उसने कहा कि ‘भ्रूण हत्या ही ठीक है, ये दुनिया आप पुरुषों को मुबारक’

मैं जवाब इसलिए नहीं दे पाता क्योंकि वो डाँट मुझे नहीं, मेरे मर्द होने को पड़ी है जो उसी मेट्रो की भीड़ में हस्तमैथुन भी करता है, उसी मेट्रो की भीड़ में लड़कियों के कंधे पर हाथ रखता है, उसी मेट्रो की भीड़ में उनकी कमर छूता है, उसी मेट्रो की भीड़ में वो उसकी पीठ सहलाता है। ये हर जगह मैं ही तो हूँ।

तीन बहनें पैदा हो चुकी थीं, पता चला चौथी भी लड़की हुई है, चाचा-ताऊ ने कहा कि वो परिवार से अलग हो रहे हैं। चेहरा तक नहीं देखा। पता चला कि सोनोग्राफी में पेट के भीतर लड़की है, डॉक्टर को पैसे देकर पेट के भीतर उस चार-पाँच इंच के शरीर को कई हिस्सों में काट कर, या तोड़ कर बाहर निकाल दिया गया। पता चला कि पहली संतान बेटी हुई है, वहीं निर्ममता से गला घोंट दिया गया। ये काम घर की औरतों ने किया है, घर के मर्दों ने किया है। ये काम माँओं ने किया है, बापों ने किया है।

वो किसी तरह बड़ी हुई तो पुरुषों ने उसके एक महीने के होने से लेकर, घुटनों पर घुड़कने तक की भी अवस्था में बलात्कार किया। घर के लोगों ने उसे यहाँ-वहाँ छुआ। बाप से लेकर भाई, मामा, चाचा, जीजा, मौसी, फूफा और शिक्षक, दोस्त आदि हर संबंध में पुरुष ने उसे उसकी मर्ज़ी के खिलाफ छेड़ा, छुआ, रेप किया, लगातार किया और इतना किया कि वो मर गई लेकिन बोल नहीं सकी किसी को कि उसके साथ क्या हुआ है, क्या हुआ था, क्या होता रहा।

प्रथम प्रेम ने उसे धोखा दिया और उसके निजी पलों को सार्वजनिक बना दिया। फिर वो सबसे डर कर रहने लगी। उसकी पढ़ाई बंद हो गई। कहीं वो किसी संबंधी के यहाँ बेहतर जगह पर पढ़ाई करने पहुँची तो पता चला कि उसका अपना जीजा, चचेरा भाई, चाचा, मौसा या कोई भी उसे इस बात पर ब्लैकमेल कर के उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती करता रहा कि उसे ज़रूरत है वहाँ रहने की, या, अगर उसने उनका साथ नहीं दिया तो उसकी बहन, बुआ, मौसी या जो भी संबंधी है, उसके साथ अच्छा नहीं होगा।

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फिर वो काम करने के लिए किसी तरह ऑफिस तक पहुँची तो वहाँ बताया गया कि तुम हीन हो, और आगे बढ़ने के लिए तुम्हें ज़रूरत है तुम्हारे बॉस की। कहीं लिफ़्ट में उसके साथ जबरदस्ती हुई, कभी केबिन में बुला कर उसे बताया गया कि क्या करने पर वो आगे बढ़ सकेगी।

ये बहुत ही जेनेरिक कहानी है। इसमें आप नाम, जगह और संबंध चुन लीजिए, ये सत्यकथा हो जाएगी। यही कारण है कि यह भयावह है। यह ख़तरनाक स्थिति है। यह सर्वव्याप्त है। यह आपके घर में हो रहा है, आपकी क्लास में हो रहा है, आपके बच्चे के साथ हो रहा है, आपके पड़ोस में हो रहा है, आपके समाज में हो रहा है। आप अपने घर की लड़कियों से पूछिए, पता चल जाएगा कि क्या हो रहा है समाज में।

अलवर की घटना हुई और उस पर चुनावों के मौसम में बवाल हो रहा है। अलवर में क्या घटना हुई यह जान कर भी क्या कीजिएगा। ऐसी घटनाएँ हर मिनट हो रही हैं। ऐसी घटनाएँ बहुत ही अडवान्स इकॉनमी से लेकर पिछड़े समाज तक में होती हैं। इसलिए जगह और समाज दोनों ही ग़ैरज़रूरी हो जाते हैं।

