Tuesday, November 24, 2020
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शिक्षक दिवसः नेहरू के यूरोपियन पाठ का सरकारी पर्व

इस लेख का उद्देश्य शिक्षक-दिवस का विरोध नहीं है, बल्कि अपने स्वर्णिम अतीत और परम्परा का ज्ञान कराना है, क्योंकि कहते हैं कि जो देश अपनी परम्परा को नहीं जानता वह आज नहीं कल मृत हो जाता है और भारत न कभी मरा है और न आगे मरेगा।

स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति (जो कि पेशे से शिक्षक भी थे) सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को भारत सरकार शिक्षक दिवस के रूप में मनाती है। कहते हैं राधाकृष्णन ने ख़ुद ही अपने विद्यार्थियों के समक्ष यह इच्छा ज़ाहिर की थी कि उनके जन्मदिन को शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाए। सरकार की सहमति के बाद सरकारी शिक्षण संस्थानों में बड़े तौर पर इस दिन को इसी तरह सेलिब्रेट करने की परंपरा शुरू हो गई।

बचपन से इस दिन को स्कूलों और फिर कॉलेजों में हमने बहुत भावुक मन से इसे सेलिब्रेट किया है। लगभग हर स्कूल में इसदिन विद्यार्थी शिक्षक की भूमिका में आकर जूनियर क्लासेज में कक्षाएँ लेते हैं और अपने शिक्षकों को इसदिन कक्षा लेने के कार्यभार से मुक्त रखते हैं। कॉलेज में शिक्षक समुदाय के समक्ष तरह-तरह के कार्यक्रम कर विद्यार्थी अपनी प्रसन्नता और शिक्षकों के प्रति अपने सम्मान को प्रकट करते हैं।

आज के दिन हर विद्यार्थी अपने संस्थान के शिक्षक समुदाय के प्रति अपनी कृतज्ञता और सम्मान को तरह-तरह से प्रकट करता है। एक परंपरा यह भी है कि सारे विद्यार्थी आज के दिन अपने शिक्षकों को उपहार के रूप में बुद्धि के देवता गणपति की मूर्तियाँ भेंट करते हैं।

असल में मनुष्य एक उत्सवधर्मी प्राणी होता है। उसने अपने भीतर की खुशी और उर्जा को प्रकट करने के लिए ही विभिन्न पर्वों की सृष्टि की है। धरती पर जितनी भी जातियाँ हैं, जितने भी संप्रदाय हैं, जितने भी धर्म हैं, जितने भी लोग हैं सबकी अपनी-अपनी रीतियाँ हैं, तौर-तरीके हैं, पर्व हैं, त्योहार हैं। इन्हीं के माध्यम से लोग अपने होने को मानो प्रकट करते हों। आज भारत में परवर्ती पूँजीवाद का जन तो और ज़्यादा उत्सवधर्मी हो गया है। वह तो उत्सव मनाने और सेलिब्रेट करने के और-और बहाने खोजने लगा है। उसके पास पूँजीवाद ने इतना तनाव और अकेलापन सृजित कर दिया है कि वह छुट्टियों और सेलिब्रेशन के हर मौके पर एक तरह से टूट पड़ता है। यह जन इस दिन (शिक्षक-दिवस) को भी किसी ऐतिहासिक पर्व की तरह ही लहालोट होकर मनाता है।

साभार : सुदर्शन पटनायक

भारत के जन के लिए शिक्षक-दिवस भी एक आदर और सम्मान प्रकटीकरण का पर्व हो गया है और इसदिन को हर भारतीय विद्यार्थी अति भावुक मनःस्थिति से मनाता और प्रकट करता है। दुनिया के और देशों में शिक्षक-दिवस अलग-अलग दिन मनाए जाते हैं। सबके शिक्षक दिवस के अलग-अलग प्रतीक पुरुष और कारण हैं जैसे भारत के लिए सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन- कारण है।

यह लेकिन इतना सरल और सीधा मसला नहीं है जितना ऊपर-ऊपर दिख रहा है और विशेषकर भारत जैसे देश में तो यह और भी समस्यामूलक है क्योंकि भारत की समझ, उसकी संस्कृति किसी भी और देश से न सिर्फ भव्य और उन्नत है, बल्कि प्रतीक और मूर्ति पूजक होने के कारण भारतीय संस्कृति और ज़्यादा फोकस्ड और बोल्ड है।

