Wednesday, September 23, 2020
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राहुल गाँधी जी, हवाबाज़ी थोड़ा कम कीजिए! ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ ने ज़िंदगियाँ बदली हैं

शौचालय बच्चियों को शिक्षा से जोड़ने की समस्या का सिर्फ़ एक हिस्सा था। असली चुनौती बालिकाओं की शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने और उनका दृष्टिकोण बदलने की थी। परिणामस्वरूप, पूरे देश में जागरूकता फैलाने का एक अभूतपूर्व व्यापक अभियान शुरू किया गया।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नज़दीक आता जा रहा है, कुछ पत्रकारों ने चुनिंदा आँकड़े परोसना शुरू कर दिया है। ख़ासतौर से वामपंथी प्रोपेगैंडा पत्रकार, उनके चैनल और पोर्टल। आमतौर पर पत्रकारों को सामान्यवादी माना जाता है, उनके पास किसी विषय के बारे में समझ की गहराई के बजाय कई विषयों की हल्की-फुल्की समझ होती है। हालाँकि, इन दिनों कई स्वयंभू विशेषज्ञ पत्रकार हर सार्वजनिक नीति, शासन और अर्थशास्त्र से संबंधित जटिल मुद्दों पर भी बिना किसी विशेष जानकारी के विशेषज्ञ होने का दावा करते फिर रहे हैं।

हालिया मुद्दा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का है। जिसे मोदी सरकार ने गंभीरता से लेते हुए प्रमुखता से आगे बढ़ाया है और ये योजना काफ़ी सफल है। हम जानते हैं कि भारत में लड़कियों का स्कूलों में नामांकन दर बहुत कम है क्योंकि भारतीय अभिभावक लड़कियों को स्कूलों में भेजने से बचते हैं। जिसकी एक बड़ी वज़ह पब्लिक स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की कमी या उनका न होना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात में अपने मुख्यमंत्री के रूप में शासन के दिनों में ही इस समस्या का एहसास हुआ और उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूलों में शौचालय बनवाने की जिम्मेदारी प्रमुखता से ली। उन्होंने इस बात पर तब भी काफ़ी ज़ोर दिया कि कोई भी बच्ची शौचालय न होने की वजह से स्कूल जाने से वंचित न रहे।

जैसे ही वे प्रधानमंत्री बने, ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ उनके द्वारा घोषित की गई शुरुआती योजनाओं में से एक बड़ी योजना थी। यह अभूतपूर्व था जब पहली बार लाल क़िले की प्राचीर से, 15 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री ने भारत के सामने उन चुनौतियों के बारे में बोलने की हिम्मत की, जिन पर तत्काल काम करने की ज़रूरत थी, शौचालय की कमी भी उसमें से एक थी। उन्होंने इन चुनौतियों पर विजय की कामना के साथ अपना भाषण समाप्त किया था।

शौचालय बच्चियों को शिक्षा से जोड़ने की समस्या का सिर्फ़ एक हिस्सा था। असली चुनौती बालिकाओं की शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने और उनका दृष्टिकोण बदलने की थी। परिणामस्वरूप, पूरे देश में जागरूकता फैलाने का एक अभूतपूर्व व्यापक अभियान शुरू किया गया। स्कूलों में बालिकाओं के नामांकन दर में सुधार के लिए दो सबसे महत्वपूर्ण बाधाओं को एक साथ दूर करने का लक्ष्य बनाया गया।

- विज्ञापन -

प्रधानमंत्री ने उस जागरूकता अभियान की अगुवाई करते हुए, सोशल मीडिया पर #SelfieWithDaughter अभियान चलाया। मेरे कई वामपंथी मित्रों ने यह कह कर इसे बंद कर दिया कि इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, बेकार है ये। लेकिन वे इस तरह के इशारे के पीछे के प्रतीकात्मक प्रभाव को पहचानने में विफल रहे। बता दूँ कि हमारी रूढ़िवादी सोच और कार्यान्वयन की अनिच्छा ही पिछली कई योजनाओं के विफल होने के कारण रहे हैं। भारत जैसे विशाल व विविधतापूर्ण देश में, लोगों के व्यवहार और रवैये में बदलाव लाने में बहुत समय और पैसा लगता है। प्रधानमंत्री ने लोगों के सोच और व्यवहार में अपेक्षित बदलाव के लिए कई आउटरीच कार्यक्रमों का आयोजन किया।