इन घटनाओं का एक सेट पैटर्न है। घटना होगी, पुलिस केस दर्ज करने में आनाकानी करेगी, सत्ता पक्ष निंदा करेगा, विपक्ष सत्ता पक्ष को ऐसे लताड़ेगा जैसे तीन महीने पहले वहाँ सब कुछ ठीक था, फेसबुक पर लोग उस घटना का लिंक शेयर करेंगे, फिर बग़ल वाले लड़के से कहेंगे कि दूसरे केबिन की लड़की कितनी मस्त है। दोनों हँसेंगे, और माहौल चिल हो जाएगा। एक लड़की के बलात्कार की यही कहानी है। गलत है, लेकिन यही है।

हमारी समस्या यह है कि हम गलत जगह से इन मुद्दों पर बात करना शुरु करते हैं, और गलत जगह पहुँच कर खत्म कर देते हैं। मुद्दा वहीं, अपनी यथास्थिति में मौजूद रहता है जो जगह और समय बदल कर, नए रूप में फिर से आ जाता है। मोलेस्टेशन या बलात्कार राजनैतिक समस्या नहीं है, इस पर आप नेताओं को कोसने से कुछ नहीं पाएँगे। ये सामाजिक समस्या है, और समाज को इसके लिए कुछ बुनियादी बदलाव लाने होंगे।

नेताओं को कोसने से कुछ भी नहीं होगा क्योंकि नेताओं को कोसने से आज तक कुछ भी नहीं हुआ। आप यह मान कर चलिए कि इन्हें सुधारने के लिए गृहयुद्ध या लार्ज स्केल पब्लिक अपरायजिंग यानी जन आंदोलन की ज़रूरत है। लेकिन उसके बाद भी इस समाज में मर्द तो रहेंगे ही, मर्द रहेंगे तो नवजात से लेकर वृद्धा तक का बलात्कार तो होता ही रहेगा। गृहयुद्ध से हासिल यही होगा कि नेताओं के मुँह से ऐसी वाहियात बातों की जगह कुछ एक्शन की बातें होंगी ताकि पुलिस यह न कह सके कि चुनाव थे इसलिए केस दर्ज नहीं किया गया।

इसलिए, बदलाव की ज़रूरत कहीं और है। मेरी मित्र ने मुझे मैसेज किया कि भ्रुण हत्या ही ठीक है, उसे भी वैसे ही मार दिया जाता तो कितना अच्छा रहता। उसने आगे लिखा कि ये दुनिया पुरुषों को मुबारक हो। मैं जवाब नहीं दे सका। जवाब देता भी तो क्या देता? मैं तब भी जवाब नहीं दे पाता हूँ जब किसी लड़की से मेरी कोहनी मेट्रो की भीड़ में टकरा जाती है और वो मुझे डाँट देती है। मैं जानता हूँ कि गलती मेरी नहीं है, पर मैं जवाब नहीं देता।

मैं जवाब इसलिए नहीं दे पाता क्योंकि वो डाँट मुझे नहीं, मेरे मर्द होने को पड़ी है जो उसी मेट्रो की भीड़ में हस्तमैथुन भी करता है, उसी मेट्रो की भीड़ में लड़कियों के कंधे पर हाथ रखता है, उसी मेट्रो की भीड़ में उनकी कमर छूता है, उसी मेट्रो की भीड़ में वो उसकी पीठ सहलाता है। ये हर जगह मैं ही तो हूँ। ये मेरा ही तो रूप है जो बसों में उस पर गिर जाता है, जो गर्ल्स हॉस्टल की खिड़कियों की सीध में अपने लिंग पर हाथ फेरता है। वो मैं ही तो होता हूँ जो अपनी किसी जान-पहचान की बच्ची को चॉकलेट देकर कहीं ले जाता हूँ, और उसके साथ हैवानियत दिखाने के बाद उसकी हत्या भी कर देता है।

ये सारे रूप मेरे हैं, इसलिए जब मेरी गलती नहीं होती, फिर भी मैं उसकी डाँट को सुन कर शर्म से सिर झुका लेता हूँ। क्योंकि मैं जानता हूँ कि इसी लड़की को आधे घंटे पहले किसी ने इसी कोहनी से जानबूझकर छुआ होगा। ये हरकतें इतनी आम हैं कि एक लड़की दिन में औसतन दस बार ऐसी गंदी स्थिति का शिकार बनती होगी।

मर्दानगी और पावर

मर्दानगी के साथ पावर की जो अनुभूति होती है, वो एक कंकाल-सदृश मर्द के भीतर भी होती है। वो सेक्स भी करता है तो वो सामने वाले के ऊपर आनंद से ज़्यादा अपने पावर का इस्तेमाल करता दिखता है। वो उन क्षणों की निर्मलता को ग्रहण करने की जगह इस फ़िराक़ में होता है कि उसके भीतर का जानवर उस लड़की या स्त्री पर कैसे अपना प्रभाव छोड़े।