यहाँ गुरु-पूर्णिमा का एक अनोखा पर्व मनाया जाता रहा है जो वेद-व्यास (पीठ) के जन्मदिन को सेलिब्रेट कम, उनके प्रति सम्मान प्रकट का पर्व ज़्यादा है। भारत की हिन्दूवादी विचारसरणी लेखकों और पुस्तकों को संस्कृति निर्माता के पद पर आसीन करती है। वह मानती है कि किसी भी संस्कृति और सत्य के निर्माता तथा अन्वेषक लेखक ही होते हैं। हिन्दूवादी विचारसरणी लेखकों को ऋषि और द्रष्टा कहकर पूजती रही है। इस विचारसरणी के लिए पुस्तकें केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि धार्मिक महत्व की, पूजा की वस्तुएँ होती हैं।

पूरी दुनिया में हिन्दूवादी विचारसरणी के अतिरिक्त शायद ही कोई विचारसरणी या वैचारिकी होगी जो लेखकों, पुस्तकों और गुरुओं का ऐसा सम्मान करती हो। सिख, बौद्ध, जैन, नाथ आदि संप्रदाय तो गुरु को ही भगवान मानकर पूजते हैं। अब सवाल उठता है कि इस या ऐसे देश में अलग से एक शिक्षक दिवस की क्या आवश्यकता आन पड़ी होगी और यह दिन या पर्व कैसे और क्यों शुरू हुआ होगा?

असल में इसकी जड़ें थोड़ी पुरानी और गहरी हैं। इसके तार सात समुद्र पार यूरोप से जाकर जुड़ते हैं। बर्बर मध्यकालीन यूरोप ज्ञान के प्रकाश से रेनेसां कर सका और इस नवजागरणकालीन यूरोप ने अपनी उन्नति के मद में दुनिया को लाँघने का फैसला किया। इसी के अनंतर पूरी दुनिया में पहले व्यापार और फिर उनपर शासन का कार्य किया।

कहने का आशय है कि पूँजीवाद के उदय के साथ रेनेसां की पीठ पर सवार होकर यूरोप ने दुनियाभर को अपने अधीन कर लिया और शासित देशों को अपनी संस्कृति, अपने नियम, अपने सिविल कोड्स से लादकर उनके रीति-नीति और संस्कारों और नियमों को शिफ्ट कर दिया।

उन्होंने पूरी दुनिया को अपनी सुविधावाली जगह बना दी जिसे उपनिवेशवाद अथवा उनका ड्राइंग रूम कहा जाने लगा। इसी क्रम में उन्होंने जो सबसे ज़रूरी काम किया वह यह कि शासित देशों को अपनी तरह ढालने के लिए वहाँ अपनी तरह सोचने वाले दिमाग़ विकसित कर दिए जिन्हें साधारणतया नेटिव्स कहा गया।

2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में लॉर्ड मैकॉले ने उपरोक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए भारत में लागू किए जाने वाली अपनी शिक्षा-नीति की पृष्ठभूमि को एकदम साफ-साफ प्रकट करते हुए कहा था-

“मैंने भारतवर्ष के ओर-छोर का भ्रमण किया परन्तु मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो भिखारी हो, चोर हो। ऐसी अपार संपदा, इतने उच्च नैतिक आदर्श व इतने प्रतिभाशाली व्यक्तियों वाले देश को हम कभी जीत नहीं पाएँगे। लोगों के मन में आध्यात्मिक, धार्मिकता एवं अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति अटूट आस्था है। वे बड़े मनोबली हैं। यदि भारत को गुलाम बनाना है तो इस देश के मेरुदंड अर्थात् भारतीय आध्यात्मिक व सांस्कृतिक परम्पराओं को तोड़ना होगा। अतः मैं प्रस्ताव करता हूँ कि इसकी शिक्षा-पद्धति और इनकी संस्कृति को नष्ट करना होगा क्योंकि जब प्रत्येक भारतीय के मन में यह बात अच्छी तरह से घर कर जाएगी कि जो भी ‘विलायती’ है, वह उनके ‘देशी’ से श्रेष्ठ है, महान है, तब ये हीन-भावना से ग्रस्त होकर अपनी गरिमा, अपने संस्कार, स्वदेश-प्रेम व स्वाभिमान को खो देंगे। इनका मनोबल टूट जाएगा, तब हम वास्तव में अपने इरादे में कामयाब हो जाएँगे। तब सही मायने में भारत देश हमारा गुलाम बन जाएगा। इसलिए नई शिक्षा-नीति बनाकर वहाँ की प्राचीन शिक्षा प्रणाली एवं संस्कृति पर हमला किया जाए ताकि लोगों का मनोबल टूटे, वे विदेशी खासकर अँग्रेज़ी और अँग्रेज़ियत को अपनी तुलना में महान समझने लगें। तब वही होगा जैसा कि हम चाहते हैं। अपनी संस्कृति और स्वाभिमान को खोया हुआ भारत पूर्णतः गुलाम और भ्रष्ट भारत होगा।”

