Tuesday, February 27, 2024
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मीया खलीफा, बक्कल और अल्ला हु अकबर से फायदा नहीं… किसानों के लाभ के लिए MSP से लेकर APMC तक कीजिए बात

किसानों के स्वघोषित नेताओं की ही नहीं बल्कि कृषि व्यापार हेतु बने एपीएमसी और सहकारिता का भारतीय कृषि में भूमिका पर पुनर्विचार होना आवश्यक है।

मोदी सरकार द्वारा संसद में पास किए गए कृषि संबंधी कानूनों के विरोध को लगभग एक वर्ष होने आए। पिछले वर्ष इसी महीने में सोशल और परंपरागत मीडिया में कानूनों को लेकर चर्चा और तमाम मंचों पर उनका राजनीतिक विरोध शुरू हो गया था। देश के कुछ राज्यों में राजनीतिक लोगों को इकट्ठा कर किसानों के पक्ष में लड़ाई लड़ने का माहौल बनाया गया।

जिन माँगों को लेकर न केवल राजनीतिक दल बल्कि किसान भी दशकों से परेशान थे उन्हीं के लिए कानून बनाए जाने के बाद उनका विरोध किया गया। बाद में ‘किसानों’ का आंदोलन खड़ा किया गया और तथाकथित तौर पर एशिया की जियो-पॉलिटिक्स को बदलने की क्षमता रखने वाली एक क्रांति का दावा किया गया। 26 जनवरी को जो हुआ, वह दुनिया ने देखा।

इस तथाकथित आंदोलन पर देश ने राहुल गाँधी, रियाना, मीया खलीफा, रवीश कुमार और ग्रेटा थनबर्ग जैसे विचारकों के तर्क और उनका वृहद दर्शन भी सुना। कालांतर में आंदोलन स्थल पर मारपीट, हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों का समावेश हुआ। जो-जो हो सकता था, लगभग वह सब हुआ पर इन कानूनों को लेकर ‘किसानों’ की आपत्ति का सही खुलासा न हो सका।

आपत्ति के नाम पर कभी सरकार द्वारा भविष्य में एमएसपी हटाने को लेकर शंका प्रकट की गई तो कभी उद्योगपतियों द्वारा किसानों की जमीन पर कब्ज़ा किए जाने की। इसी सोच को आगे रखकर उद्योग के विरोध में भी माहौल बनाया गया और पंजाब में कई जगहों पर रिलायंस के कम्युनिकेशन टॉवर उखाड़ दिए गए। एक दो जगहों पर तो टॉवर उखाड़ने के बाद वहाँ से लिए गए जनरेटर को गुरुद्वारे में उजाला करने के लिए रख लिया गया।

जैसा अक्सर देखा जाता है, जबरदस्ती खड़े किए गए आंदोलनों की प्रासंगिकता बनाए रखना बड़ी मेहनत और ढिठाई का काम होता है। रोज मुद्दे खोजने पड़ते हैं। इस किसान आंदोलन को ही देखें तो पाएँगे कि इसे लगातार चलाने के लिए नाच-गाने से लेकर ऊँची कूद और दौड़ से लेकर रक्तदान शिविर तक आजमाया जा चुका है। ट्रैक्टर रैली की वजह से क्या हुआ, वह सबने देखा है।

यही कारण है कि इस तथाकथित आंदोलन को चलाने वाला नेता पहले “बक्कल उतार दिए जाएँगे” का नारा लगाने के बाद बताता था कि “जम्मू-कश्मीर से 370 हटने की वजह से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।” अब बक्कल खोलने की बात के साथ कहता है अल्ला हु अकबर। उसके समर्थन में खड़े लोग यह दावा करते हैं कि सीएए और एनआरसी से कृषि और किसानों का बड़ा नुकसान हुआ है इसलिए सीएए और एनआरसी को हटाना होगा। इसके अन्य नेता जो यह दावा करते रहे कि यह आंदोलन राजनीतिक नहीं है, अब अपनी पार्टी बनाकर पंजाब में चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं।

