बलात्कारों को नॉर्मल मान चुका समाज और पत्थरों से मारने की बातें

ये विडंबना है हमारे विकल्पहीन समाज की कि हम प्रशासन पर सवाल उठाने के लिए अपनी एक्स्ट्रीम पिच का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उपाय सुझाने के लिए हम शरिया पर जा अटकते हैं।

कभी-कभी सोचती हूँ मैं उस शिक्षित समाज का हिस्सा हूँ जो बलात्कार जैसे शब्दों को लेकर बेहद सामान्य हो चुका है। मेरे आस-पास का समाज अब जानता है कि किसी भी रेप की घटना का विरोध दर्ज करने के लिए उसे सड़कों पर उतर आना है, प्रशासन को दोषी ठहराना है, पीड़िता के परिजनों में न्याय दिलाने की उम्मीद को जगाना है और फिर इस क्रम को दोहराने के लिए अगली लड़की के ‘रेप पीड़िता’ में बदलने तक का इंतजार करना है। मेरे समाज को मालूम है कि बलात्कार के दर्द को महसूस करने के लिए मोमबत्ती लेकर निकलना या फिर सोशल मीडिया पर अतिनारीवादी पोस्ट लिखना बहुत जरूरी है।

मेरे समाज के लिए ये मानदंड हैं जिनसे साबित होगा कि बांदीपोरा मे 3 साल की बच्ची का रेप, अलवर में नवविवाहिता का बलात्कार और दिल्ली में 75 वर्षीय बुजुर्ग महिला के साथ हुए दुष्कर्म का उन्हें दुख है और वे ‘भावी पीड़िताओं’ के लिए एक बेहतरीन समाज को बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे ही कुछ बेहतर समाज को बनाने की एक आवाज़ जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी उठाई है। उन्होंने बेहतर समाज की कल्पना में ‘शरिया’ को आखिरी विकल्प समझा है और कहा कि शरिया कानून लागू करके रेप आरोपितों को पत्थर मार-मारकर खत्म कर दिया जाना चाहिए।

महबूबा मुफ्ती का ये गुस्सा, ये आक्रोश जाहिर है, क्योंकि वो भी एक महिला हैं और उन्हें पढ़ने-सुनने वाले लोग हर जगह मौजूद हैं। उनके सवाल भी ठीक हैं कि एक ओर जहाँ लड़की के हाव-भाव को उसके साथ हुए रेप के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है, उन मानकों पर 3 साल की मासूम कैसे फिट बैठ रही है। उनका कहना है कि ऐसे वक़्त में शरिया क़ानून के अनुसार, ऐसे काम करने वालों को पत्थर से मारकर मौत की सज़ा देनी चाहिए। आखिर बिना किसी गलती के मासूम को इस अनचाही और अंजान प्रताड़ना से क्यों गुजरना पड़ा, विश्वास करके चॉकलेट के लिए साथ चले जाना कहाँ का जुर्म है…? लेकिन क्या वाकई लड़ाई इस बात की है कि जिसने मासूम के साथ ये घिनौना काम किया है उसे सख्त से सख्त सजा मिले ताकि ‘रेप’ अपराध की श्रेणी में बरकरार रह सके या इस बात की है कि कैसे ऐसी मानसिकता को जड़ से उखाड़ा जाए जो 3 साल की लड़की से लेकर 75 साल की बुजुर्ग महिला में एक आदमी को सिर्फ़ योनि देखने पर मज़बूर करती है।

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ये विडंबना है हमारे विकल्पहीन समाज की कि हम प्रशासन पर सवाल उठाने के लिए अपनी एक्स्ट्रीम पिच का इस्तेमाल करते हैं लेकिन उपाय सुझाने के लिए हम शरिया पर जा अटकते हैं । हम सामाजिक रूप से इस समस्या को जड़ से खत्म करने के बजाए ऐसा डर बनाने की कोशिश करने में जुट जाते हैं कि जिससे सिर्फ़ उस लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित हो जो बोलना और चिल्लाना जानती है। क्योंकि शरिया का डर सिर्फ़ उन्हीं के भीतर होगा जो जानेंगे कि लड़की उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगी। जिन्हें मालूम होगा कि लड़की को भीतर ही भीतर कितना भी छीलें पीड़िता किसी से कुछ नहीं कहेगी उन्हें इसका कैसा डर? जिन्हें मालूम है उन्हें उनकी हवस मिटाने के लिए बाहर की कोई अंजान लड़की न भी मिले तो वो घर में बेटी, भतीजी, भाँजी, बहन पर अपना जोर आज़मा लेंगे और ये बात किसी को नहीं मालूम चलेगी उन्हें शरिया का कैसा डर…