अँग्रेज़ों ने इसीलिए भारत में स्कूल-कॉलेज खोले। वे भारतीयों को शिक्षित नहीं बल्कि उनके अवचेतन में भारतीय ज्ञान और सभ्यता के प्रति हिकारत भरकर ईसाइयत और पश्चिम को श्रेष्ठ स्थापित करना चाहते थे। कमोबेश पूरी दुनिया में उन्होंने यही किया।

और मैकॉले की बातों में यह साफ-साफ प्रकट है कि उन्होंने भारत को खुद के देश से ज़्यादा सभ्य और मज़बूत संस्कृति वाला पाया था। तो असल में उनलोगों ने एक उन्नत संस्कृति वाले देश को नष्ट कर, आत्महीन कर अपनी संस्कृति को थोपने के लिए बस ज़मीन तैयार करने का काम किया था और नजीता सबके सामने है।

ऐसे उन्होंने भारत में यूरोप की नज़र से देखने वाला दिमाग़ तैयार किया जो 1947 में उनके जाने के बाद भी उनके प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ और भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर एक ऐसा देश बना दिया जो सच में, ज़मीन पर कहीं था ही नहीं। उसने यूरोप के मानकों के आधार पर भारत का निर्माण किया और यह नया भारत उस समय की राजनीति और उसके शीर्ष द्वारा ‘डिस्कवर्ड’ किया गया जिसकी कोई सच्ची ज़मीन थी ही नहीं।

दुनिया का कोई भी देश किसी अन्य की संस्कृति के आधार पर कभी भी सही मायने में उन्नत नहीं हो सकता। कोई भी देश अपनी विशिष्ट विशेषताओं और प्रवृत्तियों और संभावनाओं के आलोक में ही सच्ची गति पा सकता है। किसी और का तरीका उसकी मूल भावना की हत्या कर उसे एक कृत्रिम, मृत और नकलची पुतला ही बना सकता है, इससे ज़्यादा कुछ नहीं।

यहाँ अचानक नहीं था कि स्वतंत्र भारत में एक ऐसा बनावटी सिस्टम बना दिया गया जिसमें आमजन बाहर बैठकर उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने वाला बन गया। उन्हें इस नए बने सिस्टम में प्रवेश करने की इजाज़त ही नहीं थी। वे इस सिस्टम में असहज और अजनबी की तरह जीने को अभिशप्त हो गए।

कानून, संसद, सरकार, व्यवस्था, शिक्षा सब कुछ अंग्रेजी-यूरोपीय फ्रेम में ढाल दिया गया, जिसमें भारत का आमजन मिसफिट हो गया। इस नए बने कृत्रिम सिस्टम में भारत का आमजन खुद को ‘अन्य’ मानकर चलने लगा और उसे यह देश खुद से ज्यादा दूसरों का लगने लगा। यह सिस्टम बढ़ते-बढ़ते आज इतना बड़ा हो गया है कि अब अमीर और गरीब की खाई इतनी गहरी हो गई है कि पाटे नहीं पट रही है।

इसी क्रम में ही एक सभ्य और उन्नत संस्कृति वाले देश को उसकी जड़ों से काटकर अनाथ बना दिया गया ताकि अपने कोड्स, अपने तरीके लागू किए जा सकें। एक आत्महीन देश ही किसी ‘उन्नत’ देश को धन्यभाव से देखता और पिछलग्गू बन जाता है। नेहरू ने भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर असल में ऐसा ही देश बना दिया जो अपनी हर गति, हर उन्नति के लिए परमुखापेक्षी हो गया।

ऐसा ही देश निर्माण की जगह बनी बनाई वस्तुओं की प्रतीक्षा का आदी हो जाता है, उपभोक्ता हो जाता है। आज भारत वस्तुओं से लेकर विचार तक और मनोरंजन से लेकर पर्वों तक यूरोप-अमेरिका की तरफ टकटकी लगाए देखता एक उपभोक्तावादी देश ही तो हो गया है।

