Monday, November 30, 2020
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हिन्दुओं की मौत में अख़लाक़ वाला सोफ़िस्टिकेशन नहीं है

असल में सब मामला ‘सोफ़िस्टिकेशन’ का है। अगर आप धर्म परिवर्तन को ‘कन्वर्ज़न’ कह दें तो सोफ़िस्टिकेशन कहकर ‘इग्नोर’ किया जा सकता है और यदि घर-वापसी कह दें, तो ‘कट्टर हिन्दू सोच’ कहकर इसे ‘राष्ट्रवादी ताकतों का षड्यंत्र’ कहा जा सकता है।

देश एक ओर जहाँ सहिष्णुता और असहिष्णुता के विवाद में मशगूल है, उसी समय धर्मान्तरण का कारोबार देशभर में तेजी से पैर पसार रहा है। एक सम्प्रदाय विशेष, जिसके इतिहास में जबरन धर्म परिवर्तन, कट्टरता, बर्बरता और हिंसा के पन्ने जुड़े हुए हैं, 21वीं सदी में भी इसी लीक पर काम कर रहा है यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। लेकिन ये चौंकाने वाली बात ज़रूर है कि देश का ‘बुद्दिजीवी वर्ग’ अपनी नींद से सिर्फ खास मौकों पर ही आगे आता है, तख्तियाँ बनाता है, सत्संग करता है।

बुधवार को ही तमिलनाडु के तिरूभुवनम में एक ‘समुदाय विशेष’ के सदस्यों द्वारा रामलिंगम की हत्या कर दी गई और इसका कारण है कि रामलिंगम दलित बस्तियों में मुस्लिमों को जबरन धर्म परिवर्तन करने के लिए उकसाने से रोक रहे थे। नतीजा ये हुआ कि रामलिंगम को क्रूरता से जख़्मी किया गया, उनके हाथ काट दिए गए और अस्पताल पहुँचाने से पहले ही उनकी मौत हो गई।

भारत देश वर्तमान में बड़े स्तर पर धर्मपरिवर्तन की मार से गुजर रहा है। मुस्लिम हों या फिर ईसाई हों, इनका सबसे आसान और सबसे पहला लक्ष्य हिन्दू धर्म के आर्थिक रूप से वंचित, निचली जातियों के लोगों का धर्म परिवर्तन करना रहता है। स्वयं को सबसे पुरानी, उन्नत, यहाँ तक कि स्वयं को सभ्यता सूर्य मानने का दावा करने वाले ईसाई भी आज के समय पर धर्म परिवर्तन कर संख्या जुटाने के लिए इतने संवेदनशील हैं।

इस तरह से एक हिन्दू ही है जिसका धर्म के प्रचार-प्रसार को लेकर कोई लक्ष्य नहीं है। वो मात्र पूजा-पाठ करना चाहता है, गाय की सेवा करना चाहता है, और तिलक लगाकर एक गौरवपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करता है और यह आज़ादी उसे इस लोकतंत्र का संविधान देता है। लेकिन ‘आदर्श लिबरल’ गिरोह द्वारा उसके इस दैनिक जीवन को भी ‘ओल्ड स्कूल थिंग’ कहा जाता है, उसके तिलक लगाने को सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना हो जाता है और इन सब कामों को कट्टरता से जोड़ दिया जाता है। साथ ही, अब पत्रकारिता का भी एक समुदाय विशेष तेजी से उभर कर सामने आया है जिसके अनुसार ये सब ‘घृणित ब्राह्मणवाद’ का प्रतीक है।

मैंने किसी भी विद्यालय, शिक्षण संस्थान और ऑर्गनाइजेशन में काम कर रहे किसी हिन्दू को पूजा-पाठ के लिए दिन में 3 बार तो क्या, सप्ताह और महीने में भी एक बार अवकाश लेते या देते नहीं देखा है और शायद यह पढ़ते हुए भी आपको हँसी आएगी। आप खुद विचार कीजिये कि क्या ऐसा प्रश्न आप अब तक सोचते भी आए हैं? जवाब है नहीं।