स्वीडन, अमेरिका, साउथ अफ़्रीका समेत कई विकसित यूरोपीय देशों में रेप के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं, लेकिन हम बुद्धि से इतने लाचार लोग हैं कि हम उसे उनकी संस्कृति का हिस्सा बताकर दरकिनार कर देते हैं और अपनी सभ्यता-संस्कृति की साख के लिए कड़े से कड़ा कानून बनाने की बात करते हैं। हम लड़कियों की सुरक्षा के लिए उन्हें घर में दबाना पसंद करते हैं, और बलात्कार की परिभाषा अपने तय मानकों पर निर्धारित करते हैं। कुछ हद तक, शहर की लड़की के साथ सड़क या बसों आदि में हुई छेड़खानी हमारी खबरों का हिस्सा होती हैं, लेकिन गाँवों में लगातार हो रहे शोषण और पंचायतों द्वारा “आपस में सुलझा लो” वाली खबरें हम तक पहुँचती भी नहीं हैं। हम निर्भया जैसे कांड पर आवाज़ उठाना जानते हैं लेकिन उस लड़की की मनोव्यथा जानने की भी कोशिश नहीं करते हैं जो भीतर ही भीतर खुद को तार-तार कर रही होती है।

दिल्ली में कुछ समय पहले 8 महीने की बच्ची का रेप हो जाता है और उस रेप को करने वाला उसका भाई होता है, क्या ऐसे मामलों में भी शरिया कानून का विकल्प उचित बैठता है। हम कठुआ जैसे मामलों में प्रशासन को दोषी ठहराते हैं लेकिन क्या कभी खुद से पूछते हैं कि इसमें प्रशासन का कितना दोष है। हम और हमारा मीडिया बलात्कार के मामलों में भी साम्प्रादायिकता खोज़ निकालता है लेकिन भूल जाता है कि उनके घरों में कोई न कोई ऐसी लड़की जरूर होती है जिस पर उनके ही किसी करीबी की गंदी निगाह रहती है। जो उनकी नजरों से हटते ही उनकी बेटी-बहनों पर प्यार से हाथ फेर लेता है, उनके गालों को खींच लेता है, मौका मिलने पर छाती भी दबा देता है और ये सब प्यार, लिहाज और रिश्तों की आड़ में हो रहा होता है।

साहित्य इन सामाजिक सच्चाइयों से भरा हुआ है कि हर बार लड़कियों के साथ होते ऐसे अपराधों के पीछे अपना ही कोई रक्षक ‘भक्षक’ की भूमिका निभा रहा होता है। कितने मामले होते हैं जिनमें लड़कियों को पता भी नहीं चलता कि आखिर उनके साथ क्या हुआ है, ऐसी स्थिति में मुझे समझ नहीं आता शरिया कानून या कोई भी अन्य कानून किस तरह काम करेगा। ये लड़ाई ओछी मानसिकता को सुधारने की है, लड़कियों को समाज में आम बनाने की है… शरिया के लागू होने का सुझाव सिर्फ़ आक्रोश में उचित लग सकता है, लेकिन एक सभ्य समाज में हर अपराध पर ऐसे कानून की बात करना अनुचित है।

सवाल प्रशासन से मत करिए, सवाल खुद से करिए। विरोध सड़कों पर मत दिखाइए अपने आस-पास उस ओछी मानसिकता के लिए दिखाइए जो आदमी को हैवान बनाती है और हवस को भावनाओं की श्रेणी में रखती है। प्रशासन द्वारा बनाए कानून और नियम आपके लिए सिर्फ़ तब तक हैं, जब तक उन्हें मानते हैं और स्वीकारते हैं। लेकिन मानसिकता पर जब हवस हावी हो जाए तो उसका इलाज आपको खुद ही करना पड़ता है। इस माहौल को बदलिए और अपने आस-पास लोगों में आवाज़ उठाना शुरू कीजिए।

साभार: सोशल मीडिया

मीडिया की खबरों के अनुसार एक महीने में सिर्फ़ राजस्थान में रेप के 52 मामले आए। जिनमें 12 में वक्त पर केस दर्ज नहीं हुआ। अगर आप ऐसी घटना पर आवाज़ उठाने का दम रखते हैं और फिर प्रशासन ऐसे खिलवाड़ करता है जैसे अलवर गैंगरेप मामले में किया तो उसे सवालों के घेरे में घेरिए, और तब सड़कों पर उतरिए और जवाब माँगिए, लेकिन बांदीपोरा में उस 3 वर्षीय मासूम पर आता आक्रोश मुझे निराधार और बेकार लगता है। क्योंकि सड़कों पर उतरा कौन सा व्यक्ति कल को इसी आरोप में लिप्त होगा ये न आप जानते हैं और न मैं…

साभार : सोशल मीडिया

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