इसी क्रम में अंग्रेज़ों ने भारत को असभ्य देश बता कर उसे हिकारत से देखा, उसकी रीढ़ तोड़ी और मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि यह कैसा देश है जिसमें न सभ्यता है और न व्यवस्था। डॉ. कामेश्वर उपाध्याय अपने लेख में लिखते हैं कि अंग्रेजों ने कहा यह हिन्दू धर्म बड़ा अज़ीब है, 365 दिनों में 1660 पर्व मनाता है। इन पर्वों ने इन्हें कुंद कर दिया है। अतः सभ्य करने के क्रम में उन्होंने भारत के उन पर्वों को असभ्यता और पिछड़ेपन की तरह प्रचारित करना शुरू कर दिया। अंग्रेज़ों की फ्रेम्ड शिक्षा-पद्धति से पढ़ा भारतीय जनमानस इस धारा में बह भी गया।

उनके द्वारा निर्मित रेनेसां की अवधारणा और पैसे की ताकत ने उन्हें आधुनिकता और सभ्यता का प्रतीक पहले ही घोषित कर रखा था और लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा-नीति ने रही सही कसर भी पूरी कर दी और भारत की सांस्कृतिक रीढ़ टूट गई तथा वह एक आत्महीन, गौरवहीन, उपभोक्तावादी देश बन गया। तो ऐसा भारत आसानी से उनकी तरफ शिफ्ट हो गया। रही सही कसर अँग्रेज़ों के बनाए दिमाग़ (नेहरू आदि) ने पूरी कर दी। जिसने स्वतंत्रता के पश्चात भी भारत को अँग्रेज़ों से मुक्त होने नहीं दिया और आज भी भारत सांस्कृतिक-गुलामी का दंश झेलने को बाध्य है।

आज उन्हीं अँग्रेज़ों (ईसाइयों/यूएन) ने दुनियाभर में 1000 से भी ज़्यादा ‘डे’ घोषित कर दिए हैं। लेकिन यह उनकी नज़र में सभ्यता और व्यवस्था का सूचक है। यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि जिस देश में गुरु-पूर्णिमा जैसा पवित्र पर्व मनाया जाता रहा हो, उस देश में अलग से शिक्षक दिवस की क्या आवश्यकता आन पड़ी थी, तो शायद ही जवाब मिले।

पूरी दुनिया में लेखकों और साहित्य का इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि एक कवि (वेद व्यास) के जन्मदिन के दिन को पर्व की तरह, किसी धार्मिक महत्व के पर्व की तरह सेलिब्रेट किया जाता हो। पूरी दुनिया में साहित्य का ऐसा सम्मान विरले है। जिस देश में पुस्तकों को साहित्य न मानकर धर्म के प्रतीक की तरह पूजा जाता हो, वैसा समाज और देश इस दुनिया में नहीं ही होगा इस तथ्य को लॉर्ड मैकॉले समझ गए थे, लेकिन नेहरू नहीं समझ सके और उन्होंने भारत को उसकी मूल संस्कृति से काटकर यूरोप की संस्कृति और सिविल कोड्स से जोड़ना ज़्यादा उचित समझा।

नेहरू का ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ असल में हिन्दू संस्कृति वाले भारत को शिफ्ट कर आधुनिक यूरोपीय नज़र से एक सांस्कृतिक उपनिवेशवादी भारत को गढ़ना ही था। वे ऐसे ही खुद को ‘एक्सिडेंटल हिन्दू’ नहीं कहते थे। उनके अंदर भी भारत के इतिहास और संस्कृति को लेकर कहीं-न-कहीं हीन भावना था तभी महात्मा गाँधी के भारतवादी मॉडल को रिजेक्ट कर यूरोपीय मॉडल को भारत के लिए उपयुक्त माना। महात्मा गाँधी ने अँग्रेज़ों के जाने के बाद नेहरू को दो ज़रूरी सुझाव दिए थे। पहला, कॉग्रेस को भंग कर दो और दूसरा, भारत को ग्राम आधारित समाज की तरह विकसित करो जिसे भारत की मूल विशेषताओं के आलोक में नया भारत बन सके। नेहरू ने दोनों ही सुझावों को मानने से इनकार कर दिया।

वे खुद अंग्रेजी माध्यम के पढ़े-लिखे व्यक्ति थे तथा उन्हें विलायत में रहने आदि का लंबा अवसर मिला था। उनकी जीवनशैली और रहन-सहन भी यूरोप से प्रभावित थी। इन्हीं सब के प्रभाव में उन्होंने महात्मा गाँधी के आदर्शों को हाशिए पर करके एक यूरोप की नज़र का भारत फ्रेम्ड कर दिया।

