थरूरों, योगेंद्र यादवों, येचुरियों को जनादेश ने पीट कर सुन्न कर दिया, लेकिन इनकी ऐंठ कायम है

इनके लिए यह समझना मुश्किल है कि भला एक टॉयलेट, बिजली, सिलिंडर जैसी चीजों को पाकर कोई इंसान इतना निहाल कैसे हो सकता है कि 'सदियों की प्रताड़ना के बदले' का सपना भूल जाए, 'सेक्युलरिज़्म' जैसी 'पवित्र' वस्तु को दाँव पर लगा दे, जीडीपी के तिमाही आँकड़ों का उसे फर्क न पड़े।

मोदी की सुनामी के बाद विपक्षी दलों से लेकर मीडिया तक सभी के लिए यह आत्मचिंतन, आत्ममंथन का समय है- यह सोचने और मनन करने का समय है कि हमसे गलती भला कहाँ हो गई, कहाँ पर जनता का और हमारा साम्य इतना टूट गया कि एक ओर हम मोदी की हार को लेकर आश्वस्त हो गए, और दूसरी ओर जनता ने मतप्रतिशत, कुल सीटें, मत-संख्या, हर पहलू में मोदी को 2014 से ज्यादा ही समर्थन दिया।

मगर कोई भी बड़ी पार्टी या नेता खुल कर, बिना किसी अगर-मगर के बहाने के यह तक मानने को तैयार नहीं दिख रहा है कि उनसे मूलभूत, वैचारिक स्तर पर कोई गलती भी हुई है, तो सुधार तो दूर की कौड़ी है। अखिलेश यादव प्रवक्ताओं को निकाल रहे हैं, मानो उनका ‘संदेश’ (जोकि केवल एक जातिवादी, अवसरवादी गोलबंदी थी) अपने आप में कोई बड़ा क्रांतिकारी चमत्कार था, जिसे प्रवक्ता ज़मीन पर नहीं ले जा पाए (जोकि असल में नेता की जिम्मेदारी होती है, प्रवक्ता की नहीं)। उसी तरह कॉन्ग्रेस में राहुल गाँधी के इस्तीफे का नाटक चल रहा है-CWC यह मानने को नहीं तैयार कि राहुल गाँधी के चेहरे को ही जनता का सबसे बड़ा ‘रिजेक्शन’ मिला है, और उस चेहरे के अलावा पार्टी में सबकुछ बदलने के लिए तैयार है।

दर्प अभी भी हावी

और यह “हम और हमारे विचार तो गलत हो ही नहीं सकते” का दर्प उन कुछ नेताओं की बातों में भी साफ है जिनके इंटरव्यू इस हार के बाद सामने आ रहे हैं। मैं दो उदाहरण शशि थरूर और माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के लूँगा। दोनों ने ही इंटरव्यू तिरंगा टीवी पर करण थापर को दिए गए हैं, और दोनों ही ‘डिनायल’ से भरे हुए हैं- जनता साम्प्रदायिकता की तरफ मुड़ रही है, संविधान खतरे में है, भाजपा संवैधानिक संस्थाओं को अपना गुलाम बना रही है, उसे केंद्र की सत्ता में होने का लाभ मिला, मोदी ने अपने व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द के एक नया ही पंथ (पर्सनालिटी-कल्ट) खड़ा कर दिया (अंबानी के) पैसे से, और हमारी हार इन्हीं सब वजहों से हुई।

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दोनों ही वैचारिक रूप से अपनी गलती एक राई-माशा भी मानने को तैयार नहीं हैं। न ही उनके हिसाब से भारत के विकृत सेकुलरिज़्म में किसी बदलाव की आवश्यकता है, न ही हिन्दू आतंकवाद और हिन्दू फासीवाद का शिगूफा छेड़ना गलती थी। जाति के आधार पर गोलबंदी कर भाजपा को हराने का व्यूह रचना भी सही था, अंबेडकर के महिमागान की आड़ में दशकों से सवर्णों को दुष्ट उत्पीड़कों के रूप में चित्रित करना भी सही था; बेरोजगारी के बढ़ा-चढ़ा कर किए गए दावे भी सही थे, और नोटबंदी-जीएसटी का दुर्भावनापूर्ण विरोध भी सही था।

येचुरी सबरीमाला को मुद्दा मानने से ही मना कर देते हैं- उनके अनुसार ‘कोर्ट के फैसले के बाद हमारी राज्य सरकार के हाथ बँधे थे’। या तो वह जनता को मूर्ख समझते हैं, या शायद खुद ही भूल गए कि उनकी सरकार के चंगुल में चल रहे त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने फैसले का अनुमोदन करते हुए पुनर्विचार याचिका का विरोध करते हुए प्रतिबंधित आयु-वर्ग की महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था। उसी तरह शशि थरूर कुतर्कशास्त्र का नया अध्याय लिखते हुए बताते हैं कि चूँकि वायनाड (जहाँ, यह जान लेना जरूरी है कि, हिन्दू अल्पसंख्यक हैं) की जनता ने राहुल गाँधी को रिकॉर्ड मतों से जिता दिया, और इसलिए अमेठी से उनका नकारा जाना (पता नहीं कैसे) नकारे जाने में नहीं गिना जाएगा।

एलीटिज़्म का चरम

अपनी शाब्दिक परिभाषा के अनुसार एलीट (अभिजात्य वर्ग का) होना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन एलीटिज़्म को सर पर हावी हो जाने देना गलत है, यह मान लेना गलत है कि अगर मैं अपने किताबी ज्ञान या फलाना प्रतिभा के वर्ग में चोटी पर हूँ तो न केवल इस कारण मैं हर चीज़ का विशेषज्ञ हो गया, बल्कि मेरे ‘नीचे’ आने वाले हर व्यक्ति के जीवन को मैं बेहतर जानता हूँ, और उसे मेरे हिसाब से चलना चाहिए। एलीट सेंट स्टीफेंस के छात्रों, येचुरी और थरूर की, यही समस्या है।

