Thursday, January 28, 2021
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हिन्दुओं को कोने में ढकेलना बंद करो, 101वीं गलती पर सुदर्शन चले तो तहजीब की गजलें मत गाना

इस्लामी कट्टरपंथियों को यह पता है कि सीधे दंगे हर दिन नहीं किए जा सकते, इसलिए ये लोग हिन्दुओं की अस्मिता पर लव और रेप जिहाद के जरिए, और समाज में खौफ पैदा करने के लिए हिन्दुओं की लगातार लिंचिंग का तरीका अपना रहे हैं। यह ‘हिन्दुओं को हजार जख्म दे कर' धीरे-धीरे मारने की नीति है।

पाकिस्तान को ले कर एक छद्मयुद्ध नीति की बात कई बार सुनाई देती है: ‘ब्लीड इंडिया विद अ थाउजेंड कट्स’। इसका मतलब यह है कि इस्लामी पाकिस्तान के बापों के बूते में कभी नहीं था कि वो भारत को किसी पारम्परिक युद्ध में हरा दें, तो उन्होंने नायाब तरकीब निकाली कि इनके सैनिकों, नागरिकों और संस्थाओं को एक-एक कर, हर महीने, दो महीने पर आतंकी हमलों से, स्लीपर सेल को क्रियान्वित कर के अपने निशाने पर रखना। ये नीति काफी हद तक सफल भी रही क्योंकि हमारे नेताओं को ये लगता रहा कि पाकिस्तान को जवाब देने से मजहब विशेष वाला भारतीय वोट बैंक नाराज हो जाएगा।

अब इसी छद्मयुद्ध नीति को आप भारत के स्कोडा-लहसुन तहजीब वाली नौटंकी में उर्दू अनुवाद कर दीजिए। गजवा-ए-हिन्द का सपना पाले कितने मुल्ले-मौलवी मस्जिदों में, कितने दशकों से खास समुदाय के भीतर जहर घोल रहे हैं, ये भी कुछ छुपा नहीं है। जिहाद की अलग-अलग वरायटी आ गई है जिसमें कल तक का ‘लव जिहाद’ अब एक चरण ऊपर बढ़ कर ‘रेप जिहाद’ का रूप ले चुका है।

‘लव जिहाद’ में हिन्दू लड़कियों को व्यवस्थित और संस्थागत तरीकों से फँसाना, मतपरिवर्तन कराना और एक समय के बाद उन्हें छोड़ देना, एक तय तरीका हुआ करता था। अब ‘रेप जिहाद’ में प्रेम के नाम पर हिन्दू लड़की को फँसाना, उसे विश्वास दिलाने के बाद कहीं अकेले में बुलाना, दोस्तों को साथ सामूहिक बलात्कार करवाने से ले कर, निकाह के बाद अपने बाप, भाई, चाचा आदि के साथ सोने को मजबूर करना आम बात हो चुकी है।

इसके बाद हिन्दू लड़की न तो अपने पिता के घर वापस जा सकती है, न उस पूर्णकालिक बलात्कारी परिवारी में ठहर सकती है। पहला परिवार उसके इसी कृत्य से समाज से बहिष्कृत या तिरस्कृत हो चुका होता है, और वापस आने की संभावना पर तत्क्षण ही ताला लग जाता है। बाद में, लड़की के पास आत्महत्या के अलावा और कोई राह नहीं दिखती। इससे एक समुदाय अपने लक्ष्य को हर दिन एक कदम बढ़ा पाते हुए देखता है।

यह तो एक बिंदु है इस सर्वकालिक मजहबी छद्मयुद्ध का। आप गौर कीजिए कि ये घटनाएँ सामूहिक तौर पर नहीं होतीं, ये छिट-पुट होती हैं। हम और आप किसी अखबार में या पोर्टल पर तीन सौ शब्दों की एक खबर या दस शब्दों की हेडलाइन पढ़ कर दुखी हो लेते हैं। लगता है कि ‘कहीं हुआ है, गलत हुआ है।’ इसके आगे हम जाते नहीं, या जरूरत नहीं समझते।

