Saturday, November 28, 2020
Home बड़ी ख़बर गोली क्यों मारना, जब कह के ले सकते हैं पाकिस्तान की!

गोली क्यों मारना, जब कह के ले सकते हैं पाकिस्तान की!

युद्ध के अलावा पाकिस्तान को आर्थिक क्षति पहुँचाना, समाज को भीतर से तोड़कर आंदोलन की स्थिति में ले आना, उनके संवेदनशील हिस्सों में उन्हीं के लोगों की मदद से तबाही मचाना, अपनी सेना द्वारा छोटे-छोटे हमले कराकर उन्हें जवाब देना भी बेहतर विकल्प हैं।

जब भी इस तरह के हमले होते हैं, तो हम सब उद्वेलित हो जाते हैं। उरी हो, पठानकोट हो, मुंबई हो, संसद हमले हों या कई बार हुए सीरियल ब्लास्ट, ऐसे क्षणों में हमारी त्वरित प्रतिक्रिया आतंकियों और उसको पोषित करने वाले पाकिस्तान की बर्बादी ही होती है। हम अपने जवानों के बलिदान पर संवेदनशील भी होते हैं, और अंदर का क्रोध भी बाहर आता है कि सरकार कुछ नहीं कर रही तो हम स्वयं कुछ कर बैठेंगे। 

इसमें भी कोई संदेह नहीं कि हम में से कई लोग अपनी जान देने को भी तैयार हैं, और मौका मिले तो दे भी देंगे। लेकिन यह बात सिर्फ आपकी, या मेरी नहीं है। आपके या मेरे मरने से, या जवानों के बलिदान से सिर्फ शारीरिक क्षति तक ही सीमित होती तो युद्ध की बातों पर गौर किया जा सकता था। लेकिन, ऐसा है नहीं। युद्ध का मतलब है देश और समाज तो दस साल पीछे जाएगा ही, साथ ही हजारों लोग सीधे तौर पर इससे प्रभावित होंगे। अभी चालीस घरों में मायूसी है, तब हजार में होगी। 

हाँ, ये न समझा जाए कि पाकिस्तान को लेकर मैं शांति की बात करने में यक़ीन रखता हूँ, या उनके लिए मानवतावादी हो गया हूँ। नहीं, बिलकुल नहीं। मानवतावाद की बात आदर्श स्थिति में ही संभव है। वो आदर्श स्थिति है कि पाकिस्तान की धरती से वो आतंकी नहीं आते, वहाँ उन्हें ट्रेनिंग नहीं मिलती हो। ऐसा नहीं है, इसलिए मुझे हजार या लाख पाकिस्तानियों के मरने से थोड़ी भी चिंता नहीं होती।

मुझे सुकून मिलता है जब पाकिस्तानी चैनलों पर यह सुनता हूँ कि वहाँ के व्यापारियों के दुकान बंद हो गए, बॉर्डर पर इतने करोड़ का सामान पड़ा है। मुझे अच्छा लगता है जब वहाँ की मीडिया ऐसे मौक़ों पर अपने ‘एटमी ताक़त’ होने की बात करते हुए भारत को धमकाती है, क्योंकि उससे उनका डर झलकता है। मैं भारत के नेताओं को पानी बंद करने की बात करते हुए बढ़िया महसूस करता हूँ। मुझे पाकिस्तानियों से कभी विशेष प्रेम नहीं रहा, फिर भी मुझे युद्ध सुनकर ही समस्या हो जाती है। 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज के दौर में, जब भारत लगातार एक स्थिर गति से आर्थिक प्रगति कर रहा है, विकास के काम हो रहे हैं, तमाम सूचकांकों पर धीमी ही सही, पर बढ़त बन रही है, उस समय युद्ध आर्थिक रूप से एक बुरा चुनाव है। युद्ध हमेशा अंतिम विकल्प होना चाहिए। युद्ध तब तक टाला जाना चाहिए जब तक हमारे अस्तित्व पर ही संकट न आ जाए। 

