Friday, October 23, 2020
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कह के लूँगा, कह के लूँगा, कह के लूँगा… तेरी कह के लूँगा!

ये बौद्धिक डकैत और पॉकेटमार हैं। ये बसों में रामपुरी दिखाकर पर्स झिटकने वालों के समकक्ष रखे जाने वाले लोग हैं। इन्हें मतलब अपने फ़ायदे से है, वो फ़ायदे जो भी पार्टी इन्हें देगी, या देती रही है, ये उसके लिए अपील कर देंगे। ये वो लोग हैं जिन्हें पुलवामा पर पीएम की चुप्पी पर छप्पन इंच पर सवाल करने की आज़ादी होती है, लेकिन एक्शन लेते ही शांति की याद आती है।

जौन एलिया का एक शेर है (ये बस इसलिए लिख रहा हूँ कि शेर लिख कर शुरु करने वालों को गम्भीरता से लिया जाता है):

ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता/ एक ही शख़्स था जहान में क्या

हमारे देश के नौटंकीबाज़ जमात के लिए ये शेर, अपने अकेलेपन में, सटीक बैठता है। इनके भीतर खलबली मची हुई है। इनके साँसों की आवाजाही और धड़कनों की लब-डब तक मोदी ही मोदी है। इन्हें चैन नहीं है। ये अवार्ड वापसी दोहराना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक अपराध का शिकार अखलाख है कि मर ही नहीं रहा इस बार। ये लम्पट मंडली इतनी बेईमान है कि ईमानदारी से नाम तक नहीं लिख रही।

अरे चिरकुटो! अगर कहना चाहते हो कि मोदी को वोट नहीं देना है, तो कौन रोक रहा है? संविधान या मोदी की पर्सनल पुलिस? खुलकर लिखो कि मोदी को वोट मत दो, भाजपा को वोट मत दो। इसमें किस बात का डर है जबकि तुम्हारी लेजिटिमेसी तो वैसे भी है नहीं। उन्हीं चार चिरकुटों के साथ उठना-बैठना, वही घिसी हुई बातें हर सेमिनार में कहना, वही कुतर्क हर रोज करना… तुम्हें सीरियसली लेता कौन है?

मैं लेता हूँ, क्योंकि तुम्हारे जैसे लम्पटों की हर एक बात पर दस आर्टिकल लिखना ज़रूरी है। तुम्हें तुम्हारे ही खेल में, तुम्हारे ही नियमों के साथ, उन्हीं संसाधनों के प्रयोग से हराना है। इसलिए कीचड़ में भी उतरूँगा, सूअरों से भी लड़ूँगा, और उनकी गर्दन उन्हीं की विष्ठा में तब तक दबाए रखूँगा जब तक कि वो ठंढे न पड़ जाएँ। मैंने भी जान से मारने की बात नहीं की, बस ठंढा करने की बात की है क्योंकि ऐसे लोगों का ज़िंदा रहना बहुत ज़रूरी है। ये हमारे समाज के वो उदाहरण है जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ यह कह कर याद करेंगी कि किसी भी स्थिति में इतना नहीं गिरना है कि ऐसे बन जाएँ। साथ ही, भीतर से ही कुढ़ते रहने वाले माओवंशी कामपंथी वामभक्तों की दयनीय स्थिति किस दक्षिणपंथी को पसंद नहीं!  

ये दो सौ लोग जब सिग्नेचर कैम्पेन चलाते हैं, पाकिस्तान जाकर इनके मित्र नेता मोदी को हराने के लिए मदद माँगते हैं, जब सौ फ़िल्ममेकर लिखते हैं कि मोदी को वोट मत दो, तब इन्हें समाज से कुछ खास लेना-देना नहीं है। ये चुनावों से पहले एक वेबसाइट बनाते हैं, उस पर कहीं से फ़िल्मकारों की डायरेक्टरी निकाल लेते हैं, लेखकों के नाम इकट्ठा कर लेते हैं, और फिर एक स्टेटमेंट ड्राफ़्ट करके, इन्हें बिना बताए ही जारी कर देते हैं।

ये केयर फ़ॉर सोसायटी नहीं, रेलेवेंट रहने की जद्दोजहद है। इसी को शास्त्रों में फड़फड़ाना कहा गया है। ये तड़प आपसे वो सारे काम करवा लेती है जो आप शांत दिमाग से बैठकर सोचने पर तब तक नहीं करते जब तक आपके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न नहीं लगता। असफल लोगों की एक भीड़, उस पार्टी और उस प्रधानमंत्री को नीचे लाने की कोशिश में है जिसने उनका निजी हित नहीं साधा, बल्कि जिन ग़रीबों, वंचितों, दलितों, अल्पसंख्यकों की बात ये कर रहे हैं, उनके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाया है। 