इसी संदर्भ में दूसरी तरह की घटनाएँ जो सामने आती हैं वो हैं हिन्दुओं की भीड़ हत्या, यानी लिंचिंग की। दुर्भाग्य से इस देश में लिंचिंग के नाम पर अखलाक और तबरेज ही याद आते हैं, जबकि स्वतंत्र समूहों द्वारा इकट्ठे आँकड़ों की बात करूँ तो पिछले पाँच सालों में सिर्फ दिल्ली में छः लिंचिंग हो चुकी हैं जिसमें हाल का राहुल हत्याकांड, ध्रुव त्यागी की क्रूर हत्या, अंकित सक्सेना की नृशंस हत्या, ई-रिक्शाचालक रविन्दर, डॉक्टर नारंग की लिंचिंग आदि शामिल है। पूरे देश की बात करें तो पिछले कुछ सालों में यह आँकड़ा 70 से ज्यादा बताया जाता है।

इन आँकड़ों में पालघर के साधु भी हैं, अयोध्या के साधु हैं, तमिलनाडु के वी रामालिंगम हैं, इन्स्पेक्टर सुबोध सिंह हैं, मथुरा के लस्सी विक्रेता भारत यादव हैं, गौतस्करों द्वारा की गई बीस से ज्यादा हिन्दुओं की हत्याएँ हैं। हर हत्या के पीछे हिन्दूघृणा के अलावा और कोई कारण नहीं। बीफ माफिया ने लगातार गाय-बछड़ों की तस्करी की राह में आने वाले पुलिसकर्मियों और हिन्दू गौरक्षकों की हत्याएँ की हैं।

लेकिन ये सारी खबरें अंतरराष्ट्रीय खबरें नहीं बनतीं। ये खबरें ऑपइंडिया जैसी गिनती की तीन-चार संस्थाएँ प्रमुखता से चलाती हैं। जब आप इन मृत हिन्दुओं की लाशें गिनेंगे, और आतंकी हमलों या मुठभेड़ों में बलिदान हुए सैनिकों के आँकड़े गिनेंगे तो यह संख्या मजहबी दंगों में हुई मौतों और भारत-पाकिस्तान युद्ध में हुई मौतों से ज्यादा हैं।

कमाल की बात यह है कि इनके छिटपुट होने के कारण, कोई इसका निहितार्थ नहीं समझ पाता। सबको लगता है कि ये सामाजिक अपराध है, जबकि ये विशुद्ध मजहबी अपराध है क्योंकि हर बार मारने वाली भीड़ मजहबी होती है, मरने वाला हिन्दू। हर बार मारने वाले आतंकी पाकिस्तान समर्थक समुदाय विशेष वाले होते हैं, और मरने वाले भारतीय सैनिक। आप सोचिए कि युद्धकाल से ज्यादा लोग शांतिकाल में बलिदान हो रहे हैं!

ब्लीडिंग हिन्दूज़ विद थाउजेंड कट्स

भारत के भीतर इस्लामी कट्टरपंथियों की यही नीति ‘ब्लीडिंग इंडिया विद थाउजेंड कट्स’, ‘ब्लीडिंग हिन्दूज़ विद थाउजेंड कट्स’ में बदल जाता है। इस्लामी कट्टरपंथियों के बारे में कहा जाता है कि वो तब तक लड़ते रहेंगे जब तक जीतेंगे नहीं, और आप यहाँ सोच रहे हैं कि दस साल अगर यह सरकार रही तो इस पर लगाम लग जाएगा। नहीं! वो संभव ही नहीं। ये समस्या ही अलग है जो कि सरकार के वश की नहीं है क्योंकि सरकारों के बदलने में मात्र पाँच साल लगता है।

मोदी के आते ही पाकिस्तानी हमलों का जवाब मिलने लगा, और तब यहाँ की लिब्रांडू लॉबी सबूत माँगने लगी। अचानक से हर महीने होने वाले सीरियल ब्लास्ट, मार्केट के ब्लास्ट, मंदिरों के धमाके कैसे खत्म हो गए? ये खत्म नहीं हुए हैं, भारत में बसे मिनी पाकिस्तानों ने थोड़े समय के लिए सुसुप्तावस्था को चुना है। वो जानते हैं कि कभी तो दूसरी सरकार आएगी, तब पाकिस्तान का अजेंडा बम फोड़ कर चलाएँगे।

