Saturday, February 27, 2021
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महागठबंधन की गाँठें उभरकर दिखने लगी हैं; गाँठें कैंसर का परिचायक होती हैं

यहाँ कोई पैदाइश से 'योग्य' है, कोई एक राज्य में सबसे ज्यादा सीट लाने के कारण खुद को योग्य पाती है। कोई राज्यसभा में है, लेकिन दावा करती है कि दलितों का कोई है तो वही है। कोई सिर्फ इसलिए पीएम बनने के ख़्वाब देखता है कि उसके पास वो दो सीटें होंगी जिसके कारण विश्वास प्रस्ताव जीता और हारा जा सकेगा।

जब आप किसी भी काम में आगे बढ़ते हैं, तो अमूमन आपकी इच्छा होती है कि आप सबसे ऊपर तक पहुँचे। भले ही आप नकारे हों, आपको पता हो कि आप उस लायक नहीं हैं, आपको पता हो कि आप बहुत ज़्यादा भी जाएँगे तो बीच तक पहुँचेंगे, फिर भी ख़्वाब देखने से किसने मना किया है। ये एक फ़ंडामेंटल मानवीय उम्मीद है।

भले ही कभी एक्टिंग न की हो लेकिन आदमी बंद कमरे में बैठकर सोचता है कि एक नेशनल अवॉर्ड मिल जाता तो कितना सही रहता। क्रिकेट की लेदर बॉल कभी हाथ में पकड़ी न हो, लेकिन इच्छा होती है कि तीन बॉल में तीन विकेट लेकर इतिहास बना दिया जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर संसाधन न हों, तब भी व्यक्ति बहुत आगे तक सोच लेता है।

वैसे तो राजनीति कोई कार्य नहीं माना जाता, फिर भी ये एक ऐसी जगह है जहाँ देवगौड़ा प्रधानमंत्री और प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति बन जाते हैं। ये वैसी जगह है जहाँ जादूगर और नशेड़ी लोग संयुक्त राष्ट्र संघ की हरी दीवारों के बैकड्रॉप में भारत की तरफ से भाषण देते हुए खुद को देखते हैं। अजीब बात यह है कि ऐसा संभव हो सकता है, ऐसा संभव हो चुका है। वरना राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाना महिला सशक्तिकरण तो नहीं ही कहा जा सकता!

लोकसभा चुनावों के समय दो-तीन शब्द ऐसे हैं जो हर पाँच साल में, चुनावों से 6-8 महीने पहले से खूब चर्चा में आते हैं। महागठबंधन, थर्ड फ़्रंट, साम्प्रदायिक ताक़तें आदि वो शब्द और विशेषण हैं जिनकी वास्तविकता हर चुनाव में औंधे मुँह गिरती है, लेकिन नेता लोग अपने आप को पागल बनाना बंद नहीं करते।

जिस देश में सेकेंड फ़्रंट ठीक से बन नहीं पा रहा, थर्ड और फोर्थ फ़्रंट की बात करना बेवक़ूफ़ी तो है लेकिन सुनने में सेक्सी लगता है। इसीलिए बोला जाता है। इसीलिए कभी पटनायक से बनर्जी की मुलाक़ात होती है, कभी केजरीवाल से कोई मिल लेता है, कभी ममता की मुलाक़ात चंद्र बाबू से होती है, कभी कमल हासन ओपन माइंडेड रहते हैं। 

लेफ़्ट वालों की बात नहीं करूँगा। उन्हें वक्त ने भी सताया है, और अर्धसैनिक बल भी उनके काडरों के जंगलों में घुस गए हैं। बचा था यूनिवर्सिटी में वल्नरेबल और सीधी लड़कियों को विचारधारा के नाम पर जोड़कर सीडी दिखाकर बलात्कार करना, अब वो भी सोशल मीडिया के समय में बाहर आ जाता है। 