पता कीजिए आँकड़े कि कितने करोड़ लोगों के सर पर छत आई, कितने घरों में सिलिंडर पहुँचाया, कितने घरों को किरासन तेल के दिये से मुक्ति मिली, कितने लोगों तक सब्सिडी का पैसा सीधा खाता में पहुँचा, कितनी गलियों को सड़क, और सड़कों को हाइवे बनाया गया, कितनी औरतों को आज अँधेरे में शौच के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता, कितने करोड़ लोग व्यवस्थित और अव्यवस्थित क्षेत्रों में रोजगार से जुड़े, कितने किसानों को क़र्ज़माफ़ी की जगह उन्हें इनेबल करने की कोशिश की गई, कितनी निर्मल गंगा हुई और कैसे यमुना को ज़िंदा करने की कोशिश जारी है, कितने आतंकी मारे गए, कितने जिले नक्सल प्रभाव से बाहर आए, उत्तरपूर्व में कितना ढाँचागत विकास हुआ… 

इसलिए, पहले महीने से ही ‘विकास कहाँ है’ की बात करने वाले, अब विकास की बात कर ही नहीं रहे। आप गौर कीजिएगा कि किस तरह से वैसी बातें की जा रही हैं जिसको आप चाहकर भी क्वांटिफाय नहीं कर सकते या गिन नहीं सकते। बात इस पर अब नहीं होती कि प्रतिदिन कितने किलोमीटर सड़कें बनीं, प्रति व्यक्ति सरकार कितने लाख रूपए प्रतिवर्ष ख़र्च कर रही है, हर क्वार्टर में अर्थव्यवस्था कैसे बेहतर हो रही है, सारी रेटिंग एजेंसियाँ, वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मोनेटरी फ़ंड क्यों इस सरकार के द्वारा किए गए सुधारों को सकारात्मक बताकर सराह रहे हैं… 

तब मूडीज एंजेंसी को डीलेजिटिमाइज कर दिया जाएगा। और ये काम होता कैसे हैं? ये काम हर बार एक ही कुतर्क के बहाने होता है: भारत की अर्थ व्यवस्था अगर इतनी ही अच्छी है तो लोग गरीब क्यों हैं, भूखे क्यों हैं? ये वही कुतर्क है कि आप मंगलयान भेज कर क्या करेंगे, लोग तो भूखे मर रहे हैं। ये बातें पहली बार सुनने पर ठीक-ठाक आदमी सोचने लगता है कि बात तो सही है, लेकिन यह बात बिलकुल वैसी ही है कि कोई कहे ‘कौआ तुम्हारा कान लेकर भीग गया’ और आप कौए के पीछे दौड़ रहे हैं। 

भारत में गरीबी भी है, भुखमरी भी है। आप खूब चमचमाती सड़क बना लीजिए, एक पत्रकार कहीं से उसके किनारे, फोटोशॉप करके ही सही, एक गरीब परिवार को ज़मीन पर खाता दिखा देगा। उसके नीचे एक कैची कैप्शन लगा देगा: क्या हमें ऐसा विकास चाहिए? जबकि, ये दोनों दो बातें हैं। गरीबी उन्मूलन पर कार्य हो रहे हैं, लेकिन ये जो लॉबी है, वो ऐसे कुतर्क करती है जिसका सीधा अर्थ यही समझ में आता है कि हर गरीब के सामान्य होने तक, विकास के सारे कार्य बंद कर दिए जाएँ। ऐसा तो है नहीं कि सरकार ने वंचितों की बेहतरी के लिए तय पैसे को मंगलयान में लगा दिया! लोककल्याणकारी कार्यों में सरकार प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष एक लाख रुपए से ज़्यादा ख़र्च करती है। लेकिन लॉबी को उससे मतलब नहीं है, आप खूब बड़ा पुल बना देंगे ताकि आने-जाने वालों को आसानी हो, एनडीटीवी वाले इस बात पर स्टोरी कर लेंगे कि अब उन नाव चलाने वालों का क्या होगा?

भारत में समस्याएँ दशकों से हैं, लेकिन समाधान अभी ही चाहिए। और कमाल की बात यह है कि इस सरकार ने यह तो दिखा ही दिया कि पिछली सरकारों से ज्यादा तेज़ी से, पारदर्शिता से, बेहतरी से कार्य हो सकते हैं। यही कारण है कि अब विकास को कोई नहीं ढूँढता, सबको साढ़े चार साल तक गंगा की बड़ी चिंता होती थी, और ‘फ़ंड कहाँ जा रहा है’ के मनचले सवाल किए जाते थे। टीवी के एंकर एक अश्लील हँसी हँसा करते थे। लेकिन सरकारी एजेंसियाँ नाले बंद करने में लगी थी, सीवेज़ ट्रीटमेंट प्लांट बनाने में लगी थी, बीस करोड़ लीटर कचरे को गंगा में उतरने से रोकने में लगी हुई थी। 