और, जब तक मन की सरकार नहीं आती, तब तक लव और रेप जिहाद से, मॉब लिंचिंग से इनका मतलब सधता जा रहा है। मीडिया का एक हिस्सा ही नहीं, मीडिया का लगभग हर हिस्सा हिन्दुओं की हत्या पर चुप रहता है। इसके उलट, कई बार फेक न्यूज पर भी मीडिया के वही लोग इतना बवाल कर देते हैं कि भारत दुनिया का रेप कैपिटल कहा जाने लगता है।

इनकी जड़ें गहरी भी हैं, इन्टरकॉन्टिनेन्टल भी हैं, और मीडिया में इन्होंने अपने लिए सहानुभूति वाले लोग भी पाल रखे हैं। सहानुभूति दर्शाने वाले ये वो दोगले हैं जो गोमांस खा कर, सोशल मीडिया पर फोटो लगा कर शेयर करते हैं, लेकिन किसी ने चाँद-तारा पर कुछ कह दिया, किसी ने कहा कि तब्लीगी जमात ने भारत में कोरोना फैलाया है, तो इनकी अधोजटाएँ सुलगने लगती हैं और स्थान विशेष से धुँआ निकलने लगता है।

हिन्दू की बहू-बेटियों को छेड़ना, जहाँ भी ये बहुसंख्यक हैं, वहाँ हिन्दुओं का जीना हराम कर देना, कश्मीर से कैराना, मेवात से ले कर दिल्ली के मोहनपुरी तक इन्होंने हिन्दुओं को इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया है। लोग अपने घरों पर ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिख कर जा रहे हैं। सरकार ऐसे मामलों में ‘पुनर्वास’ योजना बना सकती है, लेकिन इस कट्टरपंथी मानसिकता से निपटना तो उन्हें ही है, जिन्हें वहीं रहना है।

इनके छोटे-छोटे हजार घाव की रणनीति बहुत सही रंग ला रही है। जानकारों से बात करने पर पता चलता है कि जिन इलाकों में इनका वर्चस्व ज्यादा है, वहाँ के स्थानीय प्रशासन को ये इतना पैसा खिला देते हैं कि थानों में कर्मचारियों के हिन्दू होने का बाद भी, और अपराध के बिलकुल ही हिन्दू-विरोधी होने के बाद भी, वही थानाध्यक्ष कोई एक्शन नहीं लेता।

न तो इस देश में अल्पसंख्यक की डुगडुगी के नाम पर किसी सरकार में इतनी कुव्वत हुई है कि बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में बलात्कार के आरोपितों के धर्म-मजहब के आँकड़े दें। जबकि, संस्थागत बलात्कारों में ‘मौलवी ने किया मदरसे में रेप’ की खबरें इतनी आम हैं कि लोग पढ़ते भी नहीं। जब पीड़िता की जाति बताई जा सकती है कि वो सवर्ण है कि दलित, तो फिर अपराधी की जाति और मजहब क्यों नहीं बता सकते?

कम से कम, समाजशास्त्रियों के पास इन आँकड़ों को पढ़ने के बाद इस समस्या से निपटने के लिए कोई तरीका तो निकल पाएगा। हाल ही में, दो साल पुराना एक वीडियो दोबारा चर्चा में आया जहाँ एक छोटा बच्चा बता रहा था कि मदरसे में मौलवी सारे बच्चों को किस तरह से हिन्दू बच्चियों के साथ छेड़-छाड़ और ‘गलत काम’ करने के लिए उकसाता है। वीडियो की तारीख से फर्क नहीं पड़ता, फर्क इससे पड़ता है कि इन्हीं मदरसों को सरकारी फंड मिलते रहे हैं।

कितने मदरसों की ऑडिट होती है? कितने मदरसों के बच्चों से पूछा जाता है कि वहाँ उनका यौन शोषण होता है कि नहीं? कितनी बच्चियों से पूछा जाता है कि मदरसे का मौलवी उसके साथ किस तरह की हरकतें करता है? क्या ऐसी कोई व्यवस्था है?