हम सेक्स नहीं करते, हम बता रहे होते हैं कि हम कितनी शक्ति समेटे हुए हैं, और हमारी सारी शक्ति की पूर्णता एक स्त्री की योनि पर प्रहार करने से प्रदर्शित होती है। बिस्तर पर हम कितने वहशी है, वो हमारी प्रेमिकाएँ जानती हैं।

यही पावर, इसी शक्ति का स्थानांतरण एक वैसे तरीके से होता है जो अपनी पूर्णता में जब बाहर न आ सके, तो किसी भीड़ में किसी की बाँह को मसल देने में बाहर आता है। यही पावर आपको किसी के कूल्हों पर थपकियाँ मारने की हिम्मत दे देता है। यही पावर आपको किसी स्त्री के वक्ष पर अपना हाथ टिका देने की ताक़त देता है। ये उसी वहशीपने का सूक्ष्म रूप है। ये दरिंदगी मर्दों में सामान्यतः पाई जाती है, फ़र्क़ बस इतना है कि कुछ इस पर नियंत्रण रखते हैं, पर अधिकतर इस समाज में घुटती लड़कियों के अस्तित्व को ही ख़ारिज मानते हुए हर अवस्था में, हर जगह पर, हर समय, हावी होना चाहते हैं।

बलात्कार का सामान्यीकरण

इसी का कुत्सित रूप है रेप, या बलात्कार। यह शब्द सुन कर हमें चौक जाना चाहिए, लेकिन हम नहीं चौंकते। यह शब्द हमें चौंकाता क्यों नहीं? क्योंकि इसे हम मर्दों ने इतना आम कर दिया है कि अब ऐसी खबरें हमें आश्चर्यचकित नहीं करतीं। इसे हमने एक बच्ची के जन्म से लेकर, उसकी लाश पर भी अपने निशान छोड़ने तक सामान्य बना दिया है। हमें क्षणिक दुःख होता है, लेकिन हम भूल जाते हैं। लेकिन रेप भूलने वाली घटना नहीं है।

अगर हम भूल जाते हैं तो हमारे सिस्टम में समस्या है। हमारे समाज में समस्या है। अलवर, ग़ाज़ियाबाद, मुज़फ़्फ़रपुर, देवरिया, तिरुवनंतपुरम, बंग्लोर, गोवा, पार्क स्ट्रीट से मतलब नहीं है, मतलब इससे है कि हर समाज में यह कोढ़ है, जिसका इलाज करने की जगह हमने इसे टाला है। हमने कभी बहुत ज़्यादा सोचा भी नहीं। हमने खुद के भीतर कभी झाँका ही नहीं। हमने अपने ऊपर नियंत्रण करने की कोशिश ही नहीं की।

हमारे भीतर का दरिंदा अपनी प्रेमिका पर ही सही, अपनी पत्नी पर ही सही, हावी तो होता है। हमने क्या उन क्षणों में प्रेम किया है, या वो करवाया है जो हमारे मन में पलता रहता है। कहीं हमसे जुड़ने वाली लड़की को यह तो नहीं लगा कि प्रेम यही है जबकि आपने सहमति लेकर उसका बलात्कार ही किया हो? क्या आपने कोशिश की जानने की कि उसने जो सर्वस्व सौंपा है, उसे आपने भी अपना सर्वस्व दिया है?

यहीं से हमारी मानसिकता पर सवाल उठते हैं। यहीं हमारी पहली गलती होती है। जब हम उस स्थिति को भी नहीं समझ सके, जो हमारे पास है, पूर्ण सहमति से है, तो हम बाहर क्यों किसी को देखकर उन्मादित नहीं होंगे? या, हमें क्यों फ़र्क़ पड़ेगा ऐसी खबरों से कि नोएडा में एक सोलह साल की बच्ची को 51 दिनों तक तीन लड़कों ने लगातार क़ैद में रखा और बलात्कार किया?

मर्दों की मानसिकता में सुधार नहीं आया तो भले ही हमारे समय में नहीं, पर आने वाले समय में हम अपने ही घरों में बलात्कार करते पाए जाएँगे। हमारा डर खत्म हो चुका होगा, पुलिस घरों में मौजूद नहीं होगी, और हमारे भीतर की कुंठा हमें अपनी माँ, बहन या बेटी के ऊपर कूदने का ज़रिया बना देगी।

हम क्या कर सकते हैं?

हम क्या करें फिर? सबसे पहले तो यही करें कि स्वीकारें कि हर ऐसी घटना के भागीदार हम सारे मर्द हैं। किसी मर्द को ऐसी घटनाओं को अंजाम देने के पीछे की हिम्मत हम ही तो देते हैं। ये सामूहिक वारदात है, जिसका अपराध हर मर्द के सर पर है। हम अपने भीतर की कुंठा से निजात तभी पा सकते हैं जब हम अपनी गलती, अपने समाज की गलती को स्वीकारने की स्थिति में आएँ। अपनी पत्नी और प्रेमिका पर हमले करने वाले, ऐसी बातों पर क्या संवेदना दिखा पाएँगे!