इसलिए अब नैरेटिव से विकास गायब हो चुका है, क्योंकि विकास हर जगह खड़ा है, मुस्कुरा रहा है। जिन्होंने अवसाद और फ़्रस्ट्रेशन में कैक्टस रगड़ लिया है, उन्हें नहीं दिखेगा। अब नैरेटिव में कॉन्ग्रेस पार्टी के डिम्पल वाले अध्यक्ष के ‘प्यार की राजनीति’ वाली लाइन आ गई है और उसे हमारे छद्म-बुद्धिजीवियों ने ले अपना बना लिया है।

आप बस यह सोचकर मुस्कुराइए कि हमारे बुद्धिजीवी कितने समझदार और क्रिएटिव हैं कि उन्हें राहुल गाँधी की लाइन चुरानी पड़ रही है। किस तरह की मजबूरी रही होगी इन लोगों की कि हर मुद्दा सिरे से नकार दिया गया है, क्योंकि हर बात पर आँकड़ों की भाषा विलग है, और अपील किस बात पर हो रही है: नफ़रत की राजनीति को नकारिए। 

अरे लम्पटो! नफ़रत की राजनीति तो तुम लोगों ने की है। मरने वाले की जाति तुम ढूँढते हो, भले ही वो निजी रंजिश की वजह से मरा हो; वेमुला लिखकर मरता है कि उसके नाम पर राजनीति न हो, लेकिन उसकी माँ को पैसे देने का वादा करके हर मंच पर घसीटते हो; नजीब अहमद की अहमियत जब तक थी, तुमने उसे खूब मुद्दा बनाया; जुनैद को तुमने बीफ का शिकार बता दिया, जबकि वो सीट की लड़ाई थी; दंगे भड़कें इसके लिए तुमने बीफ ईंटिंग फेस्टिवल कराए, लेकिन दंगे नहीं भड़के; तुमने कठुआ कांड पर आख्यान लिखे, कैम्पेनिंग की, और गीता को भूल गए; तुमने लिंचिंग की खूब बातें की और तुम्हारे लिस्ट से पुजारी, नारंग, राजीव, अंकित जैसे हिन्दू नाम गायब रहे… 

फिर तुम्हारी ज़मीन है कहाँ? तुम तो सड़े हुए लोग हो जिनकी चमड़ी से बदबू आती है क्योंकि उसके अंग-अंग से व्यक्ति विशेष से घृणा का पीब रिस रहा है। तुम्हारी कमाई क्या है? सत्ता की दलाली के बाद पाए अवार्ड जिनके मेमेंटो तुम लौटा देते हो, लेकिन पैसे और रॉयल्टी नहीं लौटाते। तुम क्या विरोध करोगे, तुम उस लायक नहीं हो, तुम्हारे विरोध में बेईमानी सनी हुई है। तुम्हारी औक़ात नहीं है विरोध करने की क्योंकि तुम भीतर से चोर हो।

ये तथाकथित लेखक और फ़िल्मकार घटनाओं को चुनकर प्रतिक्रिया देते हैं इसलिए इनके हर ट्वीट के नीचे सकारात्मक और नकारात्मक कमेंट का अनुपात दूसरी तरफ झुका हुआ होता है। नहीं, कोई आईटी सेल ऐसा नहीं करता, बस लोग उब चुके हैं। लोगों को इनकी नग्नता का एहसास हो चुका है। लोगों को पता चल चुका है कि इनके लिए किसी की मृत्यु एक मानव मात्र की मृत्यु नहीं है, बल्कि उसकी आइडेंटिटी का, उस समय की राजनैतिक परिस्थिति के साथ मैच करना ज़रूरी है, क्रांति तभी शुरु होगी। रोहित वेमुला की मौत के बाद चुनाव हो चुके थे, और एक डेंटल हॉस्पिटल में तीन दलित छात्राओं ने ख़ुदकुशी कर ली थी, ये ख़बर कभी एक ख़बर से ऊपर कुछ बन ही नहीं पाई। 

ये बौद्धिक डकैत और पॉकेटमार हैं। ये बसों में रामपुरी दिखाकर पर्स झिटकने वालों के समकक्ष रखे जाने वाले लोग हैं। इन्हें मतलब अपने फ़ायदे से है, वो फ़ायदे जो भी पार्टी इन्हें देगी, या देती रही है, ये उसके लिए अपील कर देंगे। ये वो लोग हैं जिन्हें पुलवामा पर पीएम की चुप्पी पर छप्पन इंच पर सवाल करने की आज़ादी होती है, लेकिन एक्शन लेते ही शांति की याद आती है। ये बहुत ही उच्च कोटि के निम्नस्तरीय लोग हैं। 

इसलिए, तरकश के तीर सँभालिए, उनकी नोक पर तर्क का लेप लगाइए, और हमेशा प्रत्यंचा तान कर रखिए कि छद्मबुद्धिजीवी के मुँह खोलने की कोशिश से पहले ही उसकी जीभ वेध दीजिए। याद है न, एकलव्य ने कुत्ते की आवाज सुन कर, एक के बाद एक सात बाण छोड़ कुत्ते का मुँह बंद कर दिया था?

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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