(NSSO लेबर ब्यूरो सर्वे और ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजुकेशन)

अक्सर लोग विज्ञापनों पर होने वाले ख़र्च की आलोचना करते हैं, लेकिन उपरोक्त आँकड़े यह दर्शाते हैं कि किस तरह आउटरीच और जागरूकता के कार्यक्रमों ने नामांकन दर में जेंडर गैप को कम कर दिया है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में लिंगानुपात पहले से ही कम है। इसलिए यह डेटा स्पष्ट रूप से ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम की सफलता को प्रदर्शित करता है।

लोग इस योजना में विज्ञापन पर हुए ख़र्च को अलग करके देखते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि सभी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय निर्माण की महत्वाकांक्षी परियोजना के साथ-साथ कार्यक्रम की सफलता सुनिश्चित करने के लिए आउटरीच और जागरूकता कार्यक्रम भी बेहद महत्वपूर्ण था।

राहुल गाँधी ने एक वामपंथी प्रोपेगैंडा पोर्टल (Quint) जो अक़्सर तथ्यों को घुमाफिराकर, तोड़-मरोड़कर पेश करने का अभ्यस्त हैं, पर भरोसा किया। जिसने यह बताया कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना विफल है क्योंकि बहुत सारे धन ‘विज्ञापन’ में खर्च हुए हैं। जबकि तथ्य यह है कि योजना स्वयं में एक व्यापक जागरूकता अभियान है और जागरूकता पैदा करने में एक बड़ा हिस्सा विज्ञापनों का होता है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की प्रमुख ज़रूरत देशव्यापी जागरूकता अभियान भी है। पर राहुल और उनके पिट्ठू मीडिया को वास्तविक तथ्यों से अवगत हो और उसे सच्चाई के साथ पेश करने की उम्मीद करना बड़ा सवाल है। जिसकी समझ की उम्मीद उनसे नहीं की जा सकती।

दिलचस्प बात यह है कि 1947 के बाद से ही भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस सबसे अधिक समय के लिए सत्ता में रही। 24 अकबर रोड (पुस्तक) के अनुसार, यह तथ्य चौंकाने वाला है कि ‘भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के मुख्यालय में महिलाओं के लिए एक भी डेडिकेटेड शौचालय नहीं है।’ यह तब है जब इंदिरा गाँधी और सोनिया गाँधी जैसी ‘महिला सशक्तिकरण’ की हिमायती कॉन्ग्रेस की मुखिया रही हैं। यह तथ्य स्वयं कॉन्ग्रेस की महिलाओं के प्रति उदासीनता और दोयम सोच को दर्शाता है।

मुझे इस बात का आश्चर्य है कि जो लोग आज ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ कार्यक्रम की जागरूकता अभियान के लिए विज्ञापनों के ख़र्चे पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कभी कॉन्ग्रेस से सवाल किया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्यालय में महिलाओं के लिए शौचालय क्यों नहीं है? शायद, राहुल जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की प्रतीक्षा कर रहे थे, कॉन्ग्रेस के मुख्यालय में एक शौचालय का निर्माण करने में मदद करने के लिए। ठीक वैसे ही कॉन्ग्रेस पूरे भारत के सभी गाँवों और घरों में विद्युतीकरण के लिए भी प्रधानमंत्री का इंतज़ार कर रही थी।

गुंजा कपूर के इस लेख का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद रवि अग्रहरि ने किया है।

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Gunja Kapoor
Gunja Kapoor is a policy analyst based in New Delhi. She tweets at @gunjakapoor

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