सब कुछ हो चुका है पर कृषि कानूनों पर किसानों की आपत्ति को लेकर न तो कहा गया और न ही सुना गया। कुछ विशेषज्ञ और राजनीतिक या सामाजिक पंडित चाहे जो कहें पर किसान आंदोलन चलाने वाले नेताओं ने अब तक चन्द्रमा की तरह सारी कलाएँ दिखा दी हैं। साथ ही ये नेता बार-बार भाजपा को आगामी चुनावों में हराने की धमकी देते रहते हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि राकेश टिकैत या चढुनी की राजनीतिक शक्ति कितनी है। प्रश्न यह है कि किसानों के नेता बने ये लोग क्या किसानों के हितों की रक्षा करने में सक्षम हैं? प्रश्न यह भी है कि अभी तक इस आंदोलन की आड़ में ये जो कुछ करते रहे हैं, उससे आम भारतीयों के मन में किसानों की कैसी छवि बनी है और उससे देश के किसानों के दीर्घकालीन हितों को ठेस पहुँच रही है या नहीं?

समय आ गया है कि खुद को किसानों का हितैषी बताने वाले नेता और विशेषज्ञ इस बात पर विचार करें और खुद से सवाल करें कि किसानों के नाम पर जो वे करते रहे हैं उससे किसानों का कितना लाभ हुआ है? किसानों के स्वघोषित नेताओं की ही नहीं बल्कि कृषि व्यापार हेतु बने एपीएमसी और सहकारिता का भारतीय कृषि में भूमिका पर पुनर्विचार होना आवश्यक है।

यह ऐसा विषय है, जिस पर कभी बहस ही नहीं हुई। ऐसे में बिना बहस के दशकों से बनी एकतरफा धारणाओं पर बहस या पुनर्विचार करने में कोई बुराई नहीं। देश जब राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था या अन्य और क्षेत्रों में दशकों से स्थापित मान्यताओं और धारणाओं की जाँच कर रहा है तो कृषि और संबंधी धारणाएँ इस प्रक्रिया से अछूती क्यों रहे? वैसे भी पहले से लागू कृषि कानून, सहकारिता कानून और स्थापित तरीकों को आजमा कर यदि सत्तर वर्षों के बाद भी किसान परेशान हैं तो यह सरकार, समाज और अन्य हिस्सेदारों की जिम्मेदारी है कि वे कुछ नया आजमाएँ।

वर्तमान सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानून इसी दिशा में एक प्रयास थे पर उसे लागू न किए जाने और उसका निराधार विरोध अभी तक इन प्रयासों को रोकने में सफल रहा है। नए कानूनों को लेकर सरकार का विश्वास अभी तक डगमगाता हुआ दिखा नहीं है और यह बात कृषि सुधारों की आवश्यकता के पक्ष में जाती है। ऐसे में यह सोचना कि सरकार के ये कानून अभी तक पहले की सरकारों द्वारा कृषि पर व्यक्त की गई चिंताओं की तरह ही केवल कॉस्मेटिक बदलाव के लिए पास किए हैं, सही नहीं होगा।

ऐसा सोचने वालों को पिछले कुछ वर्षों में कृषि सुधार को लेकर वर्तमान सरकार के व्यावहारिक कामों को देखने की आवश्यकता है। यही कारण है कि वर्तमान में चल रहे कृषि आंदोलन को दो राज्यों के बाहर न्यूनतम समर्थन भी नहीं मिला है और अधिकतर अन्य राज्यों में कृषि संबंधी कामकाज सामान्य रहे हैं। कृषि कानूनों के लागू होने के बाद जिस तरह के बदलाव की उम्मीद की जा रही है वे बहुत तेज होंगे और देश के किसानों, कृषि उत्पादों के व्यापारियों और सरकार की संस्थाओं को इस बदलाव के लिए समय पर तैयार रहने की आवश्यकता है।

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