बाहर आने तक तो ठीक है, वायरल हो जाता है। जंगलों में नक्सलियों के साथ ‘क्रांति’ करने गई लड़कियाँ जब सेक्स स्लेव का जीवन गुज़ारकर, किसी तरह बाहर पहुँचती हैं तो बताती हैं कि वहाँ महिला काडरों से कम्यून को देह सौंपकर क्रांति में सहयोग कैसे दिलवाई जाती है। अब ये बेचारे कैक्टस लेकर घूमते हैं और फ़्रस्ट्रेशन में यहाँ-वहाँ रगड़कर खुद को कष्ट देते हैं।

आज सुबह ख़बर आई कि बंगाल में कॉन्ग्रेस का गठबंधन नहीं हो पाया, अकेले लड़ेगी चुनाव। यूपी में आपको पता ही है कि परिवार वालों की सीटें छोड़कर बाकी हर सीट पर तथाकथित महागठबंधन का छोटा बंधन, सपा-बसपा, बनकर निकला है। कॉन्ग्रेस को वहाँ भी सबने अकेले छोड़ दिया। तेलंगाना में जो हुआ वो सबको दिख ही गया। कर्नाटक में मुख्यमंत्री अपने आप को क्लर्क कहकर रोता है, उसका बाप अपने बेटे की दुर्गति पर रोता है। 

दिल्ली में दो सौ पन्नों के सबूत के नाम पर केजरीवाल ने जो लहरिया लूटा था, वो शीला जी को याद है और माकन समेत कई कॉन्ग्रेसी नेताओं की दलीलों के बाद भी यहाँ गठबंधन बनते नहीं दिख रहा। देखना यह है कि बंगाल में तृणमूल की ममता कॉन्ग्रेस के साथ कितनी दया करती है। क्योंकि कॉन्ग्रेस तो दया की ही पात्र बन कर रह गई है।

वो मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जब देश की सबसे पुरानी और सबसे ज़्यादा समय सत्ता में रहने वाली पार्टी, क्षेत्रीय पार्टियों के उनके बिना माँगे ही उनके पीछे सपोर्ट देने के लिए अड़ जाए, तो लगता है कि वी डू लिव इन डेस्पेरेट टाइम्स, एंड डेस्पेरेट टाइम्स नीड डेस्पेरेट मेजर्स! हिन्दी में कहें तो हताश कॉन्ग्रेस के लिए हाथ-पाँव मारकर, नदी में विसर्जन का नारियल निकालने के चक्कर में मरे हुए आदमी की काई जमी खोपड़ी का भी मिल जाना एक उपलब्धि ही है। 

मध्य प्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनावों पर मत जाइए। भारत का वोटर अब चालाक हो गया है। वो उड़ीसा की विधानसभा किसी को देता है, लोकसभा किसी और को। और तो और, चुनावों के समय ही बता देते हैं कि ‘राजे तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’। तो अब मतदाताओं को मूर्ख समझना, उनको गलत आँकने जैसा है।

वैसे, भारत के 38.5% मतदाताओं को कॉन्ग्रेस ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से ‘स्टूपिड’ कहा ही है जबकि उनके अध्यक्ष आलू से सोना बनाते हैं और खेत में दवाई की फ़ैक्टरी लगाते हैं। इस तरह की बातें करके आप इंटरनेट पर वायरल हो सकते हैं, लेकिन अब इलेक्शन मैनेजमेंट करने वाली कम्पनियों की सुविधा छोटे दल भी लेते हैं, और उन्हें भी पता है कि किस बात से वोटर आपको घेरेगा।

जब आप लगातार सर्जिकल और एयर स्ट्राइक पर सवाल करते हैं, जब आप भारत की एक तिहाई जनसंख्या को जिसने मोदी को वोट दिया, उसे मूर्ख कहते हैं, जब आप खुद राफेल को निजी हितों को साधने के लिए यहाँ आने से रोकना चाहते हैं, तब आपकी विश्वसनीयता गिरती है, और कोई भी आपके साथ होने से कतराता है।