ऐसा करना इसलिए बेहतर है क्योंकि हम अमेरिका नहीं हैं जो अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए युद्ध छेड़ता है, लेकिन अपनी धरती पर कभी नहीं। इससे ज़्यादा से ज़्यादा सैनिकों और परिवारों को शारीरिक क्षति ही पहुँचती है, उनके देश को फ़र्क़ नहीं पड़ता। उनके शहरों पर बमबारी नहीं होती। ये उनके लिए मिनिमम डैमेज और मेक्सिमम फायदा वाली स्थिति है। इसलिए वो इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, लीबिया और दुनिया जहान जाते रहते हैं। 

हमारी स्थिति वैसी नहीं है। एक तो हमारी जनसंख्या इतनी है कि आँख मूँदकर भी बम फेंक दिया जाए, तो लाख-दो लाख निपट जाएँगे। इस नुकसान की भरपाई असंभव होती है। पारम्परिक युद्धों में दुश्मन सबसे बड़े शहरों पर हमला करता है। मुंबई पाकिस्तान से बहुत दूर नहीं है। हम भले ही पूरा पाकिस्तान बर्बाद कर दें, लेकिन पाकिस्तान के बराबर की आबादी यहाँ से भी बर्बाद होगी। इसका मूल्य बहुत ज़्यादा है।

मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जो ऐसी जगहों पर हैं। मैं ऐसे नामों को दिन में पाँच बार सलाम किया करता था जब मैं अपने स्कूल के ‘अमर जवानों’ के स्मारक के पास से गुज़रता था। वो सारे लोग मेरे स्कूल के सीनियर थे, जिन्होंने अलग-अलग ऑपरेशन या युद्ध में अपना बलिदान दिया था। क्या आपको लगता है वहाँ एक और नाम जुड़ जाए, जो कि किसी वैसे व्यक्ति का हो जिसे मैं जानता हूँ, जो मेरा दोस्त रहा हो, वो मैं चाहूँगा? 

युद्ध में हमारे और आपकी ही तरह के लोग जाते हैं, जो गोली खाते हैं क्योंकि और कोई उपाय नहीं है। गोली से उतना ही ख़तरा उन्हें भी है, जितना हमें है। उनके परिवार वाले हर शाम उनके फोन का इंतजार करते हैं। उन्हें बस यह सुनना होता है कि बोलने वाला उनका बेटा, पति या पुत्र है। अपनी बेटी, पत्नी या बहन के युद्ध के दौरान वीरगति पाने की ख़बर किसी को भी अच्छी नहीं लगती। ऐसी खबरें किसी को सुननी ज़रूरी नहीं। 

हम और आप जब युद्ध की बात कर रहे हैं, मेरे किसी दोस्त ने सियाचिन से तस्वीर भेजी है कि ‘तुम कश्मीर और युद्ध में उलझे हो, यहाँ हवा में साँस लेना मुश्किल है। यहाँ सबसे पहला काम है जान बचाना।’ वो सियाचिन में इसीलिए है क्योंकि हम हमेशा युद्ध के मोड में रहते हैं। वरना उस बर्फ़ के वीराने में ऐसी कौन सी खेती होगी कि उस ज़मीन पर सैनिकों का होना ज़रूरी है, इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं।

सियाचिन में सालों भर चौकसी करते जवान के लिए ज़िंदा बचे रहना ही पहला लक्ष्य है

देश है, सीमाएँ हैं, सेना है, और हम हैं। इसलिए सियाचिन में -60° सेल्सियस में भी वहाँ जवानों का होना ज़रूरी है। हम और आप परेशान न हों, किसी दिन पाकिस्तानी मोर्टार या बम आपके सर पर न गिरे, उसके लिए इंतजाम करते हैं। ये उनका काम है, और वो अपना काम लगातार कर रहे हैं। सेना को हर दिन चुस्त रहना है, आतंकियों को एक दिन चाहिए। इसलिए, एक्सपर्ट का काम एक्सपर्ट पर ही छोड़िए। 

सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम बलिदानियों के वेलफ़ेयर फ़ंड में अपना योगदान दें ताकि ऐसे परिवारों की ज़िंदगी में रुकावट न आए। युद्ध से ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ेगी ही, घटेगी नहीं। साथ ही, आज के समय में दो न्यूक्लिअर ताक़तों के बीच हुए निर्णायक युद्ध का मतलब पूरे विश्व का ख़ात्मा है। छोटे युद्ध का मतलब है कि आपने उन्हें फिर से पनपने के लिए छोड़ दिया। इस अवस्था में युद्ध से बेहतर दूसरे विकल्प हैं।  

फिर क्या किया जाए? चुप बैठे रहें? बिलकुल नहीं। युद्ध इसलिए भी ज़रूरी नहीं क्योंकि बाकी तरीक़ों से पाकिस्तान को घेरा जा सकता है। उन बाकी तरीक़ों में पाकिस्तान को आर्थिक क्षति पहुँचाना, समाज को भीतर से तोड़कर आंदोलन की स्थिति में ले आना, उनके संवेदनशील हिस्सों में उन्हीं के लोगों की मदद से तबाही मचाना, अपनी सेना द्वारा छोटे-छोटे हमले कराकर उन्हें जवाब देना प्रमुख है। 

मुझे याद है जब मैं सैनिक स्कूल में था तो हमारे एक प्राचार्य हुआ करते थे। ऐसे स्कूलों के प्राचार्य, हेडमास्टर और रजिस्ट्रार भारतीय सेनाओं के अफसर होते हैं। हमारी पूरी क्लास के साथ उनकी बातचीत चल रही थी। कर्नल से हमने पूछा कि आखिर पाकिस्तान बार-बार बम फोड़कर लोगों की हत्या कर देता है, हम ऐसा क्यों नहीं करते? 

उन्होंने जो कहा था, वो याद है, “हम उन्हें दुगुनी क्षति पहुँचाते हैं। लेकिन वो आम जनता को जाननी ज़रूरी नहीं, तो उसे प्रचारित नहीं किया जाता है।” 

उसी तरह से, अगर हम पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दें, बिना युद्ध किए तो क्या समस्या है? ट्रेड के मामले में पाकिस्तान पर असर दिखना शुरु हो गया है। उनके करोड़ों के माल से भरे ट्रक बॉर्डर पर अटके हुए हैं। ख़ैर, व्यापार से बहुत ज़्यादा लाभ तो पाकिस्तान को हो भी नहीं रहा था, लेकिन जितना छोटा देश है और गधों को चीन भेजकर पैसे जुटा रहा है, उस हिसाब से कुछ सौ करोड़ का धक्का भी उनके लिए ठीक-ठाक है।

सिंधु जल समझौते पर जो क़दम सरकार ने लिए वो पाकिस्तान पर लम्बा असर डालने वाले हैं। लोग कहते हैं कि पानी रोक लिया जाए। हाँ, लोगों को ये समझ में नहीं आता कि पानी रोक कर रखेंगे कहाँ? उसका पहले इंतजाम किया जाए, फिर रोक लेंगे, मोड़ देंगे। उरी, पठानकोट के बाद ही सरकार ने अपनी नदियों पर बाँध बनाना शुरु कर दिया था। अब हम उस स्थिति में हैं कि पानी को रोक सकें। आने वाले समय में यह व्यवस्था इतनी सक्षम हो जाएगी कि उन्हें अपनी इच्छा से पानी दिया भी जाएगा (कि बाढ़ ही आ जाए), और रोका भी जाए (कि उन्हें पीने के पानी और सिंचाई के लिए तरसना पड़े)। 

अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने में भी सरकार ने जो तेज़ी इस बार दिखाई है, वो अपने आप में सराहनीय है। सराहनीय इसलिए कि चीन तक ने यूएन द्वारा की गई निंदा में सहमति दी है। साथ ही, पाकिस्तान ने इन क़दमों के बाद जमात उद दवा और जैश से जुड़ी कई जगहों को अपने क़ब्ज़े में लिया है। ख़ैर, पाकिस्तान कुछ भी करे, उससे हमें मतलब नहीं क्योंकि कुत्ते की दुम फिर टेढ़ी होनी ही है। इसलिए हमारे वश में जो कर पाना है, वो हम कर लें तो भी पाकिस्तान को बिना युद्ध के घुटनों पर लाया जा सकता है। 

ऐसे हमलों के बाद नेताओं की मजबूरी होती है कि वो ‘कड़ी निंदा’ और ‘करारा जवाब दिया जाएगा’ ही कह सकते हैं। हम या आप और क्या चाहते हैं? क्या मोदी या मनमोहन कंधे पर रॉकेट लॉन्चर लेकर प्रेस को संबोधित करें? ऐसा नहीं होता, होगा भी तो हास्यास्पद होगा। ऐसे मौक़ों पर देश की जनता को एक्शन चाहिए, लेकिन एक्शन झटके में नहीं लिया जाता। तैयारी करनी होती है, योजना बनानी होती, स्पेशल लोग लाने होते हैं, फिर जाकर एक सर्जिकल स्ट्राइक होती है। 

जिनके दोस्त बलिदान हुए, जिस संस्था पर हमला हुआ, उसे प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दे दी है, तो वो चुप बैठकर चाय तो पी नहीं रहे होंगे! यक़ीन मानिए, आपसे और मुझसे कहीं ज़्यादा गुस्सा होगा उनके अंदर। लेकिन गुस्से को बाँधकर, उसको दूसरी तरफ मोड़ना और अपने क्रोध का लाभ लेना ही सही परिणाम देता है। 

युद्ध अंतिम विकल्प रहे तो बेहतर है। युद्ध परिवारों को तबाह करता है, देश को तोड़कर रख देता है। युद्ध से डरिए, क्योंकि इसमें फायदा नहीं है। गुस्सा करना, संवेदना दिखाना सामान्य मानवीय भाव है। लेकिन इसे उन्माद बनाकर सरकारों से दबाव में वैसा कुछ मत करवा लीजिए कि पूरे देश को उसका मूल्य चुकाना पड़े।

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

दिल्ली दंगों के दौरान मुस्लिमों को भड़काने वाला संगठन ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों को पहुँचा रहा भोजन: 25 मस्जिद काम में लगे

UAH के मुखिया नदीम खान ने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे लोगों को मदद पहुँचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है।

‘बंगाल में हम बहुसंख्यक, क्योंकि आदिवासी और दलित हिन्दू नहीं होते’: मौलाना अब्बास सिद्दीकी और ओवैसी साथ लड़ेंगे चुनाव

बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाले जिलों मुर्शिदाबाद (67%), मालदा (52%) और नॉर्थ दिनाजपुर में असदुद्दीन ओवैसी को बड़ा समर्थन मिल रहा है।

‘हमारी माँगटीका में चमक रही हैं स्वरा भास्कर’: यूजर्स बोले- आम्रपाली ज्वेलर्स से अब कभी कुछ नहीं खरीदेंगे

स्वरा भास्कर को ब्रांड एम्बेसडर बनाने के बाद आम्रपाली ज्वेलर्स को सोशल मीडिया में यूजर्स का कड़ा विरोध झेलना पड़ा है।

कोरोना संक्रमण पर लगातार चेताते रहे, लेकिन दिल्ली सरकार ने कदम नहीं उठाए: सुप्रीम कोर्ट से केंद्र

दिल्ली में कोरोना क्यों बना काल? सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार ने बताया है कि रोकथाम के लिए केजरीवाल सरकार ने प्रभावी कदम नहीं उठाए।

क्या घुसपैठ करने वाले रोहिंग्या मुसलमानों को RAW में बहाल करने जा रही है भारत सरकार?