इन्हें पहले तो यह लगा कि एक बार अपनी प्रतिभा से सेंत स्टीफेंस जैसे एलीट कॉलेज पहुँच गए तो इन्हें जिंदगी भर बाकी लोगों को क्या सोचना चाहिए, कैसे चलना चाहिए, इसका ‘हुक्म’ देने का हक मिल गया है। वही हक़ 2014 में चला गया जिसे यह लोग 2019 की हार के बाद भी नहीं स्वीकार पा रहे हैं। चूँकि यह लोग जड़ से, ज़मीन से कटे हुए हैं, इसीलिए इनके लिए यह समझना मुश्किल है कि भला एक टॉयलेट, बिजली, सिलिंडर जैसी चीजों को पाकर कोई इंसान इतना निहाल कैसे हो सकता है कि ‘सदियों की प्रताड़ना के बदले’ का सपना भूल जाए, ‘सेक्युलरिज़्म’ जैसी ‘पवित्र’ वस्तु को दाँव पर लगा दे, जीडीपी के तिमाही आँकड़ों का उसे फर्क न पड़े।

दिल्ली के शैम्पेन लिबरल बनने के बाद ज़ाहिर तौर अपनी खुद की मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि इनके जेहन से बाहर है, तभी इन्हें यह नहीं समझ में आ रहा कि स्वरोजगार के लिए एक मुद्रा लोन पा लेने या एक टिकट बुक/कैंसिल करने के लिए रेलवे के चक्कर काटने से निजात भर पाकर कोई इंसान इतना ‘स्वार्थी’ कैसे हो सकता है कि राहुल गाँधी के राफेल के शिगूफे पर ध्यान न दे!

भूल तो अपनी जड़, अपनी शुरुआत ‘दलित आईकन’ मयावती भी गईं थीं- जिस गेस्टहाउस कांड को दुधारू गाय की तरह दूह कर उन्होंने गरीब अनुसूचित जाति वालों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करते हुए सपा के गुंडों से पिटने के लिए आगे कर दिया, अपना उल्लू सीधा करने के लिए उन्हीं गुंडों को वोट देने के लिए उन्हीं मजलूमों को ‘हुकुम’ जारी कर दिया। यह भी एक तरह का ‘एलीटिज़्म’ था- उन्होंने सोचा कि उनकी सुनहरी सैंडिल देख वह वर्ग खुद के पैरों की बिवाई भूल लहालोट हो जाएगा।

योगेंद्र यादव और शेखर गुप्ता की ‘लगभग ईमानदार’ गलती की स्वीकृति

इन ‘बड़े’ नेताओं के बालू में सर छुपाए झूठ के मुकाबले तो एडिटर्स गिल्ड वाले शेखर गुप्ता और नेता-से-ज्यादा-निर्वाचन-विश्लेषक योगेंद्र यादव (योया) की स्वीकारोक्ति अधिक महत्वपूर्ण और ईमानदार है। शेखर गुप्ता ने हाल में यह माना कि मोदी सरकार की जनकल्याणकारी स्कीमों से देश को निश्चय ही फायदा हुआ है- और पत्रकारिता के समुदाय विशेष को भी यह फायदा दिखा तो जरूर, मगर उन्होंने घरों में सिलिंडर देख कर आँखें फेर लीं

योगेंद्र यादव इससे भी आगे बढ़ गए। उन्होंने माना कि मोदी-विरोधियों ने नाहक ही राष्ट्रवाद को बदनाम किया, और केवल और केवल नकारात्मकता की राजनीति की। उन्होंने यह भी माना कि सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवादी गोलबंदी ही हुई है। सेक्युलरिज़्म के नाम पर मुसलमानों को डरा-धमका कर गोलबंद किए जाने की बात भी उन्होंने मानी।

हालाँकि विकृत सेक्युलर कीड़े के जहर से ‘योया’ जी अभी भी पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हैं। उन्होंने हिन्दुओं के मुद्दों पर बात किए जाने को भी हिन्दुओं को उसी तरह भय के माहौल में डाला जाना बताया जैसा सत्तर साल मुसलमानों के साथ गैर-भाजपा दलों ने किया है।

यह पूरी तरह गलत और झूठ है, क्योंकि एक तो हिन्दू मुसलमानों के उलट 70 साल इस देश के विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग नहीं बल्कि 70 साल से नज़रअंदाज़ किया गया समुदाय हैं, दूसरा, मुसलमानों के उलट हिन्दू माँगें अभी भी किसी विशेषाधिकार की नहीं, बल्कि सामान्य बराबरी की माँगें हैं- हमारे मंदिरों में सरकारें दखल देना और उनके खजाने को जोंक की तरह चूसना बंद करें, संविधान के अनुच्छेद 25-30 में प्रदत्त आस्था को सुरक्षा देश के हर समुदाय के लिए दी जाए, RTE के अनुपालन से पड़ने वाला आर्थिक बोझ केवल हिन्दुओं के स्कूलों को ढोने के लिए मजबूर न किया जाए, इत्यादि।

योया जी यह ‘बैलेंसिंग एक्ट’ बंद करें- इससे वह जहाँ से शुरू होते हैं, घूम फिर कर वहीं दोबारा पहुँच जाते हैं। बाकी की पार्टियों ने तो लगता है दुराग्रह की जमीन में ही पैर धँसाए रखने की कसम खाई हुई है।

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