Tuesday, August 3, 2021
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भीम-मीम का नया शिगूफा: जो विशेष मजहब खुद को हिंदुस्तानी नहीं मानते वे आंबेडकरवादी क्या बनेंगे

"तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे से मुस्लिम समाज बेहद आहत था, लेकिन उसने प्रतिरोध नहीं किया और फिर उन्हें CAA-NRC के मुद्दे पर लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया कि वह अपने अस्तित्व की लडाई लड़ें।"

देश में सीएए लागू हुआ ही था कि देश के अलग-अलग हिस्सों से इसके विरोध के नाम की खबरें आने लगीं। कहीं विरोध को शांति पूर्वक रखा गया तो कहीं इसे हिंसा का रूप दे दिया गया, तो कहीं सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया, तो कहीं इसी विरोध के नाम पर हिंदुओं को निशाना बनाया गया। जैसे कि, दिल्ली में सीएए विरोध के नाम पर हुई हिंदू विरोधी हिंसा।

इसे लेकर केंद्रीय मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री और खुद गृहमंत्री अमित शाह ने अपना बयान दिया और कहा कि सीएए देश के किसी भी व्यक्ति की नागरिकता लेता नहीं बल्कि यह नागरिकता देने वाला कानून है। इसके बाद भी आज तक कोई भी प्रदर्शनकारी यह नहीं बता सका कि हम इसका विरोध क्यों कर रहे हैं। अगर आप भी जानना चाहते हैं कि ये लोग विरोध क्यों कर रहे हैं तो आज आप भी जान लीजिए।

बीते दिन क्विटं हिंदी ने अपने पोर्टल पर एक खबर अपलोड की, जिसमें सीएए विरोध करने के चौंका देने वाले सभी कारण आपको मिल जाएँगे और देश को तोड़ने वाली योजनाओं के बारे में भी आपको जानकारी हो जाएगी। लेख में लेखने शाहीन बाग से अपना विचार देने की शुरूआत करते हैं और कहते हैं कि सीएए के खिलाफ शाहीन बाग में जारी धरना लोगों के लिए एक मिशाल बन गया है, जिसमें मुस्लिमों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।

आगे लेखक ने लिखा, “तीन तलाक और राम मंदिर के मुद्दे से मुस्लिम समाज बेहद आहत था, लेकिन उसने प्रतिरोध नहीं किया और फिर उन्हें (मुस्लिमों को) CAA-NRC के मुद्दे पर लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया कि वह अपने अस्तित्व की लडाई लड़ें।” अब आपको जानकार हैरानी होगी कि यह लेखक कोई मुस्लिम नहीं बल्कि डॉ उदित राज, पूर्व लोकसभा सांसद और कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैंस जिन्होंने अपने लेख में हिंदुओं और हिदुत्व के खिलाफ जमकर जहर उगला और इसे हवा दी उस पोर्टल क्विंट हिंदी ने जो एक प्रोपेगेंडा के तहत खबरें चलाता है।

सवाल खड़ा होता है जो कानून संसद से पास होकर देश में लागू हुआ हो उसी कानून के खिलाफ वह पूर्व सांसद लोगों को भड़काने में लगे हुए हैं, जिसे जानकारी है कि यह कानून भी संदिवधान के तहत संसद से पास हुआ, लेकिन उनके इस लेख ने उनके चेहरे से नकाब हटा दिया और पूरे लेख में जय भीम जय मीम का राग अलापते रहे। लेखक ने आगे लिखा कि पहली बार ऐसा हुआ कि सीएए विरोध के दौरान अल्पसंख्यक और बुद्धिजीवी समाज में डॉ अम्बेडकर को अपनाया गया। दोनों की दोस्ती जमीन पर पैदा हुई और इसके बड़े राजनैतिक और सामाजिक परिणाम अवश्य होने वाले हैं। लेखक यहीं नहीं रुके और गँभीर परिणाम की ओर इशारा करते हुए लिखा, “CAA-NRC के विध्वंसक परिणाम तो होंगे ही, लेकिन इस सबसे बीच एक अच्छी बात यह हुई है कि मुस्लिम समाज पहली बार अपने लिए इतने दमखम से मैदान में उतरा है। अब जब वह मैदान में उतरा है, तभी तो अपने सही दोस्त और दुश्मन कि पहचान कर पायेगा।”

लेखक उदित राज का आगे दुख भी झलका और लिखा, “दलित-मुस्लिम एकता का प्रयास तो कई बार हुआ लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। एकजुटता की पहल अक्सर दलितों की तरफ से होती रही है। मुस्लिम समाज को सब्र से काम लेना होगा क्योंकि वो कभी दलित उत्पीड़न या उसकी लड़ाई में साथ नहीं आए।” वहीं लेख यह लिखना भूल गए कि जो मुस्लिम कभी अपने को भारतीय तक नहीं मानता तो आखिर वही मुस्लिम दलितों के साथ या आंबेडकरवादी कैसे हो सकता है।

खैर, आगे उदित ने एक बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि मुस्लिमों के बाद अगर CAA-NRC के खिलाफ आन्दोलन में कोई समाज सबसे बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी कर रहा है तो वो दलित समाज ही है। उसका कारण भी है, क्योंकि दलित समाज का मानना है कि बीजेपी-संघ मिलकर देश के संविधान को नष्ट करना चाहते हैं। इसके बाद उदित ने खुद को मुस्लिम हितैशी साबित करते हुए कुछ आँसू अपनी हथेली पर गिराए और लिखा, “बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से प्रताड़ित मुस्लिम भारत में नागरिकता नहीं ले सकते। बाकी शेष अन्य धर्म के लोगों के लिए भारतीय नागरिकता का दरवाजा खुला है। इससे दलित समाज भावुक रूप से आहत हुआ।”

आगे राज ने अपने लेख में यह तो बता दिया कि बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को लाखों लोगों के साथ हिन्दू धर्म छोड़कर के बौध धर्म अपनाया था, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उन्होंने(बाबा साहब ने) इस्लाम को क्यों स्वीकार नहीं किया। जिसे आज आप जबरन अपने गले लगाना चाहते हैं। इतना ही नहीं बाबा साहब ने यूँ ही नहीं लिखा था मुस्लिमों के लिए, “वतन के बदले क़ुरान के प्रति वफादार हैं मुस्लिम। वो कभी हिन्दुओं को स्वजन नहीं मानेंगे।” वहीं उदित राज ने लेख के अंत में यहाँ तक लिख दिया कि मुस्लिमों के साथ दलितों की भी लड़ाई हिंदुत्व के खिलाफ है

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