ये जहर जब बचपन से भरा जा रहा है, तो वो लड़का हिन्दू लड़कियों से प्रेम कहाँ से करेगा? उसके लिए तो हर लड़की बलात्कार के योग्य है। इसलिए, वो चाहे प्रेम करे, निकाह करे, या राह चलते मदद की पेशकश, करेगा तो वो बलात्कार ही। वही सीखा है उसने। इसीलिए, जब चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी वहाँ के कट्टरपंथियों के लिए ‘री-एजुकेशन’ की बात करती है, तो लगता है कि सही काम हो रहा है, बाकी देशों को भी इस कैंसर के बारे में आधारभूत स्तर पर ऐसी ही नीति लानी चाहिए। चीन तो खुल कर कहता है कि ये मजहब एक रोग है, और इसका उपचार अत्यावश्यक है।

गंगा-जमुनी तहजीब का ढकोसला

आज के समय में जब लव और रेप जिहाद एक वास्तविकता है, तनिष्क जैसे ब्रांड आज भी स्कोडा-लहसुन तहजीब के नाम पर एक मजहबी परिवार में एक हिन्दू लड़की की गोदभराई की रस्म निभाते दिखा रहे हैं। जबकि कठोर सत्य यह है कि सिवाय सामूहिक बलात्कार और काले बुर्के के हिन्दू लड़कियों को ऐसे कट्टरपंथी परिवारों में और कुछ भी नहीं मिलता। कभी सर्फ एक्सेल होली पर हिन्दुओं को ज्ञान दे देता है, कभी कोई चाय का ब्रांड ऐसे समभाव पर विज्ञापन बनाता है जिसकी धरातली वास्तविकता उतनी ही संदिग्ध है जितना धरती का चपटा होना।

ये तहजीब ऐसा फरेब का जाल है जिसके बारे में किसी से पूछो कि ये क्या नौटंकी है, तो बोल देगा, “ऐसे ही, बोलने में सेक्सी लग रहा था।” इसके आगे उनके पास एक ऐसा उदाहरण नहीं होगा जहाँ इस तहजीब की बत्ती इन मजहबी कट्टरपंथियों ने बनाई हो। जब गंगा और जमुना दोनों हमारी हैं, तो तुम्हारा योगदान इसमें है क्या? तुमने तो और जमुना को रेंट पर ले कर उसको सुखा दिया जहर बहा-बहा कर। हम प्रयागराज संगम में इसको जीवित करने का हर प्रयास करते रहे लेकिन तुमने दिल्ली से ले कर उत्तर प्रदेश तक इसमें अंकित शर्मा, रतनलाल, दिनेश खटीक, राहुल सोलंकी, कमलेश तिवारी जैसों की लाशें बहाई हैं।

इनके रक्त की धारा पहली लाश से निकल कर, यमुना की विशाल धारा में भले ही खो जाएँगीं, लेकिन उसमें तो इन्होंने जगह-जगह हिन्दुओं की लाशों के बूचड़खाने बना रखे हैं। पानी डाल्यूट अवश्य करता है लेकिन जब जल से ज्यादा रक्त की मात्रा हो जाए, ऊपर से तुम्हारा मजहबी जहर कभी हिन्दुओं के बलात्कार तो कभी लव जिहाद के रूप में रिसता रहे, तो तहजीब का आधा हिस्सा तो मृतप्राय ही होगा ना। तो, तुमने तो हमसे जमुना उधार ले कर, उसको बर्बाद कर दिया। हम क्यों ढोते रहें तुम्हारी हिन्दूघृणा को?

रेगिस्तान में जन्मे, हिन्दुस्तान में डर के मारे कन्वर्ट हुए लोग मुगलई व्यंजनों की दुहाई देते हैं। जिसने बाप जनम में चावल देखा न हो, लौंग और इलायची का नाम न सुना हो, वो भारत को बिरयानी दे कर गए हैं! जब इस्लाम और ईसाईयत पत्थर और भालों से अपने मजहबी उन्माद में सर काट रहे थे, तब हमारे यहाँ विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दी जा रही थी। मतलब, भारत के मंदिरों के एक पिलर जितनी नक्काशी किसी भी चोर मुगलिया ढाँचे में नहीं दिखती, लेकिन ‘मुगल नहीं होते तो ताजमहल नहीं होता’ की दुहाई दे कर आहें भरने वालों की कमी नहीं।

लुटेरे, बलात्कारियों, हत्यारों, बच्चाबाजों को आदर्श मानने वालों से और आशा भी क्या की जा सकती है! जहाँ संभव होता है, वहाँ से हिन्दुओं को ‘परोक्ष आक्रात्मकता’ दिखा कर, भगा देते हैं। आप सोचिए कि जहाँ इनकी आबादी ज्यादा है, वहाँ ये खुल्लमखुल्ला हिन्दुओं की बहू-बेटियों को छेड़ते हैं, नंगे हो कर भद्दे इशारे करते हैं, कहते हैं कि मंदिर में हनुमान चालीसा मत बजाओ… ये हाल दिल्ली का है, जहाँ मैं खुद लोगों से मिल कर, बात कर के आया हूँ।

लेकिन हिन्दू कब तक सहेगा?