एक वायरल मैसेज में दावा किया जा रहा है कि सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को रॉ में बहाल करने जा रही है। जानिए, क्या है इस दावे की सच्चाई?

‘नॉटी, दो टके के लोग’: कंगना पर फट पड़ीं मुंबई की मेयर, ऑफिस तोड़ने पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाई थी फटकार

मुंबई की मेयर किशोरी पेडनेकर ने कंगना रनौत के लिए 'नॉटी' का इस्तेमाल किया है। शिवसेना सांसद संजय राउत के लिए इस शब्द का अर्थ 'हरामखोर' है।

प्रचलित ख़बरें

मैं नपुंसक नहीं.. हिंदुत्व का मतलब पूजा-पाठ या मंदिर का घंटा बजाना नहीं, फ़ोर्स किया तो हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊँगा: उद्धव ठाकरे

साक्षत्कार में उद्धव ठाकरे ने कहा कि उन्हें विरोधियों के पीछे पड़ने को मजबूर ना किया जाए। इसके साथ ही ठाकरे ने कहा कि हिंदुत्व का मतलब मंदिर का घंटा बजाना नहीं है।

‘कबीर असली अल्लाह, रामपाल अंतिम पैगंबर और मुस्लिम असल इस्लाम से अनजान’: फॉलोवरों के अजीब दावों से पटा सोशल मीडिया

साल 2006 में रामपाल के भक्तों और पुलिसकर्मियों के बीच हिंसक झड़प हुई थी जिसमें 5 महिलाओं और 1 बच्चे की मृत्यु हुई थी और लगभग 200 लोग घायल हुए थे। इसके बाद नवंबर 2014 में उसे गिरफ्तार किया गया था।

‘उसे मत मारो, वही तो सबूत है’: हिंदुओं संजय गोविलकर का एहसान मानो वरना 26/11 तुम्हारे सिर डाला जाता

जब कसाब ने तुकाराम को गोलियों से छलनी कर दिया तो साथी पुलिसकर्मी आवेश में आ गए। वे कसाब को मार गिराना चाहते थे। लेकिन, इंस्पेक्टर गोविलकर ने ऐसा नहीं करने की सलाह दी। यदि गोविलकर ने उस दिन ऐसा नहीं किया होता तो दुनिया कसाब को समीर चौधरी के नाम से जानती।

ये कौन से किसान हैं जो कह रहे ‘इंदिरा को ठोका, मोदी को भी ठोक देंगे’, मिले खालिस्तानी समर्थन के प्रमाण

मीटिंग 3 दिसंबर को तय की गई है और हम तब तक यहीं पर रहने वाले हैं। अगर उस मीटिंग में कुछ हल नहीं निकला तो बैरिकेड तो क्या हम तो इनको (शासन प्रशासन) ऐसे ही मिटा देंगे।

दिल्ली के बेगमपुर में शिवशक्ति मंदिर में दर्जनों मूर्तियों का सिर कलम, लोगों ने कहते सुना- ‘सिर काट दिया, सिर काट दिया’

"शिव शक्ति मंदिर में लगभग दर्जन भर देवी-देवताओं का सर कलम करने वाले विधर्मी दुष्ट का दूसरे दिन भी कोई अता-पता नहीं। हिंदुओं की सहिष्णुता की कृपया और परीक्षा ना लें।”

’26/11 RSS की साजिश’: जानें कैसे कॉन्ग्रेस के चहेते पत्रकार ने PAK को क्लिन चिट देकर हमले का आरोप मढ़ा था भारतीय सेना पर

साल 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अजीज़ को उसके उर्दू भाषा अखबार रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के लिए उत्कृष्ट अवार्ड दिया था। कॉन्ग्रेस में अजीज़ को सेकुलरिज्म का चमचमाता प्रतीक माना जाता था।

दिल्ली दंगों के दौरान मुस्लिमों को भड़काने वाला संगठन ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों को पहुँचा रहा भोजन: 25 मस्जिद काम में लगे

