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मुस्लिम, यहूदी और ईसाई … महात्मा गाँधी की वो सोच, जिसके कारण भारत में इजरायली दूतावास खुलने में लग गए 45 साल

वर्ष 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने एक प्रस्ताव को पारित करके इजरायल और फिलिस्तीन के बंटवारे को मान्यता दी थी। भारत ने फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) को वर्ष 1974 में फिलीस्तीन का आधिकारिक शासक माना था। भारत ऐसा करने वाला पहला गैर-अरब देश था। हालाँकि, भारत ने इजरायल के साथ वर्ष 1992 में पूर्ण राजनयिक सबंध स्थापित किए थे।

इजरायल पर इस्लामी आतंकी संगठन हमास के हमले के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (PM Narendra Modi) ने इसकी आलोचना की है। भारत अपने मित्र इजरायल के समर्थन में खड़ा है। हालाँकि, हमेशा से स्थितियाँ ऐसी नहीं थीं। महात्मा गाँधी की सोच के कारण भारत ने आजादी के 45 सालों तक इजरायल से राजनयिक संबंध कायम नहीं किए।

महात्मा गाँधी के नाम से विख्यात मोहनदास करमचंद गाँधी की यहूदियों के प्रति सोच के कारण भारत ने आजादी के बाद से ही फिलिस्तीन का समर्थन किया। हालाँकि, आगे चलकर सन 1992 में भारत ने इजरायल के साथ राजनयिक संबंध भी स्थापित किए। दरअसल, महात्मा गाँधी इजरायल के निर्माण के ही पक्ष में नहीं थे।

महात्मा गाँधी ने 26 नवम्बर 1938 को पत्रिका ‘हरिजन’ में लिखा, “यहूदियों के लिए अपने देश की माँग मुझे प्रभावित नहीं करती।” आगे महात्मा गाँधी कहते हैं कि फिलिस्तीन अरबों का उसी तरह से है जैसे इंग्लैंड इंग्लिश लोगों का है और फ़्रांस फ्रेंच लोगों का है। यह गलत और अमानवीय होगा कि यहूदियों को फिलिस्तीनियों पर थोपा जाए।

साभार: हरिजन, वॉल्यूम-6, पेज- 352

महात्मा गाँधी यहूदियों के लिए अलग देश बनाने के विरोध में लिखते हैं, “यहूदियों की धार्मिक किताब में लिखा हुआ फिलिस्तीन कोई भौगोलिक अवस्था नहीं है। यह उनके मन में है। अगर यहूदी फिलिस्तीन में बसना भी चाहते हैं तो ब्रिटिश हथियारों के साये में ऐसा करना गलत है। कोई धार्मिक काम बम या बंदूकों की सहायता से नहीं हो सकता है। यहूदी, फिलिस्तीन में केवल अरबों की दया पर बस सकते हैं।”

गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक आज का फिलिस्तीन का इलाका तुर्किये के उस्मानिया साम्राज्य के कब्जे में था। प्रथम विश्व युद्ध में उस्मानिया साम्राज्य हार गया, जिससे इस जमीन पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। अंग्रेजों ने यहूदियों से यह वादा किया था कि उनका साथ देने पर यहूदियों अपनी जमीन मिलेगी।

अंग्रेजों ने अपने वादे को निभाया। आगे चलकर बड़े यहूदी व्यापारियों ने भी फिलिस्तीन में जमीनें खरीदीं। वहाँ पर पूरी दुनिया से यहूदी आकर बसने लगे। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी में हुए यहूदियों के साथ व्यवहार के बाद यह भावना और प्रबल हो गई।

उधर, महात्मा गाँधी यहूदियों पर हुए अत्याचार से पूरी सहानुभूति रखते थे। उन्होंने लिखा है, “मेरी पूरी संवेदनाएँ यहूदियों के साथ हैं। कुछ यहूदी दक्षिण अफ्रीका के दिनों से मेरे मित्र हैं। यहूदी उसी तरह ईसाईयत के अछूत हैं, जिस तरह हरिजनों को हिन्दुओं में बराबर नहीं समझा जाता।”

महात्मा गाँधी ने यहूदियों को अपनी माँगों को पूरा करवाने के लिए सविनय अवज्ञा का रास्ता अपनाने की सलाह दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि यहूदियों के साथ यूरोप में अत्याचार नहीं हुआ होता तो उनके फिलिस्तीन लौटने का प्रश्न ही नहीं उठता था।

जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों पर किए गए अत्याचार के बाद जुलाई 1946 में लिखे एक लेख में महात्मा गाँधी कहते हैं, “मेरे विचार में वह (यहूदी) अमेरिका और ब्रिटेन की सहायता से अपने आपको फिलिस्तीनियों पर जबरदस्ती थोप रहे हैं। अब वो ऐसा नंगे आतंकवाद के दम पर ऐसा कर रहे हैं।”

वर्ष 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने एक प्रस्ताव को पारित करके इजरायल और फिलिस्तीन के बंटवारे को मान्यता दी थी। भारत ने फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) को वर्ष 1974 में फिलीस्तीन का आधिकारिक शासक माना था। भारत ऐसा करने वाला पहला गैर-अरब देश था। हालाँकि, भारत ने इजरायल के साथ वर्ष 1992 में पूर्ण राजनयिक सबंध स्थापित किए थे।

बता दें कि इस बंटवारे को लेकर इजरायल और फिलिस्तीन में संघर्ष होता रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को फिलिस्तीन के आतंकी संगठन हमास के हमले में अब तक 1,300 इजरायली नागरिकों की मौत हो चुकी है। वहीं, लगभग 3,000 लोग घायल हैं। इजरायल ने भी इसके जवाब में बमबारी की है जिसमें 1,000 से अधिक फिलीस्तीनी आतंकी मारे जा चुके हैं।

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