अपने बच्चों को शुरु से बताइए कि लैंगिक समानता क्या है। उसे बताइए कि उसमें और उसकी बहन, दोस्त में जो अंतर है, वो बस ऐसा ही है कि पौधे में गुलाब का फूल भी होता है, गेंदा का भी। लड़कियों की सुंदरता को प्राप्य या अप्राप्य की श्रेणी में मत डालिए। उसे रेस की ट्रॉफ़ी मत बनाइए। दोनों ही बच्चों को, एक समान ट्रीटमेंट दीजिए।

घर के भीतर, स्कूल में आपके बच्चे के साथ क्या हो रहा है, बार-बार पूछिए। लड़का हो या लड़की, उनसे पूछिए कि कहीं स्कूल में, ट्यूशन पर कोई उसे गलत तरीके से छूता तो नहीं। पढ़ाई के अलावा और क्या है जो किसी ने उसे बताने से मना किया हो। बच्चों को इग्नोर मत कीजिए, किसी भी हालत में। कोई बच्चा अचानक से बदल रहा हो तो उसे अपनी व्यस्तता के कारण मत भूलिए। आपको हमेशा याद रहना चाहिए कि वो बच्चा अपनी मर्ज़ी से पैदा नहीं हुआ, बल्कि आपने उसे पैदा किया है, और आपकी ज़िम्मेदारी है उसे बेहतर भविष्य देना। इसलिए, उसकी उपेक्षा भूल कर भी मत कीजिए।

आप जहाँ काम करते हों, वहाँ अपने दोस्तों को चिरकुटों वाले काम करने से रोकिए। उसे बताइए कि यही स्थिति उसे एक बलात्कारी बना सकती है, या कोई उसी से सीख कर कुछ ऐसा कर जाएगा जो उसके जीवन की सबसे बड़ी भूल होगी। लड़कियों को देखने, घूरने और एक्स-रे करने में अंतर है। इस बात का ध्यान रखिए।

हमारा समाज तो बर्बाद हो चुका है, हम इसमें बहुत कुछ नहीं बदल सकते। लेकिन, हमारे बच्चों को हम थोड़ा बेहतर समाज देकर, उन्हें भी यही बात सिखा कर, आने वाले बच्चों के लिए और भी बेहतर समाज बना सकते हैं। यह एक सतत प्रक्रिया है। आप इसे चाहें तो इग्नोर कर सकते हैं कि आपका घर तो सुरक्षित है, लेकिन व्यक्ति कभी भी अकेलेपन में नहीं होता, उसके साथ होने वाली घटनाओं पर उसके अकेले होने का ज़ोर नहीं होता, वो बाहरी शक्तियों से भी प्रभावित होती हैं।

बेहतर शिक्षा और सतत प्रयास ही इस समाज को साफ करने में सहायक होगा। अपने स्तर पर अपनी प्रेमिका और पत्नी पर ज़ोर आज़माने से बेहतर, प्रेम करना शुरु कीजिए। इन क्षणों की अपनी अहमियत है, इन्हें इनकी पूर्णता में समझिए। क्षणिक आनंद और शक्ति प्रदर्शन कई स्तर पर आपकी मानसिक स्थिति पर आघात पहुँचाता है। इसकी परिणति बहुत भयावह होती है।

अलवर हर मिनट घटित होता है। नेता लोग हर दिन बयान देते हैं। हम हर दिन कहीं न कहीं फेसबुक पर इस पर चर्चा करते हैं। लेकिन इन घटनाओं में कमी नहीं आती। कमी इसलिए नहीं आती क्योंकि हमने महसूस करना छोड़ दिया है। हमने इसकी भयावहता को नॉर्मलाइज कर दिया है। हम इसे सामान्य बात मान कर आगे बढ़ जाते हैं।

जबकि हमें यह समझना होगा कि अपने भीतर थोड़े बदलाव लाकर, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण लाकर, दमन की जगह प्रेम ला कर, हम समाज तक एक बेहतर ऊर्जा भेज सकते हैं। मैं जानता हूँ कि शायद यह लेख भी मेरे उन सवा लाख शब्दों की तरह डिजिटल दुनिया में तैरता रहेगा, किसी के काम न आएगा, जो मैंने अभी तक सिर्फ बलात्कार पर लिखे हैं। लेकिन मैं लिखता रहूँगा क्योंकि इससे अगर एक व्यक्ति भी थोड़ा बदल पाता है, अपने भीतर की नकारात्मकता को स्वीकार पाता है, तो मेरा लिखना सफल होगा।

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