क्योंकि हमारा मस्तिष्क धारण कर चुका है कि उपहास और घृणित रूप से देखे जाने के भय से हमें ऐसा सोचने तक की आजादी नहीं है। जबकि, कोई विशेष समुदाय का व्यक्ति शुक्रवार को अपनी इबादत के लिए अवकाश लेता है और इसमें शायद मना करने तक की गुंजाइश नहीं होती है। छुट्टी देने वाला भी इसमें बहुत गौरवान्वित और ‘हल्का’ महसूस करता है। वहीं हिन्दुओं के टीका धारण करने पर भी सवाल उठा लिए जाते हैं कि यह हमारे संस्थान का ‘कल्चर’ नहीं है और जाहिर सी बात है कि ऐसा कहने वाले भी हिन्दू ही हुआ करते हैं।

असल में सब मामला ‘सोफ़िस्टिकेशन’ का है। अगर आप धर्म परिवर्तन को ‘कन्वर्ज़न’ कह दें तो सोफ़िस्टिकेशन कहकर ‘इग्नॉर’ किया जा सकता है और यदि घर-वापसी कह दें, तो ‘कट्टर हिन्दू सोच’ कहकर इसे ‘राष्ट्रवादी ताकतों का षड्यंत्र’ कहा जा सकता है। हिन्दू पुनर्जागरण की अग्रणी स्वामी दयानन्द सरस्वती ने ‘घर वापसी’ शब्द दिया था, जिसका उद्देश्य ऐसे लोगों को हिन्दू धर्म में वापस जोड़ना था जिन्हें जबरन इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया था।

सवाल ये है कि अपनी आस्थाओं को सिर्फ सुरक्षित रखने का प्रयास करने वाले लोग सांप्रदायिक हिन्दू कैसे हो जाते हैं? जबकि प्रताड़ित कर, जबरदस्ती दबाव बनाकर और तरह-तरह के लालच देकर हिन्दुओं को मुस्लिम और ईसाई बना देना की तरह से एक मानवता के कल्याण की योजना मान लिया जाता है?

पिछले कुछ सालों में इस देश में हिन्दुओं की हिंसात्मक तरीके से हत्या और मार-काट एक आम बात बनकर रह गई है। वामपंथी समुदाय का इन अवसरों पर एक ख़ास मौन धारण कर लेना समझ में आता है लेकिन सत्ता में होने के बावजूद भाजपा सरकार ने भी इन हत्याओं पर कभी कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिन्दू धर्मपरिवर्तन के विरोध में आवाज उठाने वालों की हत्या पर कभी कोई राय नहीं रखी।

तमाम अखबार और न्यूज़ वेबसाइट्स केरल, बंगलुरू, मेरठ, लुधियाना, उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक RSS कार्यकर्ताओं की हत्या की ख़बरों से भरे रहे हैं, लेकिन इस पर वामपंथी मीडिया गिरोह ने कभी कोई ‘ऑनलाइन पिटीशन’ और आंदोलन नहीं चलाया।

प्रश्न फिर खड़ा होता है कि आखिर 2 लोगों की हत्या में संवेदनशीलता, विलाप और उग्रता के मीटर में परिवर्तन क्या सिर्फ इसलिए आ जाता है, क्योंकि वो आपके जैसी विचारधारा से ताल्लुक नहीं रखता है? किसी हिन्दू की निर्मम हत्या किसी समुदाय विशेष की मृत्यु से किस तरह अलग हो जाती है? क्या उसे सिर्फ इसलिए न्याय नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि उसका नाम अख़लाक़ नहीं बल्कि रामलिंगम है?

रामलिंगम की निर्मम हत्या भी ऐसे ही बाकी सभी पुराने प्रकरणों की तरह ही एक ‘बीत गई बात’ बनकर रह जाएगी। ख़बरों का टेस्ट तैमूर की क्यूट तस्वीरों और प्रियंका गाँधी के खाने और सोने के समय द्वारा तय कर लिया जाएगा और न्याय की बात अगली ऐसी ही किसी घटना के बाद फिर उठाई जाएगी। जनता का रोष उस चाइनीज़ प्रॉडक्ट की तरह बन चुका है, जिसकी सुबह और शाम तक चलने की कोई गेरेंटी नहीं होती है।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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