इस फ्रेम में आज आसानी से यूएन द्वारा घोषित और पोषित नीतियाँ लागू कर दी जाती हैं। पितरों को इतना महत्व देने वाला देश जो कि उनके मर जाने के बाद भी उनके लिए 16 दिन का महत्वपूर्ण पर्व मनाता है और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर उनकी शांति की कामना करता है उस देश को ‘फादर्स डे’ जैसा एक अलग प्रतीक दिवस डे दिया गया। 30 दिनों तक अलग-अलग तरीके से स्त्रियों की शक्ति और महत्त्व के आगे नतमस्तक होकर उनके गुणों का गान करने वाली विचारसरणी को ‘मदर्स डे’ जैसा पर्व पकड़ा दिया गया और नेहरू के यूरोप माइंडेड फ्रेम में यह सब आसानी से अपनाया जाता रहा है।

भूमंडलीकरण असल में है क्या, यूरोप अमेरिका की जीवनशैली को अपनाकर उन्हीं की तरह जीना ही न। आज बहुलतावादी भारत ईसाई यूरोप की तरह एकत्ववादी हो गया है। विभिन्न भाषाओं और बोलियों वाला देश एक भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की माँग करता है, एक झंडा, एक संस्कृति, एक दृष्टि का हिमायती हो गया है, जबकि अँग्रेजों के आधार पर फ्रेमिंग के पहले इस देश में ऐसी कोई माँग या हिमायत नहीं थी। तमाम विविधताओं के बीच इस देश का मज़े में काम चलता था।

उस समय अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली आदि तमाम भाषाएँ थीं और सभी प्रसन्नतापूर्वक आत्मगौरव से रह रही थीं लेकिन आज अधिकतर भाषाएँ बोलियाँ होकर उपेक्षित, आत्महीन होने को अभिशप्त हो गई हैं। अँग्रेज़ों की तरह भारत को फ्रेम्ड करने से भारत की मूल आत्मा ही खो गई है। भारती की हिन्दूवादी विचारसरणी प्रकृत्या बहुलतावादी और अन्य को स्पेस देनेवाली विचारसरणी है, लेकिन इस नए फ्रेम ने उसे दबाकर एकत्ववाद को थोप दिया है।

यूरोप और उसकी दृष्टि ने असल में भारत को कुंद और संकुचित ही किया है। नेहरू ने यूरोप की तरफ मुँह करने की जगह अगर उसकी तरफ पीठ कर लिया होता और भारत को भारत की विशेषताओं के आलोक में गढ़ने का प्रयत्न किया होता तो संभवतः भारत बहुत पहले ही विश्व शक्ति बन गया होता।

भारत के पर्ववादी मानस और यूएन के ‘डे वादी’ मानस में ज़मीन आसमान का फर्क है। यूएन के यहाँ जहाँ भोगवादी मनःस्थिति प्रमुख है तो भारत के पास पवित्रता और कल्याण की भावना प्रमुख है। इस लेख का उद्देश्य शिक्षक-दिवस का विरोध नहीं है, बल्कि अपने स्वर्णिम अतीत और परम्परा का ज्ञान कराना है, क्योंकि कहते हैं कि जो देश अपनी परम्परा को नहीं जानता वह आज नहीं कल मृत हो जाता है और भारत न कभी मरा है और न आगे मरेगा।

अतः भारत के लोगों को अपनी परम्पराओं को यूएन की प्रतीकवादी राजनीति के बरअक्स स्थापित कर दुनिया को एक भव्य विकल्प देना चाहिए। जैसे कोरोना काल में ‘नमस्ते’ के महत्व को दुनिया ने मान दिया, वैसे ही जब वे भारत की और परम्पराओं से अवगत होंगे तो निश्चय ही यूरोप-अमेरिका की भोगवादी संस्कृति को छोड़ भारत से जुड़ना चाहेंगे। आत्मनिर्भर भारत, विश्व गुरु भारत और क्या है।

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आदित्य कुमार गिरि
मैं ख़ुद को खोज रहा हूँ। इसी क्रम में बहुत कुछ किया, बहुत सारी ग़लतियां भी हुईं, बहुत कुछ सीखा भी। अब शायद जीना आ जाये।शुरू में यह पीड़ादायक लगा लेकिन अब समझ में आ रहा है कि पीड़ा से ही सृजन होता है।

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