प्रिय लम्पट बुद्धिजीवी गिरोह, भारत ने रोहिंग्या का ठेका नहीं ले रखा है

नार्थ ईस्ट और बंगाल में भी एक तय योजना के अनुसार कुछ पार्टियों ने बांग्लादेशी घुसपैठियों वोट बैंक बनाने के लिए राशन और आधार कार्ड देकर बस्तियों में बसा दिया था, अब एक सरकार इन ग़ैरक़ानूनी लोगों को बाहर क्यों न करे?

मोदी सरकार को लेकर शुरुआती समय से ही आलोचनाओं का हिस्सा बनाकर घेरा जाता रहा है, फिर चाहे वो देश के हित में ही क्यों न काम का रही हो। भारत में कुछ समय पहले तूल पकड़ने वाला रोहिंग्या लोगों से जुड़ा मामला भी इसी संगठित आलोचना का शिकार हो रहा है।

साल 2017 में अपने म्यांमार के दौरे के समय ही प्रधानमंत्री ने इस बात की घोषणा की थी कि वो रोहिंग्या मुसलमानों के निर्वासन पर विचार कर रही है। इस बात पर विचार करने के दौरान ये नहीं तय किया गया था कि इन लोगों को म्यांमार भेजा जाएगा या फिर बांग्लादेश भेजा जाएगा, क्योंकि उस समय बांग्लादेश में पहले से ही लाखों की तादाद में रोहिंग्या शरणार्थी रह रहे थे और म्यांमार इन्हें स्वीकारने के लिए किसी भी हाल में तैयार नहीं था।

ऐसे में अब 2019 के शुरुआती महीने में निर्वासन के डर से क़रीब 1300 रोहिंग्या लोगों ने बांग्लादेश में पलायन किया है, जिसकी वजह से नई दिल्ली को और केंद्रीय सरकार को काफ़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। कई बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार द्वारा इस मामले पर विचार किए जाने को नकारात्मकता के साथ पेश करने का भी प्रयास किया है, अलज़लजीरा की वेबसाइट पर हाल ही में आई रिपोर्ट में SAHRDC के रवि नैय्यर ने बताया कि भारत में पिछले साल से रोहिंग्या वासियों के लिए रहना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

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भारत मे लगातार औपचारिक गतिविधियों के नाम पर उनपर काग़ज़ी कार्रवाई से शोषण किया जा रहा है। उनका कहना है कि आँकड़ों के अनुसार जम्मू से त्रिपुरा और असम से पश्चिम बंगाल तक मे 200 से ज्यादा रोहिंग्या लोग ऐसे हैं जिन्हें पकड़ कर गिरफ़्तार किया गया है और सज़ा दी गई है। उनके अनुसार निर्वासन के डर से ही रोहिंग्या लोग बांग्लादेश की तरफ रुख़ कर रहे हैं, जहाँ पर पहले से ही लाखों के तादाद में शरणार्थी बसे हुए हैं।

अब सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत में अवैध ढंग से आए अप्रवासियों के लिए इतनी सहानुभूति दिखाने की उम्मीद आख़िर भारत से ही क्यों की जा रही है? जहाँ उत्तर-पूर्व में रह रहे 40 लाख अप्रवासियों के लिए पहले से ही नागरिकता क़ानून पर प्रक्रिया चालू हो, वहाँ पर और अलग से रोहिंग्या अप्रवासियों को देश मे रहने की अनुमति आख़िर क्यों दी जाए? 2017 के आँकड़ों के अनुसार भारत की जनसंख्या 1.339 बिलियन है, उस पर भी उनकी ज़रूरतों को न पूरा कर पाने का इल्ज़ाम अक्सर सरकार पर मढ़ दिया जाता है।

एक ओर तो भारत सरकार से नागरिकों के उत्थान की प्रक्रिया को और तेज़ करने की उम्मीद लगाई जाती है और वहीं दूसरी ही तरफ देशहित में सरकार के कड़े फ़ैसलों का विरोध भी जमकर किया जाता है। सवाल यह है कि भारत उन्हें क्यों रखे, किस आधार पर? बांग्लादेशियों के घुसपैठ से परेशान देश अभी भी नार्थ ईस्ट में स्थानीय नागरिकों से लगातार विरोध झेल रहा है। वहाँ एक तय योजना के अनुसार कुछ पार्टियों ने उन्हें वोट बैंक बनाने के लिए राशन और आधार कार्ड देकर बस्तियों में बसा दिया था, अब एक सरकार इन ग़ैरक़ानूनी लोगों को बाहर क्यों न करे?

बता दें कि भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या मुसलमानों को अवैध अप्रवासी बताते हुए उन्हें देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया था। इस बात के पीछे सरकार का ये तर्क था कि म्यांमार के रोहिंग्या लोगों को भारत देश में रहने की अनुमति देने से हमारे अपने नागरिकों के हित काफी प्रभावित होंगे और देश में तनाव भी पैदा होगा।

इस मामले पर गृह मंत्रालय के अधिकारी मुकेश मित्तल ने अदालत को सौंपे गए जवाब में कहा था कि अदालत द्वारा सरकार को देश के व्यापक हितों में निर्णय लेने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनका मत था कि कुछ रोहिंग्या मुसलमान, आंतकवादी समूहों से जुड़े हैं, जो जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और मेवात क्षेत्र में ज्यादा एक्टिव है, इन क्षेत्रों में इन लोगों की पहचान भी की गई है। इस मामले पर सरकार ने आशंका जताई थी कि कट्टरपंथी रोहिंग्या भारत में बौद्धों के ख़िलाफ़ भी हिंसा फैला सकते हैं।

ऐसी स्थिति में जब सरकार को रोहिंग्या घुसपैठियों पर संदेह हो, वह उन्हें भारत में रहने की अनुमति कैसे दे सकती है? क्या किसी और देश से इस प्रकार की उम्मीद की जा सकती है कि जहाँ आए दिन आतंकी हमलों की धमकी दी जा रही हो और फिर भी वह अपनी तरफ से कदम उठाने में सिर्फ इसलिए रुके क्योंकि राष्ट्रीय स्तर के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके फ़ैसलों की आलोचना की जा रही है।

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सबरीमाला मंदिर
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अवाला जस्टिस खानविलकर और जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने के पक्ष में अपना मत सुनाया। जबकि पीठ में मौजूद जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस नरीमन ने सबरीमाला समीक्षा याचिका पर असंतोष व्यक्त किया।

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