UAH के मुखिया नदीम खान ने कहा कि मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे लोगों को मदद पहुँचाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जा रहा है।

राजधानी एक्सप्रेस में मिले 14 रोहिंग्या (8 औरत+2 बच्चे), बांग्लादेश से भागकर भारत में घुसे थे; असम में भी 8 धराए

बांग्लादेश के शरणार्थी शिविर से भागकर भारत में घुसे 14 रोहिंग्या लोगों को राजधानी एक्सप्रेस से पकड़ा गया है। असम से भी आठ रोहिंग्या पकड़े गए हैं।

‘बंगाल में हम बहुसंख्यक, क्योंकि आदिवासी और दलित हिन्दू नहीं होते’: मौलाना अब्बास सिद्दीकी और ओवैसी साथ लड़ेंगे चुनाव

बड़ी मुस्लिम जनसंख्या वाले जिलों मुर्शिदाबाद (67%), मालदा (52%) और नॉर्थ दिनाजपुर में असदुद्दीन ओवैसी को बड़ा समर्थन मिल रहा है।

‘हमारी माँगटीका में चमक रही हैं स्वरा भास्कर’: यूजर्स बोले- आम्रपाली ज्वेलर्स से अब कभी कुछ नहीं खरीदेंगे

स्वरा भास्कर को ब्रांड एम्बेसडर बनाने के बाद आम्रपाली ज्वेलर्स को सोशल मीडिया में यूजर्स का कड़ा विरोध झेलना पड़ा है।

उमेश बन सलमान ने मंदिर में रचाई शादी, अब धर्मांतरण के लिए कर रहा प्रताड़ित: पीड़िता ने बताया- कमलनाथ राज में नहीं हुई कार्रवाई

सलमान पिछले कई हफ़्तों से उसे धर्म परिवर्तन करने के लिए न सिर्फ प्रताड़ित कर रहा है, बल्कि उसने बच्चे को भी जान से मार डालने की कोशिश की।

कोरोना संक्रमण पर लगातार चेताते रहे, लेकिन दिल्ली सरकार ने कदम नहीं उठाए: सुप्रीम कोर्ट से केंद्र

दिल्ली में कोरोना क्यों बना काल? सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार ने बताया है कि रोकथाम के लिए केजरीवाल सरकार ने प्रभावी कदम नहीं उठाए।

क्या घुसपैठ करने वाले रोहिंग्या मुसलमानों को RAW में बहाल करने जा रही है भारत सरकार?

एक वायरल मैसेज में दावा किया जा रहा है कि सरकार रोहिंग्या मुसलमानों को रॉ में बहाल करने जा रही है। जानिए, क्या है इस दावे की सच्चाई?

‘नॉटी, दो टके के लोग’: कंगना पर फट पड़ीं मुंबई की मेयर, ऑफिस तोड़ने पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाई थी फटकार

मुंबई की मेयर किशोरी पेडनेकर ने कंगना रनौत के लिए 'नॉटी' का इस्तेमाल किया है। शिवसेना सांसद संजय राउत के लिए इस शब्द का अर्थ 'हरामखोर' है।

गाजीपुर में सड़क पर पड़े मिले गायों के कटे सिर: लोगों का आरोप- पहले डेयरी फार्म से गायब होती हैं गायें, फिर काट कर...

गाजीपुर की सड़कों पर गायों के कटे हुए सिर मिलने के बाद स्थानीय लोग काफी गुस्से में हैं। उन्होंने पुलिस पर मिलीभगत का आरोप लगाया है।

बंगाल: ममता के MLA मिहिर गोस्वामी बीजेपी में शामिल, शनिवार को शुभेंदु अधिकारी के आने की अटकलें

TMC के असंतुष्ट विधायक मिहिर गोस्वामी बीजेपी में शामिल हो गए हैं। शुभेंदु अधिकारी के भी शनिवार को बीजेपी में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही है।

हमसे जुड़ें

272,571FansLike
80,432FollowersFollow
358,000SubscribersSubscribe