अगर, मेवात से गाँव के गाँव हिन्दूविहीन कर दिए जाएँगे, कैराना जैसी दीवारें दिल्ली के मोहनपुरी में दिखने लगेंगी तो हिन्दू करेगा क्या? चूँकि हमारी जनसंख्या अधिक है इसलिए जवाहर जैसे लोगों ने हिन्दुओं को स्वतः दुष्ट मान कर अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यवस्था कर दी। बीच में मनमोहन काल में मजहबी दंगों में अल्पसंख्यकों को गिरफ्तारी से पूरी छूट की व्यवस्था सोनिया की अध्यक्षता में ड्राफ्ट किए गए ‘कम्यूनल वायलेंस बिल’ में कर दी गई थी।

आप यह सोचिए कि अगर 2011 मे यह विधेयक कानून बन जाता तो, दिल्ली दंगों का पूरा भार उन्हीं हिन्दुओं के ऊपर आता जिन्हें मारने की योजना दिसंबर 2019 से बन रही थी, और उत्तर-पूर्व दिल्ली के भजनपुरा, मौजपुर, जाफराबाद, चाँदबाग आदि इलाकों में घरों की छतों पर पेट्रोल बम, ईंट-पत्थर, एसिड की बोतलें, आग लगाने के लिए गुलेल की व्यवस्था थी।

जब पूरा तंत्र एक समुदाय की सहिष्णुता का फायदा उठाने लगता हो, इतिहास बदल देता हो, उनके ऊपर किए अपराधों की उपेक्षा करता हो, और चोरों की पिटाई को अंतरराष्ट्रीय खबर बना देता हो, तब सहिष्णुता भी अपनी सीमा तो तलाशेगी ही। हो सकता है कि हिन्दू अभी भी न जगे, प्रतिकार न करे, लेकिन उसे यह याद रखना चाहिए कि उसी के 59 बंधु-बांधवों को एक मजहबी भीड़ ने जिंदा जला दिया, फिर दंगे भी किए, और हिन्दुओं की जानें ली… मन नहीं भरा तो दंगों का अपराध भी हिन्दुओं के ही सर मढ़ दिया।

यही दुष्कृत्य दोबारा दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों के समय दोहराने की कोशिश हुई, लेकिन जागरूक लोगों ने इसका सामना किया और आज तमाम दंगाइयों पर केस चल रहे हैं।

लाशें गिनोगे तो बेशक एक मजहब के लोगों की लाशें ज्यादा मिलेंगी। उसका एक ही कारण है, कि भले ही एक छोटे इलाके में दंगा करने वाले मजहबी कट्टरपंथी को लगता है कि उन्होंने हिन्दुओं को घेर रखा है, लेकिन वो यह भूल जाते हैं कि उनका छोटा इलाका भी किसी बड़े इलाके के बीच में ही है। इसीलिए, हर दंगे में तैयारी तो उनकी बहुत ही सूक्ष्म स्तर तक की होती है, पहले दो दिन उत्पात भी वही मचाते हैं लेकिन अंततः विशुद्ध संख्याबल के कारण हिन्दू उठता है, आत्मरक्षा के लिए बाहर निकलता है और दंगों को खत्म करता है।

इन दंगों से अगर एक सीख और उम्मीद दिखती है तो वो यही है कि ऐसी तैयारी के बावजूद मजहबी दंगों का खात्मा यही सहिष्णु समाज करता है क्योंकि विधर्मियों के दंगे न सिर्फ प्रायोजित होते हैं, बल्कि वो दंगों की आड़ में भी अपनी काम-वासना का प्रदर्शन करना नहीं भूलते। हत्या करना तो सिर्फ एक तह है, क्रूर हत्या के माध्यम से संदेश देना, बलात्कार करना इनके मस्तिष्क की तंत्रिकाओं में उतरा हुआ है। इसलिए, इनके द्वारा किए गए दंगों में भी विसंगतियाँ और विकृतियाँ दिखती हैं जिसे देख कर सामान्य व्यक्ति सोचता है कि दंगे हुए हैं या फिर चिह्नित कर के अपना जहर फैलाया गया है?