जो लोग कॉन्ग्रेस को समझदार और अनुभवी पार्टी बताते हैं, उनसे मेरा यही सवाल है कि इस पार्टी के मुखिया ने कौन से मुद्दे उठाए हैं सरकार को घेरने के लिए? राफेल इनके लिए राष्ट्रीय नहीं, बल्कि निजी मुद्दा है, इसलिए उसे इतनी बार उठाया कि लोग बोर हो गए हैं। रोजगार पर सवाल किए, पता चला कि मोदी सरकार ने कई एजेंसियों के मुताबिक़ करोड़ों नौकरियाँ सृजित की हैं। अब इस पर आँकड़े आने के बाद चुप्पी छाई हुई है।

महागठबंधन का दुर्भाग्य हमेशा से यही रहा है कि इनके साथ आने का लक्ष्य किसी फासीवाद ताक़त, साम्प्रदायिक विचारधारा, भ्रष्ट सरकार और तमाम नकारात्मक मुद्दों को लेकर नहीं होता, इनका लक्ष्य होता है कि कैसे शॉर्टकट से प्रधानमंत्री बना जाए। यहाँ कोई पैदाइश से ‘योग्य’ है, कोई एक राज्य में सबसे ज्यादा सीट लाने के कारण खुद को योग्य पाती है। कोई राज्यसभा में है, लेकिन दावा करती है कि दलितों का कोई है तो वही है। 

कोई सिर्फ इसलिए पीएम बनने के ख़्वाब देखता है कि उसके पास वो दो सीटें होंगी जिसके कारण विश्वास प्रस्ताव जीता और हारा जा सकेगा। आपको मेरी बात मजाक लगेगी, लेकिन क्या यह सत्य नहीं है? लोकतंत्र की हत्या का राग अलापने वालों ने क्या एक वोट से सरकार गिराकर इस देश को चुनाव में नहीं ढकेला है?

आपको क्या सच में लगता है कि इतनी महात्वाकांक्षाएँ एक साथ खड़ी हो पाएँगी? क्या आपको सच में लगता है कि ये लोग किसी साम्प्रदायिक ताक़त, भ्रष्ट सरकार, फासीवाद सरकार को हराकर देश और संविधान की रक्षा करने इकट्ठे हुए थे? ऐसा कुछ नहीं है। यो लोग चोरों की जमात हैं, जिनकी पतलून का नाड़ा किसी और के हाथ में है। सब एक-दूसरे का नाड़ा थामकर नंगे होने से बचना चाहते हैं।

इन नामों को गौर से सुनिए और याद कीजिए कि अभी हाल में इन्होंने क्या किया है: मायावती, अखिलेश, चंद्र बाबू नायडू, ममता, लालू, तेजस्वी, कुमारस्वामी आदि। याद कीजिए, नहीं याद आए तो इंटरनेट पर खोजिए। हर नाम के बाद करप्शन लिखिए, सही जगह पहुँच जाएँगे। 

ये सब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। देश सेवा ढोंग है इनके लिए, वरना देश और संविधान की क़समें खाने वाले लोग ये नहीं पूछते कि सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो दो, एयर स्ट्राइक में पेड़ टूटे या आदमी मरे। देश जैसी संस्था की परिकल्पना ये कर ही नहीं पाते, या समझ नहीं है। आप देश के नाम का नारा लगाते हुए अपनी ही सेना को कैसे ह्यूमिलिएट कर सकते हैं? आप पाकिस्तान के टीवी पर भारत के खिलाफ कैसे बोलते दिख जाते हैं? आप ऐसी बातें क्यों बोलते हैं जिसे पाकिस्तान की मीडिया ये कहकर चलाती है कि भारत में तो सत्तारूढ़ पार्टी के साथ बाकी पार्टियाँ हैं ही नहीं।

ये गठबंधन नहीं, ये बंधन है, जिसमें कई गाँठें हैं। गाँठें कैंसर का परिचायक होती हैं।

आर्टिकल का वीडियो यहाँ देखें


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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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