते हैं। आतंकियों के हाथों मारे गए लोगों के परिवारवालों की भी सुनने वाला कोई नहीं होता। कुलसुम जान के बाप अब्दुल जब्बार डार कुपवाड़ा में कॉन्ग्रेस के जिला अध्यक्ष थे जब उन्हें 1996 में गोली मार दी गई थी। डार की मौत के बाद उनकी दिव्यांग पत्नी और बच्चों को देखने वाला कोई नहीं था।

दहशतगर्दों ने केवल मर्दों को आतंकी ही नहीं बनाया, उन्होंने सैकड़ों कश्मीरी लड़कियों को अपनी हवस का शिकार भी बनाया। डोडा ज़िले की रहने वाली चौबीस साल की शमा बेगम का अंत 2006 में बड़ा भयानक हुआ था। जावेद इक़बाल उर्फ़ जीशान नामक हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन का एक आतंकवादी शमा का पीछा करता था और उसे अपनी हवस मिटाने का ज़रिया समझता था। जब शमा ने अपना शरीर उसे सौंपने से इनकार किया तो जीशान ने उसके परिवार को मार डालने की धमकी दी। आखिरकार उस दरिंदे ने बेबस शमा का दो महीने तक बलात्कार किया और एक दिन जब वह सुरक्षा बलों से भाग रहा था तब शमा उसके सामने आ गई। जीशान ने पुलिस का ध्यान भटकाने के लिए शमा को ऊंचाई से नीचे फेंक दिया जिसके कारण उसकी मौत हो गई।     

दहशतगर्दी के शुरुआती दिनों में आतंकियों को हीरो समझा जाता था। उन्हें मुजाहिद कहकर सम्मान भी दिया जाता था। लोग अपनी बेटियों की शादी इनसे करवाते थे लेकिन जब ये मुजाहिद निकाह के साल दो साल बाद ही अपनी बीवियों को छोड़ सीमापार चले जाने लगे तब कश्मीरियों को यह एहसास हुआ कि आज़ादी की बंदूक थामे ये लड़ाके असल में जिस्म को नोचने वाले भेड़िये हैं।

डोडा की ही रहने वाली मरियम बेगम का भाई अब्दुल लतीफ हरक़त-उल-मुजाहिदीन का आतंकवादी था। एक दिन हिंसा और आज़ादी के खोखले वादों से ऊबकर उसने बंदूक छोड़ने की ठानी। लेकिन उसके दहशतगर्द आकाओं ने उसे ऐसे नहीं छोड़ा। उन्होंने उसकी मासूम छोटी बहन मरियम और पिता को भी पकड़ लिया। आतंकियों ने उन दोनों को बंदूक के बट से बेइंतहा मारा और जलती सिगरेट से दागा। उन्होंने बाप बेटी को अब्दुल के सरेंडर करने का कसूरवार ठहराया और ऐसा टॉर्चर किया कि शैतान की भी रूह काँप गई। मरियम के साथ बलात्कार करने के बाद बाप बेटी के नाक और कान काटकर मरने के लिए छोड़ दिया गया। वह तो ईश्वरीय कृपा से पेट्रोलिंग करती सेना की एक टुकड़ी पहुँच गई, जिसके बाद मरियम की जान बची।

प्रोफेसर कविता सूरी ने कश्मीरी महिलाओं की तकलीफों पर लिखी अपनी पुस्तक में कश्मीर में चल रही वेश्यावृत्ति पर भी लिखा है। इसका कारण भी दहशतगर्दी ही है। जो औरतें विधवा हो जाती हैं और लड़कियाँ अनाथ हो जाती हैं उन्हें मजबूरन जिस्मफरोशी के धंधे में उतरना पड़ता है। इसका एक कारण इस्लामी चरमपंथी विचारधारा को थोपना भी है। लश्कर-ए-जब्बार और दुख्तरन-ए-मिल्लत जैसे संगठन ज़बरदस्ती बुर्क़े और हिज़ाब को थोपने पर आमादा हैं। इस प्रकार की घुटन और दबाव के कारण भी विधवा औरतें मनोवैज्ञानिक विरोधस्वरूप इस पेशे से जुड़ जाती हैं।

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