हिन्दुओं के घरों, दुकानों, और बैंग्लोर दंगों को याद करें तो कारों तक की, जानकारी लेने के बाद, तकनीक के उपयोग के साथ इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ें हिन्दुओं को काटने उतरती हैं। फिर ये ह्यूमन चेन की नौटंकी करते हैं कि मंदिर बचा रहे हैं। अबे साले! माफ कीजिएगा, गुस्से में इधर-उधर निकल जाता हूँ… जिनके पूर्वजों ने 40,000 से ज्यादा बड़े मंदिर गिराए हैं, जिन्हें बचपन से ही हिन्दूघृणा सिखाई जाती है, वो मंदिर की रक्षा करेंगे? #₹& समझ रखा है क्या?

समय वह नहीं रहा कि कन्याकुमारी में किसी मूर्ति को ढक देने पर कश्मीर के हिन्दू को फर्क नहीं पड़ना चाहिए, बल्कि समय वह है कि फिलिस्तीन के समर्थन में न होने पर हिन्दुस्तान का ‘शांतिप्रिय’ बिलबिला जाता है। ये असंतुलित व्यवस्था घातक है। कोई ‘उम्माह’ के लिए हमेशा संगठित रहता है और हम पालघर के साधुओं को भी न्याय नहीं दिला पाते।

हमें हर मरते हिन्दू की लाश पर हर शहर में प्रदर्शन करना होगा। हमें हर लव-जिहाद के मामले में ऐसे अपराधियों को परिवार सहित, उसी ‘परोक्ष आक्रात्मकता’ से उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना पड़ेगा। हमें हर बलात्कार पीड़िता हिन्दू के घावों की चिकित्सा करनी होगी। क्योंकि न तो आपको खबरों की खबर रहती है, न आपके पास कैंडल ले कर अपने शहर में एक लाख की संख्या जुटाने की आदत है, न आपको अपने सनातनी भाइयों की लिंचिंग पर आक्रोश प्रदर्शित करने आता है। और हाँ, मीडिया कभी भी आपके साथ नहीं होती।

हिन्दुओं को भगवान कृष्ण का ध्यान करना चाहिए कि वो चाहते तो महाभारत एक क्षण में निपटा देते, लेकिन उन्होंने इस धर्म और अधर्म की लड़ाई होने दी ताकि यह संदेश जाए कि सिर्फ अधर्मियों का ही नहीं, बल्कि उनके साथ खड़े लोगों के लिए भी इस भारतभूमि पर जगह नहीं है। उन्होंने भी शिशुपाल की सौ गलतियाँ ही माफ की थी। यहाँ तो सैकड़ों सालों से लाखों गलतियाँ हो चुकी हैं। इसलिए, सरकारों की राह देखने की जगह, स्वयं को सशक्त बनाओ, संगठित रहो, हर ऐसे अपराध को ले कर स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाओ ताकि एक भी हिन्दू पर कट्टरपंथियों का अत्याचार न हो। सुदर्शन चक्र की क्षमता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

यहाँ तो आवश्यकता पड़ने पर ऋषियों ने शस्त्र उठाए हैं, तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो?

दिनकर ने लिखा है:

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों? जागो,
कुछ नई आग, नूतन ज्वाला की सृष्टि करो।
शीतल प्रमाद से ऊँघ रहे हैं जो, उनकी
मखमली सेज पर चिंगारी की वृष्टि करो।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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26 जनवरी 1990: संविधान की रोशनी में डूब गया इस्लामिक आतंकवाद, भारत को जीतना ही था

19 जनवरी 1990 की भयावह घटनाएँ बस शुरुआत थी। अंतिम प्रहार 26 जनवरी को होना था, जो उस साल जुमे के दिन थी। 10 लाख लोग जुटते। आजादी के नारे लगते। गोलियॉं चलती। तिरंगा जलता और इस्लामिक झंडा लहराता। लेकिन...